दलों की दुष्टता का दर्द, सत्ता लूट, भीख पर भण्डारा, पुजारी बने भगवान

व्ही.एस. भुल्ले। जिस तरह से राष्ट्र जनसेवा के नाम सतत सत्ता लूट का अभियान हमारे लोकतंत्र में चल पड़ा है इससे बड़ा दलो की दुष्टता का दर्द और कोई नहीं हो सकता। भले ही गांव, गली, गरीब अपने बेहतर भविष्य को मोहताज हो, अगर बात सत्ता लूट तक ही सीमित रहती, तो चल जाती, मगर अब तो बात देश की उन महान विभूतियों तक जा पहुंची है, जो देश की करोड़ों, करोड़ जनता और अपनी मातृ-भूमि तथा गांव, गली, गरीब की खातिर कर्ज चुका वर्षो पूर्व इस दुनिया से जा चुके है। तो कुछ आज अपने-अपने हिसाब से संघर्षरत है। मगर भाई लोग है जो वैचारिक या दल गत आधार पर अपने-अपने एजेन्डा महात्वकांक्षा, स्वार्थ पूर्ति हेतु, महापुरुषों पर ही सवाल खड़े कर, अपना इकबाल बुलन्द करने में लगेे है। 

तो दूसरी ओर कुछ लोग सत्ता के अहंकार में डूब यह भी भूल जाते है कि जो जनता कल तक उनके लिये भगवान और वह उसके पुजारी हुआ करते थे। वह दोनो हाथों से जनधन लुटा जनसेवा के नाम सदावृत बांटने में लगे है। आखिर भगवान बनी जनता कैसे भिखारी हो सकती है, जो उसे वोटों की खातिर भरमाने का प्रयास किया जा रहा है। अजीब सी हालत है मेरे महान लोकतंत्र की जिसे जैसा बन पड़ रहा है वह बैसा कर रहा है और नई-नई नजीरों के सहारे नव लोकतंत्र स्थापित कर रहा है। 

र्दुभाग्य कि सशक्त विपक्ष विहीन मेरे राष्ट्र का जहां राष्ट्र व गांव, गली, गरीबों की खातिर अपना जीवन न्यौछावर करने वाली महान विभूतियों को भी बहस का मुद्दा बनाया जा रहा है। और देश की महान जनता को देने लेने के मकड़ाजाल में उलझा उसका सुनहरा भविष्य चौपट किया जा रहा है। 

वहीं जो लोग सब कुछ न्यौछावर कर, राष्ट्र को आजाद करा गये या जो लोग आज कुछ कर रहे है, उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। जिस तरह से आज महात्मा गांधी को लेकर बहस छिड़ी है जिस तरह से प्रधानमंत्री द्वारा नये शिरे से राष्ट्र निर्माण की कोशिस हो रही है। उनकी कार्यप्रणाली और महात्मा गांधी के त्याग तपस्या को लेकर सवाल हमें हमारी संस्कृति, संस्कार, स यता से मुंह मोडऩे काफी है। अब ऐसे में शर्मनाक सवाल सत्ताधारी दल के अन्दर से हो या बाहर से वह कभी भी सार्थक नहीं हो सकते। 

बेहतर हो कि बहसकत्र्ता और बेहतर जीवन का रास्ता दिखाने वाले इतना समझ लें, कि जिस महात्मा गांधी जी की स्वीकार्यता सारे विश्व में है, उस गांधी पर उन्हीं के घर से सवाल, लज्जाजनक ही नहीं शर्मनाक है, जिसके लिये न तो हमें, हमारा इतिहास और न ही आने वाली पीढ़ी अपने ही महापुरुषों सवाल दागने पर क्षमा करेंगी। 
जय स्वराज
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