गुलामी की नजीर, सभ्य समाज में शर्मनाक, आत्मरक्षा शुल्क

व्ही.एस.भुल्ले। सुरक्षा की गारन्टी देने वाली सरकार संसाधनो के आभाव में आम नागरिक को जब स पूर्ण सुरक्षा देने में असमर्थ रहती है। तब आत्म रक्षा हेतु शस्त्र लायसन्स देने का कानून में प्रावधान है। जिसके तहत लोग आवेदन पश्वात तमाम जांच उपरान्त शस्त्र लायसन्स हासिल कर मंहगे दामों  पर स्वयं की सुरक्षा हेतु शस्त्र खरीदता है। और सरकार द्वारा नियम कानूनों का पालन कर उसे अपने पास रखता है। लेकिन हर 3 वर्ष में रिन्युबल के नाम बसूले जाने वाला शुल्क न के बराबर था मगर सरकारों की धृष्टता देखिये कि मनमाने ढंग से शुल्क बढ़ा आम नागरिक को यह सोचने पर मजबूर दिया कि वह शायद आज भी गुलामी भरा जीवन जी रहा है। जिसे स्वयं के द्वारा चुनी सरकारों के रहते स्वयं की सुरक्षा हेतु शस्त्र लायसन्स रखने अब उसे शुल्क भी चुकाना होगा। 

जनसेवा के नाम सत्तारुढ़ होने वाली सरकारों ने अगर एक छड़ भी सच्ची जनसेवा की होती तो सुरक्षा के नाम और मजबूत होता गुलामी का प्रतीक और कलंक में तब्दील हो, शस्त्र लायसन्स शुल्क लग, स य समाज को कलंकित नहीं करता। न ही अपनी नाकामयवियों को छिपाने नौकरशाहों का यह झुण्ड जनसेवा, जनकल्याण का ढिंढौरा पीटने वाली सरकारों की आड़ में आजादी से लेकर आज तक कि नाकामी छिपाने अंग्रेजों के बनाये आ र्स लायसन्स नियम को दासता का प्रतीक बना पाता, जो आज आजाद भारत के लोकतंत्र का कलंग बन, सुरक्षा के नाम महिमा मण्डित हो लोगों के जमीर पर प्रहार कर रहा है।  

कितना शर्मनाक है जब एक आजाद देश में स्वयं के द्वारा चुनी हुई सरकारों के बीच स्वयं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और अपनी सरकार नौकरशाही की सुरक्षा न दे पाने की नाकामयाबी को छुपाने आत्मरक्षार्थ आ र्स लायसन्स लाख परेशनियों के बाद वह नागरिक हासिल कर पाता है। जिसके दिये टेक्स से ये सरकारें और नौकरशाही चलती है।  वह भी तमाम नियम कानून निर्देशों का पालन करते हुये, आज जबकि हम जरा-जरा सी बातों पर बल्बा की ओर अग्रसर है। और पुलिस का आलम घटना के बाद लिखा पढ़ी तक सीमित हो चला है। ऐसे में देश के नागरिक से आ र्स लायसन्स रिन्युबल के नाम 2500-3500 रुपये की शुल्क बसूला जाना। सरकार और शासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। जबकि देश के हर नागरिक को सुरक्षा मुहैया कराने की जबावदेही सरकार और शासन की होती है। 

मगर अपने ही वोट से चुने जाने वाली सरकार और अपने ही धन से पोषित शासन को उनकी नाकामी का कर आखिर जनता कब तक  चुकायेगी जबकि देश को आजाद हुये 70 वर्ष हो चुके है। कब तक सरकारें अंग्रेजों के बनाये कानूनों का कलंक माथे पर लिये घूमेगी। 

जो नेता कभी पैदल वोट मांगते थे वहीं आलीशान कारों, हैलिकॉप्टरों, जहाजों में घूम रहे है। जो नौकरशाह जीपों में बैठ धूल पाकते घूमा करते थे वह आलीशान ए.सी. ऑफिसों में बैठ लग्झरी वाहनों में घूम रहे है। 

मगर र्दुभाग्य देश के गांव गरीब, किसान का कि उसे अपनी ही सरकारों के रहते स्वयं की जान-माल की रक्षा सुनिश्चित करने लायसन्स रिन्युबल शुल्क के नाम पर, जजिया कर की तरह आत्म रक्षा के लिये शुल्क चुकाना पड़ रहा है जो विशुद्ध गुलामी की नजीर तो है ही, स्वस्थ लोकतंत्र के नाम देश के नागरिकों से मजाक के साथ किसी भी स य समाज को शर्मनाक भी है।  
जय स्वराज ...........?  
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