स्वराज से संभव खुशहाल भारत का सपना

विलेज टाइम्स। यूं तो हमारे देश में केन्द्र सरकार से लेकर, कई राज्य, गांव, गली की सरकारें खुशहाल भारत निर्माण में विगत 70 वर्षो से जुटी है। औद्यौगिक घराने, दानवीर, समाज सेवी संस्थायें भी अपने-अपने हिसाब से जनकल्याण में जुटी है। जिसके चलते लोगों के जीवन स्तर में सुधार भी हुआ है। मगर मानवीय मूल्य और सत्ता असन्तुलन की इस ल बी यात्रा में गरीबी नहीं मिटी है। 

      मगर इस सब के बीच चौकाने वाली बात यह है कि जिसके पास सत्ता या अपार दौलत है वह भी गरीबी की मार झेल रहा है और जो सत्ता से दूर, धन विहीन है, वह भी गरीबी झेल रहा है। कुल मिलाकर, खुशहाल कोई नहीं। 
     कारण कहीं न कहीं हमारे सामूहिक प्रयास या हमारी सोच, आचार-व्यवहार में कोई कमी रही है। देखा जाये तो हमारे महान लोकतंत्र में वह सामूहिक संघर्ष और संस्कृति हमारे बीच से जाती रही। जिसकी दम पर हम विश्व के सबसे स पन्न, खुशहाल भू-भाग के रुप में जाने पहचाने जाते थे। 
          बहरहाल हमारी र्दुगति के कारण जो भी रहे हो, मगर खुशहाल भारत और मानवीय मूल्यों की रक्षा, सत्ता सन्तुलन के प्रयास बन्द नहीं होना चाहिए। 

     मगर यह तभी स भव है जब हम सामूहिक शुरुआत निस्वार्थ भाव से अपने-अपने कत्र्तव्यों का पालन कर, करे। जरुरी नहीं हम संगठित प्रदर्शित हो। मगर आपसी सहयोग से हमारा लक्ष्य स पूर्ण स्वराज प्राप्ति का हो। और हमारा संविधान हमारा महान लोकतंत्र इसकी इजाजत देता है। हमारा कत्र्तव्य है कि हम जहां भी जैसी स्थिति में रहे, अपने बचे समय में स्वराज के लिये संघर्षरत रहना चाहिए। और हमारे महान राष्ट्र और मानवीय मूल्यों की रक्षा व सत्ता सन्तुलन बनाये रखने की दिशा में सामूहिक प्रयास करना चाहिए। क्योंकि आज हमारे महान भारत में गांव गरीब गली, सत्ता सौपानो से दूर होती जा रही है। जिसमें धन गत सत्ता प्रणाली और सत्ता संघर्ष में बढ़ता अनैतिक धन सबसे बड़ी बाधा है। अब इसे हम 83 करोड़ सस्ते राशन के मोहताज लोग अपना सौभाग्य कहे या र्दुभाग्य कि चुनाव खर्च की सीमा लगभग 4 लाख और इससे भी ज्यादा वैधानिक है। फिर उस पर से परिवारवाद या वैचारिक नस्लवाद के चाकचौबन्द रास्ते बौद्धिक चोरो की स्वार्थ पूर्ण जमात ऐसे कई कारण हो सकते है। जिसने मानवीय जीवन को अति महात्वकांक्षी, अराजक व वैचारिक व्यवहारिक हिंसक बना दिया है। जब तक हम अहिंसा, शान्ति और समान अवसरों की ओर नहीं बढ़ेगें। तब तक ऐसा ही कुछ हमारे महान भू-भाग पर चलता रहेगा। इसीलिये जरुरी है गांव, गली, गरीब के साथ उन औद्यौगिक पूंजीपति, समाज सेवी, बौद्धिक लोगों के सामूहिक संघर्ष की जिससे स्वराज के रास्ते, हमारा महान राष्ट्र, स पन्न, खुशहाल बन पाये। 
        जय स्वराज

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