अस्तित्व की जंग में तब्दील सियासत: अहम अहंकार के आगे हलाकान जनाकांक्षा

व्ही.एस. भुल्ले। देश की सियासत में मसला नोटबंदी का हो, या फिर राष्ट्र भक्ति का अस्तित्व की जंग में तब्दील सियासत अहम अंहकार डूब जनाकांक्षाओं को लहुलुहान करने पर तुली है। जिसे देख देश तो स्तब्ध है ही आम गांव गरीब, गली भी हलाकान है, अब इसके पीछे कारण जो भी हो। 

मगर वर्तमान हालातों की हालिया समीक्षा की जाये तो इसके पीछे कई कारण हो सकते है। जिसमें प्रमुख कारण में से एक कारण वैचारिक तो, दूसरा कारण व्यवहारिक आचरण भी हो सकता है। जिसे जब, तब राजनैतिक दल आक्रोशित रुप में देश के सामने तो लाते है। मगर देश को पूरा व्यवहारिक सच नहीं बताते। 

आज देश में मौजूद जो राजनैतिक दल अपना वैचारिक आधार और अस्तित्व को बचाये रखने, अहम अंहकार में डूब, जनाकांक्षाओं को रौधने का असफल प्रयास कर रहे है। जो संस्कृति स यता सभी को दांव पर लगा, देश ही नहीं हमारी महान लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ भी  िालबाड़ कर रहे है। उन्हें यह समझना चाहिए कि उनका यह आचरण आम जनता के लिये ही नहीं हमारे महान देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये भी खतरनाक है। 

यह अलग बात है कि लोकतंत्र को बनाये रखने, चलाये रखने वैचारिक आधार पर गठित इन दलो के संस्थापकों ने कभी सपने में भी न सोचा होगा कि वैचारिक तौर पर जन सेवा, जनाकांक्षा पूर्ति के सशक्त माध्ययम बनने वाले यह दल कभी नेताओं के स्वयं स्वार्थो के चलते, उनके अहंम अहंकार में उलझ इनके वैचारिक मतभेद के स्थान पर मन भेद का भयानक रुप धारण कर लेगें। जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये धीमा जहर साबित हो सकता है। जिसके चलते जो दल वह राष्ट्र सेवा, जनसेवा के लिये गठित कर रहे है कभी इनका अस्तित्व भी स्वार्थो की भेंट चढ़ दांव पर लग सकता है। 

दूसरा प्रमुख और अहम कारण यह हो सकता है कि जो आचरण दलो का व्यवहारिक तौर पर उनका प्रतिबि ब होता है। जब वह धुंधला होने लगे तो उसके प्रतिबि ब में एक बड़ा बदलाव आता है। जो वैचारिक और व्यवहारिक तौर पर  भारतीय राजनीति में समय-समय पर देखा गया है। मगर सत्ता के अहंकार और सियासी दांव पैचो के बीच आज जनाकांक्षायें कलफ रही है, जो किसी से छिपा नहीं। 

आज दलो का जो आचरण व्यवहार सदन के अन्दर और सडक़ों पर परिलक्षित हो रहा है वह बड़ा ही शर्मनाक है। अगर हम यो कहें कि विपक्ष अभी भी सत्ता मद को नहीं छोड़ पा रहा तो, सत्ताधारी दल विपक्ष का मोह नहीं त्याग पा रहा है। अगर इसमें कोई पिस रहा है, तो वह गांव, गली, गरीब जो अपने चुने हुई जनप्रतिनिधियों मेंं अपनी समस्या निदान को प्रतिबि ब खोजते है। मगर अफसोस कि आज वह इन दलो के आचरण व्यवहार को देख हताश ही नहीं निराश भी है। 
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment