सरकार, शासकोंं का आचार व्यवहार सेवक का हो, संस्कृति में सेवक की स्वीकार्यता है, न कि शासक की

व्ही.एस.भुल्ले। आज हमारे महान लोकतंत्र में जिस तरह का अनुशासन विहीन आचरण, व्यवहार का प्रदर्शन चल रहा है उसकी स्वीकार्यता संस्कृति में कभी नहीं रही। एक अच्छा सेवक हमेशा अनुशासित रहने के बावजूद अच्छा शासक भी साबित होता है, बशर्ते  वह स्वयं भी अनुशासित हो। 

मगर इस सब के उलट जिस तरह से सेवा के नाम हमारे लोकतंत्र में संस्कृति, अनुशासन विहीन व्यवहार हो रहा है। उससे लोग विचलित ही नहीं, परेशान है क्योंकि अब हमारा नव स्थापित सिद्धान्त दरकने लगा है। और जनतंत्र लोकतंत्र के नाम भीड़ तंत्र का दब-दबा बढ़ रहा है। जिसके पीछे जितनी भीड़ वह उतना ही महान और ज्ञान, बान, सर्वमान्य साबित हो रहा है। जो किसी भी सभ्य समाज या संस्कृति प्रधान राष्ट्र के लिये स्वार्थो की पराकाष्ठा ही है। 

अगर स्वार्थ पूर्ति और यहीं सब कुछ सर्वोत्तम जीवन की महानता है और यहीं सर्वोच्च स्वीकार्यता है तो फिर जंगली और मानवीय जीवन में क्या अन्तर है। ऐसी स्थिति में जानवरोंं के झुण्ड को तो सर्वोच्च स्थान प्राप्ति होना चाहिए। हालाकि वह जानवर होने के बावजूद अनुशासित कर्तव्यनिष्ठ, कर्मवीर, संस्कृति को सर्वोच्च मान आचरण व्यवहार का पालन करते है।

मगर मानव के रुप में सर्वमान्य जीव के रुप में न तो हम अनुशासित रहे और न ही संस्कृति, प्रधान अनचाहे बदलाव के दौर में जिस तरह हम अपनी संस्कृति को और धार-दार बनाने के बजाये उसे रौंध कुचलने पर तुले है। जो मानव स यता के खिलाफ है। कारण महान बनने की दौड़ और इस महान जनतंत्र की तालियों को अपने में समेट लेने की लालसा है। बरना क्या कारण है कि प्रकृति पुत्र दूर दूरान्चल जंगलों में भी स्वच्छन्द जीवन सरकारों की ला ा कोशिसों के बावजूद नहीं जी पा रहे। 

कारण साफ है कि हमारी सरकारों व्यवस्था को चलाने वाले सेवक बनने के बजाये शासक बनने में अधिक दिलचस्वी दिखा रहे है। आज इसी आचरण व्यवहार के चलते जिस तरह अनुशासन, संस्कृति का समाज ही नहीं व्यवस्था में स्वार्थो के चलते छरण हो रहा है। वह आने वाले इस समाज और व्यवस्था को कहीं का नहीं छोड़ेगा। प्रकृति तो सन्तुलन स्थापित करने फिर व्यवस्था बना लेगी। मगर हजारों वर्ष की मानवीय स यता व स्थापित संस्कृति जो मानव जीवन को समृद्ध खुशहाल बनाती है शायद हमारे बीच शेष न होगी। 

जय स्वराज .........?
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