दिशा तो ठीक, दशा का क्या करें: लोकहित में बड़े निर्णय

व्ही.एस.भुल्ले। जिस तरह से प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत सरकार राष्ट्र, जनहित में एक के बाद एक बड़े-बड़े निर्णय ले रही है, उनकी दिशा तो ठीक है। मगर दशा को लेकर समय-समय पर कई सवाल बने रहते है। अगर प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में हो रहे बड़े निर्णयों से राजनीति को अलग कर दिया जाये, तो राष्ट्र लोकहित को लेकर संदेह और अतार्किक सवाल उचित नहीं। 

क्योंकि विगत ढाई वर्ष में सरकार की कार्यप्रणाली एवं देश को दीमक की तरह चाट रहे, भ्रष्टाचार को लेकर कोई सवाल है तो वह न ही क्रियान्वयन को लेकर और न ही लेट लतीफी को लेकर। आज जब गांव से लेकर शहर तक प्रदेश सरकारें नीतियों बनाने व क्रियान्वयन की प्रमाणिकता को लेकर ऐड़ी चोटी का जोर लगा परिणामों की मोहताज हो जाती है। ऐसे में भारत सरकार में होने वाले बड़े निर्णय और जमीनी स्तर तक उनके क्रियान्वयन की झलक खास कर, जो सीधे केन्द्र से संचालित है, आम लोगों को दे ाना, करेप्ट और कॉलेप्स हो चुकी व्यवस्था में काबिले गौर है। मगर कई विपक्षी दलों की सरकारों वाले प्रदेशों में सरकारों के नफानुकसान की अरुचि के चलते वह परिणाम गांव, गली, गरीब तक उस रफतार और प्रमाणिकता के साथ नहीं पहुंच पा रहे। शायद लोकतंत्र में संघीय व्यवस्था की यहीं कमजोरी है। 

नहीं तो जनधन, प्रधानमंत्री बीमा, स्वच्छता अभियान में शौचालय निर्माण, कौशल विकास, स्टार्टप प्रधानमंत्री आवास, मुद्राकोष प्रधानमंत्री किसान बीमा, उज्जवला कुछ ऐसी साफ सुथरी, लोकहित की योजनाएं है जिनका पूरी निष्ठा ईमानदारी से क्रियान्वयन हो जाये तो गरीब की आंखों में सीधे लोक कल्याण के दर्शन किये जा सकते है। 

अब जबकि कालाधन, भ्रष्टाचार, आतंक के खात्मे की खातिर देश में हुई 500-1000 की नोटबंदी को अब  50 दिन गुजर, एक मर्तवा फिर से प्रधानमंत्री ने बड़े निर्णय लेते हुये किसान कारोबारी, सीनियर सिटीजन (बुजुर्ग) मातृशक्ति, बेरोजगारों के हित में एक और लकीर खीची है। ऐसे में देखना होगा प्रधानमंत्री के अनुरोध पर हमारा जि मेदार तंत्र किस दिशा में देश को ले जाता है। 

मगर देश के प्रधानमंत्री का 31 दिस बर 2016 को देश के नाम हुआ स बोधन लोक, देश हित ही नहीं, लोकतंत्र की मजबूती के लिये लिया गया सबसे बड़ा निर्णय है। उन्होंने राष्ट्र जनहित की खातिर न तो किसी को निशाना बनाकर चुटकी ली, न ही विपक्षियों पर पलटवार किया बल्कि एक प्रधानमंत्री के रुप में उन्होंने कई वैचारिक महापुरुषों के नाम का उल्लेख करते हुये यह साफ कर दिया कि वह सिर्फ और सिर्फ राष्ट्र, जनसेवा करना चाहते है। फिर लोग उनके द्वारा की जा रही राष्ट्र सेवा का मतलब जो भी निकाले। 

बहरहाल देश के प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में देश जिस दिशा में चल पड़ा है ज्यादा नहीं तो जनधन, मुद्रा कोष, स्वच्छता, आवास, बीमा, किसान, बीमा कैश लैश, कौशल बीमा, मातृत्व सुरक्षा, स्टार्टप पर ही कुछ संसोधनो के साथ ठीक से काम शुरु कर दिया जाये, तो शेष ढाई वर्ष में परिणाम ही कुछ और होगें। जिसकी कल्पना शायद न तो स्वयं प्रधानमंत्री जी ने की होगी, न ही देश वासियों ने। 

दूसरा देश का जो सबसे बड़ा मसला है, जो देश को सशक्त, स पन्न, खुशहाल बनाने में एक बड़ी बाधा है उस पर ढाई वर्ष बाद भी कोई कार्य नहीं हो सका। जब तक इस मसले का स्थाई समाधान प्रधानमंत्री नहीं कर लेते, तब तक  सारे प्रयास इसी तरह लाख प्रयासों के बावजूद भी अक्षम साबित होते रहेगें। बेहतर हो भारत सरकार, देश वासियोंं सहित लोकतांत्रिक संस्थाओं का स मान करते हुये राष्ट्र, जनहित, कल्याण में शुरु हुये इस महा अभियान को मुकाम तक इन्हीं के सहयोग से पहुंचाये, क्योंकि देश में प्रतिभाओं और राष्ट्र भक्तों की कमी नहीं। जरुरत उनका पता कर उन्हें प्रोत्साहन दें। उनके सहयोग से देश के लिये उनके प्रतिभा के दोहन की है। 
जय स्वराज
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