क्या हासिल होगा, इस कोहराम से....?

व्ही.एस.भुल्ले। माननीयों अब हमें संदेह ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि कुछ तो ऐसा हो रहा है हमारे बीच, हमारे महान लोकतंत्र में, जो आप लोकतांत्रिक व्यवस्था को तिलांजली दें, अपने राजनैतिक स्वार्थ, नफानुकसान अहम अहंकार के चलते अपना कत्र्तव्य निर्वहन नहीं कर पा रहे, आखिर क्यों? 

आजादी के 70 वर्ष बाद, आज भी 83 करोड़ के लगभग सस्ते राशन तथा 60 फीसदी के लगभग अनपढ़ होने के बावजूद अपने नौनिहालों को अपनी पर परागत सांस्कृतिक, संस्कारवान शिक्षा दिलाने मोहताज है। और आप लोग है जो लोकतंत्र, राष्ट्र, जनहित के नाम कोहराम मचाने में मशगूल है। 

जब हम नंगे, भूखें, गांव, गली के गरीब लोग लोकतंत्र, लोकतांत्रिक व्यवस्था की समझते है। तो फिर आधे से अधिक समझ, रखने वाले आप जैसे मूड़धन्य लोगों को लोकतंत्र की समझ क्यों नहीं? 

अगर यह समझ आप लोगों को नहीं, तो स्वराज के लिये संघर्षरत हम गावं, गली के गरीब लोग आपको बता देते है। कि सत्ताधारी दल को देश की जनता, राष्ट्र व जनहित में काम करने तथा गरीबों का कल्याण करने के लिये 5 वर्ष  तक का समय देश की जनता देती है। अगर सरकार या सत्ताधारी दल राष्ट्र, जनहित के विरुद्ध कार्य करते है। तो विपक्ष को भी जनता, सदन से लेकर सडक़ तक विरोध करने की इजाजत देती है। और लोकतंत्र में यह सत्ताधारी दल और विपक्ष सहित सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह पूरी निष्ठा ईमानदारी के साथ देश व देश की जनता की सेवा निर्भीक होकर करे। और अपने-अपने संवैधानिक कत्र्तव्यों का पालन करे, तो फिर आय दिन देश में कोहराम क्यों? आप भी शान्ति से अपना कत्र्तव्य निर्वहन करें। और हमें भी कड़े संघर्ष के साथ कत्र्तच्य अपना कत्र्तव्य निर्वहन कर, हमें हमारा खुशहाल जीवन जीने दें। 

आय दिन के आपके भ्रम पूर्ण आरोप-प्रत्यारोपों को लेकर मचने वाले कोहराम से हम गांव, गली के गरीब लोग हैरान परेशान ही नहीं भ्रमित भी हो रहे है। कम से कम हम गांव, गली, गरीब पर न सही, स्वयं अपने आप और अपने मातु संगठनों पर ही रहम कर लो, जिनकी वैचारिक महानता, आय दिन आप लोगों के बीच होने वाले आरोप-प्रत्यारोपों के चलते सडक़ों पर तार-तार नजर आती है। और आप लोगों की कड़ी मेहनत और हमारी आस्था सवाल खड़े करने पर मजबूर हो जाती है। 

मगर हालिया हालात ये है कि जन, राष्ट्र सेवा के नाम सस्ती लोकप्रियता हासिल करना, सत्ता में बने रहना या उसे हासिल करना अब देश में एक नई पर परा बनती जा रही है, फिर उसके लिये कीमत जो भी हो। जिसकी परवाह शायद किसी को नहीं।  

मगर इस तरह के कार्य व्यवहार से न तो लोकतंत्र चलता है, न ही वह हमारे बीच स्वछन्द रुप से जिन्दा रह सकता है। फिर ऐसे में स्वच्छ मजबूत लोकतंत्र की कल्पना करना सिर्फ बैमानी नहीं तो और क्या। ? 

बेहतर हो माननीयों लोकतंत्र की रक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाये रखने हम सब मिल-जुल कर अपना अहम अंहकार, स्वार्थ महात्वकांक्षा छोड़ उस महान लोकतंत्र की रक्षा करें। जिसे हासिल करने हमारे पूर्वज ही नहीं हमारे महान नेता, गांव, गली, गरीबों ने वैभाव कुर्बानियों दी है। इतना ही नहीं हम अपनी आने वाली पीढिय़ों को तभी स्वाभिमान के साथ मुंह दिखा पायेगें। जब हम हमारी महान विरासत को सुरक्षित रख स्वराज, खुशहाल, स पन्न जीवन का सपना पूरा करने अपना-अपना कत्र्तव्य पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ निभायें। दुष्वारियों कई हो सकती है। क्योंकि दल वैचारिक सिद्धान्त: होते है जिनमें उनकी महानता, राष्ट्र सेवा छिपी होती है फिर वह जो भी हो, मगर हमारा आचार व्यवहार ही हमें सच्चे भारत वासी होने की पहचान दिलाता है। 
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