बगैर सिस्टम सुधार, सफलता असंभव: सतत सत्ता मोह बना बड़ी बाधा

विलेज टाइम्स। जिस तरह से कई अहम क्षेत्रों में सिस्टम भ्रष्टाचार की दीमक का शिकार हो, बेन्टीलेटर पर पड़ा है। उसे जबावदेह बनाये बगैर शायद सुधार अस भव है। मगर इस बीच हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर सरकारों की दृढ़ इच्छा शक्ति मजबूत और राष्ट्र व राष्ट्र के नागरिकों की बेहतरी के लिये समर्पण निस्वार्थ भाव से है तो कोई ताकत नहीं कि सिस्टम में सुधार असंभव हो। 

हालिया केन्द्र सरकार फिलहाल जिस तरह से स्वयं को भ्रष्टाचार की दीमक से दूर रख राष्ट्र निर्माण में पूर्ण समर्पण के साथ जुटी है। इस पवित्रता को निचले स्तर तक पहुंचाने जरुरत है। साथ ही नई-नई तकनीक और उस विश्वास की भी, जिससे कॉलेप्स हो चुके, सिस्टम को पुर्नजीवित किया जा सकेे। तभी सत्ता सीन सरकार को सफलता का मार्ग प्रस्त हो सकता है। अगर इस बीच सरकार ने सतत सत्ता में बने रहने के लक्ष्य के साथ बगैर सिस्टम सुधार के आगे बड़े तो परिणाम ही नहीं पूर्ववर्ती सरकारों का इतिहास सामने है। वर्षो राष्ट्र, जनकल्याण में जुटे रहने के बावजूद वह हमारी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में कहा है।  यह विचार योग्य है और सामने भी है। 

वर्तमान सरकार का नोटबंदी से सबक लेना चाहिए कि 8 नव बर 2016 से बन्द हुये 500-1000 नोटो के बाद 2000 का नोट प्रचलन में आया। जबकि निर्धारित नीति अनुसार 24000 प्रति सप्ताह अर्थात 1 माह में 1 लाख से अधिक निकासी सिवाय शादी विवाह वाला को छोड़ निकासी पर बन्दिस थी उसके बावजूद सडक़ व घरों में करोड़ों की तादाद में पकड़े गये नये नोट और लाइनों में लग 2 हजार, 4 हजार रुपये को कलफते लोग सड़े सिस्टम की हकीकत समझने काफी है। जो यह कहती है कि पूर्व प्रधानमंत्री लगभग 30 वर्ष पूर्व जो सच्चाई सिस्टम की बया की वह दिल्ली से 1 रुपया डालते है जनता तक 15 पैसे ही पहुंच पाते है। उस समय उन्हें विपक्ष के हास-उपहास का शिकार होना पड़ा था। 

मगर 30 वर्ष बाद प्रमाण सामने है कि हमारे सिस्टम की लाइनों में कितने बड़ा लीकेज है और ताकतवर रसूखदार लोग किस तरह अपनी स्वार्थ पूर्ति करने लाइनों को फाड़ डालते है। या ऐसी घटिया लाइनें बिछाते है जिनके लीकेज से उनका कारवां  चलता रहे। 

अगर सतत सुख त्याग राष्ट्र, जनहित में आगे बड़ा जाये तो हो सकता है सिस्टम भी सुधार जाये और पुन: सत्ता भी हासिल हो जाये, मगर जोखिम बहुत है। 
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