सक्षम दल, अक्षम दिशा और दशा, आखिर क्यों?

व्ही.एस. भुल्ले | जब दिल्ली से कोसो दूर बैठ आम कॉग्रेसी कार्यकत्र्ता शुभचिन्तक कॉगे्रेस के ाले बुरे में अन्तर महसूस कर सकते है तो फिर कॉगे्रस मु यालय 24 अकबर रोड में बैठने वाले रणनीतिकार क्यों नहीं समझ पातेे कि कॉग्रेस का भला कैसे हो सकता है। पूर्व की भांति कॉग्र्रेस में मौजूद कई सक्षम क्षेत्रीय नेतृत्वों के साथ कैसे सक्षम तथा स्वीकार्य संगठन क्यों नहीं बनाया जा सकता है? कई राज्यों में पूरा संगठन साख गवां, कोसो सत्ता से दूर तो कई प्रदेशों 10-15 वर्षो से वनवास भोग रही, कॉग्रेस को केन्द्र में भी सत्ता गवाये पूरे ढाई वर्ष होने को हो, मगर कॉग्रेस है। कि आज भी कई मर्तवा सार्थक प्रयास करने के बाद अचानक ऐसा कोई न कोई व्यान दें, पुन: वहीं लौट आती है जहां वह खड़ी थी। 

जबकि आम कॉग्रेसी यह कतई मानने तैयार नहीं कि कॉग्रेस के पास किसी भी प्रकार से उ दा रणनीतकार, ऊर्जावान नेता, युवा नेतृत्वो की कमी है फिर 24 अकबर रोड पर ऐसा क्या घट रहा है। जो कॉग्रेस न तो अपनी नीति रणनीति स्पष्ट कर पा रही है, न ही संगठनात्मक मजबूती के कोई प्रयास कर पा रही है। बल्कि पूर्व की भांति सत्ताधारी दल द्वारा उछाले जाने वाले मुद्दों की पिछलग्गू बन, प्रतिक्रया बस अपना सिद्धान्त खोती जा रही है।  

जबकि 10-15, 30 वर्षो से बन बासित प्रदेशों में या तो चुनाव शुरु हो चुके है या फि र आने वाले दो वर्षो में चुनाव होने वाले है। जहां कई प्रदेशों में छोटे-छोटे दल ताल ठोक चुनाव मैदान में जा चुके है। तो आने वाले वर्षो में होने वाले चुनावों की तैयारी मे सत्ताधारी दल खेल जमा चुके है। मगर अभी न तो कॉग्रेस की कोई का दिशा का पता है, न ही दशा का। 

संगठनात्मक फॉरमूले को तिलाजंली दें, परिवारिक, बफादारी फॉरमूले पर आधारित कॉग्रेस की मजबूरी कम, समझदारी हो सकती है। मगर संगठन मजबूती को लेकर नेतृत्व ने मुंह फेर लिया हो, यह भी स भव नहीं।  क्योंकि स्व.राजीव गांधी की युवक कॉग्रेस सेवादल जैसे संगठनों में सीधी सहभागिता और राहुल के इन संगठनों में चयनित फॉरमूले, व्यवहारिक फॉरमूलों से जुदा हो सकते है। जिसमें क्षेत्रीय कॉग्रेस नेताओं की दिलचस्वी स्वयं के टूटते तिलस्म को लेकर न हो, मगर यह कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि हर नेता अपने क्षेत्र में अपना अस्तित्च बचाये रखने ल बी राजनीति के लिये संघर्ष करता है। सो हो सकता है राहुल के विधान लोकसभा अध्यक्ष फॉरमूले से असहमत क्षेत्रीय नेताओं में दिलचस्वी न हो। क्योंकि उनका काम तो बैसे भी कॉग्रेस किसान कॉग्रेस सेवादल से चल रहा है। अगर कुछ प्रभावित हुआ है तो एन.यू.आई युवक कॉग्रेस महिला कॉग्रेस जैसे संगठन जो कॉग्रेस का आधार थे। आज कॉग्रेस को स त जरुरत है थोक बन्द समर्पित संगठन मंत्री सहित समय- समय पर संगठन की समीक्षा और सकारात्मक कार्यक्रमो के माध्ययम से आम जनता के बीच स्पष्ट संदेश देने की। 

बहरहाल जो भी हो, देश ही नहीं, कॉग्रेस का आम कार्यकत्र्ता उत्सुक ही नहीं निराश भी है। फिलहाल कॉग्रेस के प्रदर्शन को लेकर तथा सत्ताधारी दल और सरकार की आक्रमकता को लेकर अगर वाक्य में ही राहुल कॉग्रेस को सशक्त और पुन: स्वीकार्य संगठन बनाना चाहते है तो दिल्ली में बैठ ही वह कम से कम ऐसे 100 संगठन मंत्रियों की फौज जो पूर्ण कालिक हो, का स्वयं चयन कर संगठन मजबूती के लिये जुटा सकते है। बशर्ते वह अपना दूर-भाष, ई-मेल सुन देख और सॉशल मीडिया पर कॉग्रेसी विचारधारा से जुड़े लोगों को आमंत्रित कर उन्हें सुने। या फिर देश को बताये कि दल के अन्दर या बाहर क्या संकट है, जो वह चाह कर ाी  नहीं कर पा रहे, जों वह करना चाहते है। 

फिलहाल कॉग्रेस के लिये कुछ प्रदेशों में शायद अन्तिम अवसर हो, सत्ता वापसी का जिनमे म.प्र., छत्तीसगढ़, राजस्थान प्रमुख है। बरना कहीं पूर्व की भांति देर हो गई, तो वह दिन दूर नहीं जब अगले 5 वर्ष के लिये कॉग्रेस को फिर सत्ता से दूर रहना होगा।  
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