विपक्ष का विरोध कितना जायज,सटीक समय पर, सही सवाल

व्ही.एस.भुल्ले | देश को दिक्कत सरकारों के निर्णयों से नहीं, उनके क्रियान्वयन व स भावित परिणामों को लेकर ज्यादा होती है। क्योंकि परिणाम विहीन या परेशानी परोसने वाले निर्णयों का दंश, देश ही नहीं आम देश वासी को भोगना पड़ता है। जिसमें सबसे बड़ा संकट तो देश में निर्णयों के पश्वात कुर्तक पूर्ण उस बहस बाजी से है जो न तो जनहित में होती और न ही उस बहस में दूर-दूर तक राष्ट्र हित नजर आता है। इस सबकेे बावजूद ाी देश हित, जनहित के नाम पर जब भी अहम निर्णय देश में होते है। तो टी.व्ही. चैनलों पर बहस और राजनैतिक दलों के बीच राजनैतिक उटा-पटक शुरु हो जाती है। यहां तक कि जनता में अपने-अपने वोट बैंक को पक्का करने दलों के बीच तर्क-कुतर्क की होड़ मच जाती है। और आम गांव, गली, गरीब की सारी आकांक्षायें आशाये,इन दलों के आचरण व्यवहार देख मायूस हो, धरी की धरी रह जाती है। 

      मगर कहते है देर आये दुरुस्त आये कम से कम सटीक समय पर सही सवाल और भाषा सहित बॉडी,  लेंंग्यूज में तो कुछ समानता के साथ सुधार दिखा। जिसे देखकर आज हताश-निराश कॉग्रेसी सन्तोष अवश्य व्यक्त कर सकते है। और अपने भावी नेतृत्व के सरकार पर तर्क पूर्ण हमले को देखकर जमीनी स्तर पर सत्ता पक्ष पर तर्क पूर्ण हमले तेज कर सकते है।  

   हालिया मसला है देश में कालाधन, आतंकवाद, भ्रष्टाचार से निवटने सरकार के उस निर्णय का जिसे उसने अचानक ले 500-1000 के नोट बन्द करने की घोषणा कर डाली। जिस पर देश के सबसे बड़े दल के नेता राहुल ने निर्णय का स्वागत और भीड़ भरी लाइन में लग, जनता का मनोबल बढ़ा परेशान लोगों को मदद करने का मन बनाया। साथ ही उन्होंने यह सवाल भी किया कि बगैर पूर्ण तैयारी के इतना बड़ा निर्णय और क्रियान्वयन में कमी उचित नहीं, लोग पेरशान हो रहे है। मगर सदन में सरकार के विपक्ष पर जबावी हमले ने आम में घी का कार्य किया। परिणाम कि पूरा सदन का सत्र कोहराम की भेंट चढ़ गया। इस बीच देेश के प्रधानमंत्री नोटबंदी को लेकर भले ही सदन में कुछ न बोल पाये हो। और उन्होंने विपक्ष पर सदन में न बोलने देने के आरोप लगायें हो। इतना ही नहीं, उन्होंने प्रधानमंत्री की पद गरिमा से इतर विपक्षियों को जबाव देने सार्वजनिक मंचों से खूब बोला। यहां तक कि इस विवाद में भाजपा प्रवक्तओं द्वारा देश के पूर्व प्रथम प्रधानमंत्री स्व. पण्डित नेहरु कॉग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उपाध्यक्ष राहुल गांधी को भी न जाने उनकी संस्कृति अनुसार क्या-क्या नहीं कहा। जब जबावी हमले में कॉग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल आये तो उन्होंने भी सीधे देश के प्रधानमंत्री पर सीधा निशाना साध, साथ ही संसद के सेन्ट्रल हॉल में प्रेस कॉन्फ्रे्रन्स कर देश को बताया कि उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा। क्योंकि उनके पास प्रधानमंत्री से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तिगत जानकारियां है। जिसे वह सदन में रखना चाहते है। 

      इसके बाद जब प्रधानमंत्री द्वारा अपने सांसदों को कैस-लैस के फायदे समझाने बुलाया उस समय देश की पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा जी की ओर इसारा करते हुये कहा कि अगर सन 1971 में उस समय ही नोटबंदी हो गयी होती तो देश की ऐसी स्थिति और उन्हें नोटबंदी जैसा निर्णय नहीं लेना पड़ता। 

        मगर फोर्म में आ चुके राहुल यहीं पर नहीं रुके और अगले ही दिन वह सार्वजनिक सभा में वह प्रधानमंत्री की मंशा और सरकार की कार्यप्रणाली पर जमकर बरसे और गरीब मजदूर, किसानों के कष्टों को लेकर सरकार पर टूट पढ़े शायद राहुल के लिये भी यह पहला मौका था और देश के लिये भी जो उनकी भाषा और बॉडी लेंग्यूज में समानता दिखी। अब राहुल के इस हमले से सरकार पर क्या असर हुआ यह तो सरकार ही जाने। मगर कॉग्रेस के निराश कार्यकत्र्ताओं में खासा संदेश गया, जिसकी कॉग्रेस को ल बे समय से दरकार थी। 

      बहरहाल जो भी हो लोककतंत्र का तकाजा है अगर जनता द्वारा चुनी हुई सरकार जनहित, राष्ट्रहित में कोई निर्णय ले तो, विपक्ष को अपने पक्ष को तर्क के साथ रख, धैर्य रखना चाहिए। साथ ही भाषा, बॉडी, लेंगयूज आम जन में समझ स्वीकार्य हो,  ऐसा प्रयास होना चाहिए तब तो विरोध ठीक है। मगर जब सत्ताधारी दल स्वयं विपक्ष के आचरण पर उतर आये तो यह लोकतंत्र के लिये घातक है। क्योंकि सरकार के निर्णय का तर्क संगत विरोध विपक्ष का हक और उसे सुनना सत्ता पक्ष की जबावदेही होती है। बेहतर हो कि राष्ट्रहित, जनहित में सभी अपनी-अपनी जबावदेही निभायें। तभी  हम सरकारों द्वारा राष्ट्र हित, जनहित में लिये जाने वाले निर्णयों के सार्थक परिणामों की उ मीद कर सकते है। 

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