कॉग्रेस वैचारिक ही नहीं, केडरबेस पार्टी थी, है, और रहेगी, नेतृत्व जो भी रहा हो

व्ही.एस.भुल्ले। कहते है किसी भी वैचारिक दल में जनकल्याणकारी, राष्ट्र कल्याणकारी और स्वयं का कल्याणकारी नेतृत्व समय-समय पर आते जाते रहे है...

व्ही.एस.भुल्ले। कहते है किसी भी वैचारिक दल में जनकल्याणकारी, राष्ट्र कल्याणकारी और स्वयं का कल्याणकारी नेतृत्व समय-समय पर आते जाते रहे है। तथा समय परिस्थिति अनुसार अपना कत्र्तव्य निर्वहन भी करते रहे है। फिर देश में दल जो भी रहे हो, या हो, हर वैचारिक दल का लगभग यहीं इतिहास रहा है। 

जहां तक कॉग्रेस को लेकर उठे सवाल पर नजर डाले तो, सन 1885 से ओ.ए हयूम से लेकर देश अन्दर अस्तित्व में आयी कॉग्रेस का, संस्थापक भले ही अंग्रेज रहा हो, मगर कॉग्रेस ने देश को बड़े-बड़े नाम दिये। जिन्होंने देश को आजादी से लेकर विश्व के आन्दोलनों को कई मर्तवा दिशा व दशा भी दी। जिसके चलते गांधी जी के वैचारिक स्वरुप व मोतीलाल, नेहरु सहित इन्दिरा के नीतिगत सिद्धान्तों को एशिया, यूरोप, अफ्रीकी देश ही नहीं अन्य देशों में भी स्वीकार किया गया। 

वहीं सन 1926 में गठित एक निस्वार्थ राष्ट्र भक्त तपस्वी केडर वैश संगठन का भी भारतीय राजनीति में अपना अलग योगदान रहा है। जिसे भी भारतीय परिपेक्ष में नकारा नहीं जा सकता। जो कि पूर्णत: केडर वैश संगठन है, जिसने भी देश को कई राष्ट्र, जनसेवक त्याग पुरुष व्यक्तित्व दिये। 

मगर देश का र्दुभाग्य यह है कि आज भी कई ऐसे लोग जो स्वयं स्वार्थ में डूब, लोगों के बीच अपनी सल्तनत कायम रखने, सामूहिक, व्यक्तिगत रुप से संगठनों की नई-नई परिभाषायें गढ़, देश के युवाओं को भ्रमित कर नया इतिहास पढ़ाना चाहते है। जिसके लिये कुछ हद तक बौद्धिक जगत भी जि मेदार है जो चुप रह, या स्वयं के स्वार्थो में डूब ऐसे लोगों को सच नहीं बताना चाहते जो इतिहास ही पलटने पर उतारु है।  

बहरहाल जहां केडर वैश समर्थन वालो का दल देश की सर्वोच्च सत्ता में है। वहीं वैचारिक कैडर वैश पार्टी अपनी गलतियों और स्वार्थियों, राजनैतिक दुश्मनों के जमघट के चलते सारा वैभव गवां विपक्ष में है। आज उसी दल के स्वार्थ में डूबे तथा कथित नेता अपने-अपने नफा-नुकसान के साथ समय-समय पर उसे परिभाषित करने से नहीं चूक रहे है। 

मगर ऐसे नेताओं के बार में कॉग्रेस के मौजूद नेतृत्व को समझना होगा कि न तो विचार व्यक्तिगत होता है और न ही उसे किसी संगठन की सीमा में बांध, उसका भविष्य, भूत, नफा नुकसान के आधार पर तय किया जा सकता है। क्योंकि विचार सर्वभौमिक और सर्व कल्याणकारी होता है। यह वह विधा होती है जिसके आधार पर लोग अपना लक्ष्य तय कर राष्ट्र जनकल्याण के लिये एक कैडर तैयार कर जीवन जीते है। 

आज बड़ा दर्द होता है जब लोग कॉग्रेस को केवल एक वैचारिक संगठन की संज्ञा दे उसे केडर वैश के महानतम मार्ग से दरकिनार कर देते है। जबकि बाल गंगाधर से लेकर लाला लाजपतराय, गांधी, नेता सुभाष चन्द्र बोस, मोती लाल, जवाहर लाल, सरदार बल्लभ भाई, मौलाना अब्दुल कलाम, शास्त्री इन्दिरा, राजीव तक केडर वैश का पालन हुआ है। 

जिसके चलते कॉग्रेस कई मर्तवा सत्ता से बाहर हुई तो कई मर्तवा उसे अपना समुचा वैभव गबाना पड़ा। मगर इस सबके बावजूद भी देश में कॉग्रेस जैसा वैचारिक कैडरवैश संगठन खड़ा है और था है और रहेगा भी। 

कारण साफ है कि कॉग्रेस की तरह देश के समक्ष और कोई संगठन डटकर खड़ा नहीं रह सकता। क्योंकि उसके पास उसका वैचारिक कैडर युक्त व्यवहारिक आधार है। जिसे स्वयं स्व. राजीव गांधी ने भी आगे आकर सेवादल के रुप में खड़ा किया। जिन्हें उसी कैडर के चलते देश में पहचान मिली। मगर षडयंत्रकारी स्वार्थियों ने विगत 24 वर्षो में स्वयं के स्वार्थो के चलते इस महान वैचारिक कैडर वैश संगठन को नेतृत्व की मजबूरियों का ला ा उठा निश्तनानाबूत कर दिया। स्व. राजीव गांधी को आत्मीय पहचान किसी छवि चमकाऊ क पनी या चापलूसों के सहारे नहीं मिली। बल्कि उन्होंने सेवादल जैसे समाज से भी संगठन की अगुआई कर समुचे देश का भ्रमण व कॉग्रेस सिद्धान्तों का पालन कर हासिल की थी। और उन्होंने जिन्दा रहने तक उसका पालन किया। इस बीच बौफोर्स से लेकर उन पर कई इल्जाम सत्ता लोलुपों द्वारा लगाये गये। मगर वह अपने सिद्धान्तों के चलते कॉग्रेस के कैडर को बचाये रखने पुन: प्रधानमंत्री बनने के लिये संगठित या स्वार्थी दलो के अगुआ नहीं बने। इसके उलट उन्होंने विपक्ष में बैठना स्वीकार किया। मगर सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया, ये है कैडर वैश वैचारिक पार्टी। 

अफसोस होता है जब लोग कॉग्रेस को सिर्फ वैचारिक पार्टी कहते है जिसका कोई केडर वैश नहीं। फिलहाल नियति को कोई नहीं टाल सकता। मगर यह सौभाग्य है इस कॉग्रेस का जो लाख दुस्वारियों के बावजूद कॉग्रेस को एक नया और युवा नेतृत्व राहुल के रुप में मिलने जा रहा है। जिसने सत्ता संगठन दोनों का स मान करते हुये। अपने पिता की तरह संघर्ष का रास्ता चुना है। मगर स पर्क का रास्ता वह आज भी बहाल करने में नाकामयाब हो रहे है। जिसको संचालित रखने लगता है उन्हें अभी काफी संघर्ष करना होगा। 

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Village Times: कॉग्रेस वैचारिक ही नहीं, केडरबेस पार्टी थी, है, और रहेगी, नेतृत्व जो भी रहा हो
कॉग्रेस वैचारिक ही नहीं, केडरबेस पार्टी थी, है, और रहेगी, नेतृत्व जो भी रहा हो
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