न संस्कार छोड़ा, न संगठन को तोड़ा, विकास के रथ पर सवार अखिलेश का समाजवाद

व्ही.एस.भुल्ले | विगत महीनों से संगठन व उत्तरप्रदेश की सत्ता की बागडोर स हालने समाजवादियों में मची नूरा कुस्ती के बीच विकास के रथ पर सवार अखिलेश के समाजवाद ने साबित कर दिया। कि न तो उन्होंने अपना संस्कार छोड़ा और न ही उन्होंने संगठन को तोड़ा। विकास के जिस नये समाजवाद पर सवार अखिलेश उ.प्र. के युवाओं की टोली  बना पुन: उ.प्र. की सत्ता हासिल करने चल पड़े है, उसका कोहासा अब धीर-धीरे छटने लगा है।  

ज्ञात हो आज से साढ़े चार वर्ष पूर्व जब उनके पिता मुलायम सिंह ने उनकी मेहनत देख, उ.प्र. की सत्ता उन्हें उ.प्र. के मु यमंत्री के रुप में सौंपी थी। तब शायद उन्हें भी यह अनुमान नहीं रहा होगा, कि समाजवाद का यह लिटिल मास्टर समाजवादियों को किस ऊचाई तक अपनी समझ अनुसार ले जायेगा। और गुण्डों, मबालियों से बदनाम उ.प्र. की राजनीति में पढ़े-लिखें समझदार युवाओं का वह सैलाब पुन: सत्ता हासिल करने ले आयेगा। जिसने एक रात मेंं ही उन्हीं के पिता और उ.प्र. की राजनीति के खट समाजवादी नेता की समुची संगठनात्मक विरासत को एक झटके में उस समाजवाद के पक्ष में खड़ा कर देगा। जिसकी कल्पना कभी डॉ. राम मनोहर लेाहिया, जनेश्वर मिश्र जैसे नेताओं ने की होगी। 

फिलहाल अखलेश का कारवां कुछ रुकावटों के साथ फिलहाल चल पड़ा है। देखना होगा कि विकास के रथ पर सवार यह समाजवाद उ.प्र. में पुन: सत्ता हासिल करने और कौन-कौन से नये कीर्तिमान स्थापित कर सकता है।  बहरहाल एक बात तो तय है कि अखिलेश का समाजवाद अब उ.प्र. ही नहीं, उ.प्र. की सीमाओं से बाहर निकल देश के अन्य राज्यों में भी चल पड़ा है, जिसका सारा दारोमदार उ.प्र. के चुनावों में समाजवादियों की हार-जीत पर निर्भर होगा। 
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