कुनवे को समेट साथ रखने की चुनौती

व्ही.एस.भुल्ले। जिस तरह से वैचारिक आधार पर उ.प्र. में कॉग्रेस फिर से कुनवा समेट साथ रखने की कोशिस कर रही है। उसके परिणाम जो भी हो, मगर उसके सामने फिलहाल बड़ी चुनौती एक साथ करने की होगी।  

       ये अलग बात है कि थोड़ी बहुत रस्सा-कसी के बाद कॉग्रेस व सपा में वैचारिक समझौता हो गया हो, जिसे कॉग्रेस के भावी मुखिया ने गंगा, यमुना संस्कृति का नाम दिया है और सरस्वती के अदृश्य रहने की बात कहीं है। अब ऐसे में उ.प्र. के महान मतदाता गांव, गली के गरीब इस संगम पर कितना आचमन कर, अपना बहुमूल्य मत देगेंं, फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। 

        मगर दशा सुधारने जो दिशा कॉग्रेस रणनीतिकारों की सलाह पर कॉग्रेस के भावी मुखिया ने पकड़ी है। उसकी पवित्रता पर संदेह स्वभाविक है। मगर इन दो वैचारिक नदियो में नैसर्गिक रुप से आने वाले बहाब पर सारा दारोमदार होगा। अगर बहाव नियंत्रण की तैयारी पूर्व से न हुई तो, गंगा, यमुना का सैलाब कहीं उ.प्र. का राजनैतिक भू-भाग का नक्शा बदल कटाव में तब्दील न कर दें। जिसके चलते बहाव की दिशा कहीं और दशा विपरीत न बन जाये। 

        ऐसे में कॉग्रेस के आगे यह चुनौती होगी कि बढ़ते सैलाब के बीच न तो किनारा कट पाये, न ही छोटी-मोटी नदी, नालों का अस्तित्व संकट में पढ़, गंगा सागर पहुंचने से पूर्व ही गंगा, यमुना का यह प्रवाह प्रदूषित हो पाये। बहरहाल शुरुआत तो बेहतर है अगर अंत बेहतर रहा तो सत्ता तो इस गठबन्धन को मिल जायेगी। मगर जो कॉग्रेस संगठन के संवाद संपर्क विहीन हो, शैया पर पड़ी है। अगर प्रबन्धकों के सहारे इसी तरह चलती रही, तो आने वाले समय में वह अवश्य दम तोड़ जायेगी। जरुरत पूरी संवेदनशीलता के साथ सजग रह, राष्ट्र सेवा के लिये जागरुक रहने की है, इतिहास गवाह है। 
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