आधे से अधिक अशिक्षित, सस्ते राशन के मोहताज सत्ता से, ढैया बाहर- मु य संयोजक स्वराज

देश में सत्ता हासिल करने या उन सदनों में पहुंचने जहां गांव, गली, गरीब का भाग्य निर्धारित होता है। जब वहां पहुंचने के मार्ग हाइटेक हो जाये, तो उन मार्गो पर चलना, मुश्किल ही नहीं, हमारे महान लोकतंत्र में नमुमकिन हो जाता है। अब ऐसे में कोई कितना ही बड़ा राष्ट्र भक्त या जनसेवक होने का मादा क्यों न भरे। मगर सच यहीं है कि गांव, गली का गरीब अब सत्ता से बाहर हो, वोट देने की मशीन बन, एक बैवस वोटरबन गया है। 

जो लोकतंत्र की इस र्दुगति को सुन, देख ही नहीं मेहसूस भी कर सकता है। मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था में जकड़ा गांव, गली, गरीब अपनी बैवसी तो व्यक्त कर सकता है, मगर कुछ कर नहीं सकता है। क्योंकि विपक्ष विहीन देश का यह र्दुभाग्य कहे या सौभाग्य जो जनता से जुड़े अहम जमीनी मुद्दों को छोड़, सत्ता धारी दल या सरकार द्वारा छेड़े गये मुद्दों का पिछलग्गू बन, अपने कत्र्तव्य का निर्वहन कर रहा है और विपक्ष का देश के साथ यहीं वत्र्ताव र्दु ााग्य पूर्ण है। 

जरुरत है देश के महान नागरिकों को जागने की, जो सच गलत में फर्क समझ, अपने लोकतंत्र व अपनी मातृभूमि की रक्षा में, इन्सानियत की खातिर जागे और खुशहाल स पन्न भारत के लिये अपने स्तर पर संघर्ष कर उसकी रक्षा करें। 

फिलहाल जो भी हो, हमारे महान लोकतंत्र या देश की खातिर ही सही वह पूरे स पूर्ण भाव सेवा करें, जो हमारे महान लोकतंत्र और देश की खातिर आवश्यक हो, फिर भले ही वह जो भी हो। हमें उस व्यक्ति, दल, संगठन, संस्था का साथ और सहयोग करना चाहिए जो हमारी संस्कृति अनुसार देश व देश के गांव, गली, गरीब के लोगों का मान-स मान और स्वाभिमान के लिये संघर्षरत हो। 

क्योंकि प्रकृति के लिये भू-भाग और मानव के लिये इन्सानियत से बड़ा, न तो कोई कार्य हो सकता है, न ही उसका कोई धर्म। 
जय स्वराज।
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