चुनाव सुधार ही भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का मार्ग: व्ही.एस.भुल्ले संयोजक स्वराज

जब तक हमारा देश दीमक की तरह, देश में मौजूद भ्र्रष्टाचार से हर स्तर पर मुक्ति नहीं पा लेता, तब तक सारे प्रयास निस्र्थक है। और यह तभी संभव है जब हम हमारी चुनाव प्रक्रिया को पवित्र बनाने में जड़ीय प्रयास शुरु किये जायेें। ल बी चौड़ी बातें और बढ़ते कानूनों के बोझ से समस्या हल होने वाली नहीं। क्योंकि जाने अनजाने मे किये गये या हुये भ्रष्टाचार से प्राकृतिक सिद्धान्त तो प्रभावित होता ही है, साथ ही सामाजिक सन्तुलन भी बिगड़ता है। जो कहीं न कहीं प्रकृति प्रदत्त मानवीय जीवन सहित पृथ्वी पर मौजूद हर जीव को किसी न किसी रुप प्रभावित करता है। जो सकारात्मक सुखदायी या नकारात्मक दुखदायी हो सकता है। 

चूंकि मसला हमारी महान लोकतांत्रिक व्यवस्था में दैत्य की तरह पैर पसार चुके उस भ्रष्टाचार का है। जिससे कभी भी इस महान राष्ट्र के महान नागरिक का दूर-दूर तक वास्ता नहीं रहा। हमारे महान ग्रन्थ, इतिहास गवाह है कि हमारी संस्कृति में हमेशा से ही संदेश रहा है। कि सत्य, अहिंसा, न्याय, कर्म, भाईचारा, नैतिक, मर्यादित, अनुशासित रह सर्वकल्याण रुपी जीवन मानवीय मूल्य ही हमारी सबसे बड़ी धरोहर है और हमारी पहचान भी ।  

मगर अतिमहात्वकांक्षा और स्वार्थो की अवैध संतान ा्रष्टाचार आज हमारे प्रकृति प्रदत्त सिद्धान्त को मुंह चिढ़ा समुची व्यवस्था को ही आंखे दि ााता है। जो हमारी महान लोकतांत्रिक व्यवस्था के अस्तित्च के लिये ग भीर संकट है। 

आज देश को जरुरत है चुनावी व्यवस्था में अमूल चूल परिवर्तन कर हर स्तर पर नागरिक की सहज सहभागिता की  जिससे चुने गये हमारे जनप्रतिनिधियों के निर्णय जनहित, राष्ट्र हित में जनता के बीच अधिक से अधिक स्वीकार्य हो । और नागरिकों सहित व्यवस्था के अंग बने लोगों की जबावदेही तय कर सके। 

क्योंकि वर्तमान चुनाव प्रणाली के रहते हुये जनप्रतिनिधियों में वह समझ और समय ही नहीं मिल पाता कि वह सत्ता के लिये संगठित घोषित अघोषित प्रायवेट या लिमिटेडों के रुप में वैचारिक संगठन से इतर कुछ सोच पाये और सत्ता के लिये संगठित लोगों की मजबूरी यह है कि वर्तमान चुनाव प्रणाली में स्वयं को सर्वोच्च साबित करने आदर्श पुरुषों के आभाव में संसाधन कहा से जुटाये। 

यहीं वो बिन्दु है जहां से धन की स्वच्छोत्री, भ्रष्टोंत्री में तब्दील हो, भ्रष्टाचार का बहाव लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं की नैतिकता, कत्र्तव्य निष्ठा को समेट, कहीं अधिकारों का सैलाब, तो कभी लोकतंत्र के सागर में समा सुनामी लाती है। अब इसे रोकने छोटे-मोटे बधान चेक डेम स्टॉप डेम ही नहीं बड़े-बड़े बांध भी न काफी साबित हो रहे है। 

बेहतर हो कि हम भ्रष्टाचार के उदगम स्थल चुनाव प्रणाली सहित, सामाजिक पर्यावरण में सुधार के लिये सर्वव्यापी सर्वमान्य ऐसी शिक्षा नीति बनाये जो प्राकृतिक सिद्धान्त आधारित हो और विभिन्न स प्रदाओं में स्वीकार्य हो। बरना हम इसी गैर जबावदेह समाज संस्थाओं का दंश झेल, ऐसे ही तार-तार होती हमारी संस्कृति और सडक़ों पर अपमानित मातृ-शक्ति का तमाशा देखते रहेगें। 
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