कॉरपोरेट कल्चर के मुरीद हुये दल, दल-बदल दलो में,कंपनी सिस्टम का भाग

व्ही.एस. भुल्ले/विलेज टाइम्स। यूं तो देश में 1967 से दल बदल होता आ रहा है। मगर तब उसका आधार वैचारिक और राष्ट्रीय महात्वकांक्षाओं को लेकर होता था। मगर जब से देश की राजनीति में दलो के अन्दर अघोषित रुप से प्रायवेट क पनी सिस्टम लागू हुआ है। तब से दल बदल कर दूसरे दल का दामन थामने का सिलसिला व्यक्तिगत महात्वकांक्षा, स्वार्थ में तब्दील हो गया है। जिस तरह अघोषित रुप से प्रायवेट लिमिटेडों में तब्दील दलों के बीच कॉरपोरेट सिस्टम की भांति कॉलीब्रेशन पार्टनर सिस्टम चल पढ़ा है, दल बदल भी उसी का भाग है।  

जिससे अब जनाधार वाले नेता या दल में लोकतंात्रिक व्यवस्था को नष्ट कर, नई-नई तकनीक, छवि चमकाऊ या सत्ता हासिल करने भावनाओं या वोट कबाड़ तकनीक में माहिर क पनियों का चलन बढ़ गया है। जो करोड़ कबाड़ लोगों को सत्ता तक पहुंचने का दम भरती दिखाई पड़ती है। 

क्योंकि वैचारिक रुप से संगठन के आभाव में घसिटते दलो के पास अब न तो कोई चारा, न ही कोई लोकतांत्रिक ढांचा, कारण साफ है कि चापलूस चाटूकार स्वार्थियों से सने इन दलो के पास न तो अब मजबूत वैचारिक आधार रहा है, न ही कोई लोकतंात्रिक सिस्टम और संगठन। 

ऐसे में वैचारिक ब्रान्ड के सहारे अघोषित प्रायवेट लिमिटेडों में तब्दील इन राजनैतिक दलो का कोई वैचारिक आधार बचा, न ही संगठन। अब ऐसे में अति महात्वकांक्षी व्यक्ति समय देख दल बदल करते है या निर्दलीय लड़ते है। तो देश के गांव, गली, गरीब को क्लीयर कट संदेश है। कि अब उसकी आने वाली पीढ़ी को अघोषित रुप से बहुराष्ट्रीय क पनियों में तब्दील होते दलो के चरण चु बन चापलूसी कर सत्ता के सदनों तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं बचा है। क्योंकि अब उसकी हालात छवि चमकाऊ, ाावनाओं की लूट करने वाली क पनियों के आगे ताली बजाने या सभाओं की भीड़ बढ़ाने के साथ अब वोट डालने तक सीमित रह गई है। 

                क्योंकि देश के लगभग 83 करोड़ सस्ते राशन वालों पर अब न तो इतना पैसा बचा है कि वह लाखों खर्च कर देश निर्माण के सह ाागी बनने का मौका बचा है। क्योंकि चुनाव लडऩेटिकट हासिल करने का पैमाना वंशानुगत कोई बड़ा राजनेता के परिवार या फिर अथाये पैसा या फिर उ दा गुन्डा होना रह गया है। जो हर हाल में चुनाव जीतने का मादा रखता हो। रही सही कसर नोटबन्दी ने कर डाली, सो सत्ता सु ा तो गांव, गली, गरीब विसार ही दे। 

      सच तो यह है कि कभी लोकतंत्र के नाम जो बन्धन-गठबन्धन हुआ करते थे उनका एक वैचारिक और सैद्धान्तिक नीति गत आधार होता था। और राष्ट्र, जनकल्याण, जनाकांक्षायें सर्वोपरि होती थी। अब तो हमारे लोकतंत्र में अघोषित रुप में लिमिटेडों मे तब्दील दलों के कॉलीब्रेशन से हमारे दल बहुराष्ट्रीय क पनियों में तब्दील होते जा रहे है। जिसके दुष्परिणाम आज नहीं तो कल अवश्य देश के सामने होगें। क्योंकि देश का गांव, गली, गरीब परेशान तो हो सकता है कुछ समय के लिये अपने नैसर्गिक संस्कृति के चलते भावुक हो सकता है। मगर अपने मान-स मान, स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं कर सकता। 
                 जय स्वराज 

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