जनधन पर अघोषित अभियान शुरु: क्या इतना बैवस है, मप्र

व्ही.एस. भुल्ले। बैवजह के मुद्दों पर धमाल  मचा अपने कत्र्तव्यों की इतश्री करने वाला विपक्षी दल, धनी विहीन होने का सबूत भले ही विगत वर्षो से देता आ रहा हो। मगर प्रमुख विपक्षी दल कॉग्रेस को दात देनी होगी कि उसने स्वयं ही संगठन विहीन हो, स्वयं की ऐसी दयनीय स्थिति बना ली है। कि अब लगता नहीं कि वह 2018 में भी वर्तमान हालातों के मद्देनजर सत्ता में लौट पायेगी। 

        कारण साफ है कि पूर्ववत कॉग्रेस आज भी यह तय नहीं कर पायी, खासकर उन उस्तादों के रहते, जिन्होंने कभी एक-छत्र म.प्र. में राज करने वाली कॉग्रेस का यह हाल कर दिया। कि दिल से कॉग्रेस का नाम लेवा, पानी देवा ढूड़े से नहीं मिल रहा। न ही कॉग्रेस को विगत 10 वर्षो से ऐसा कोई नेता मिल रहा, जिसे वह म.प्र. का नेता घोषित कर, सत्ता वापसी को सुनिश्चित कर सके। 

     वहीं दूसरी ओर सत्ता में काबिज सत्ताधारी दल एक बार फिर से जनधन पर सवार, अपने तंत्र के सहारे पुन: सत्ता हासिल करने केअ िायान में जुट चुकी है। कलफते विलखते लोग विगत वर्षो से बर्बाद हो, जनधन और जनसेवा के नाम मची लूट को लेकर हैरान-परेशान है। अगर वह मजबूर है तो मायूस भी है क्योंकि जिस तरह से उसके गाढ़े पसीने की कमाई लुटा, उसे कर्जदार बनाया जा रहा है। जिस तरह से अपने ही प्रदेश में शिक्षित बेरोजगार, रोजगार पाने धक्के खा रहा है। गांव गली, गरीब, किसान, मजदूर परेशान है। मगर उसके पास भी जनधन पर मय अन्डी बच्चों के मजे उड़ा, पुन: सत्ता में लौटने की तैयारी में जुटे लोगों को, रोकने का कोई इन्तजाम नहीं सिवाय बैवसी और मजबूरी के। कभी-कभी यह यक्ष प्रश्र अवश्य अपने से सवाल करता होगा कि आखिर ऐसा क्यो? 

     क्या म.प्र. में स्वार्थी, षडय़ंत्रकारियोंं के चलते लोकतांत्रिक व्यवस्था खत्म हो ली है, जहां न तो विपक्ष, न ही चौथा स्त भ नजर आता है। हालात ये है कि जिन्हें हमारे संविधान ने पूरा संरक्षण प्रदान किया है, वह अमला भी अब अपने-अपने स्वार्थो में डूब, सत्ता के आगे कत्र्तव्य विहीन हो,ं नतमस्तक नजर आता है जैसे कि आम लोगों में चर्चा बनी रहती है। 

      बहरहाल जो भी हो, मगर म.प्र. में तीसरी मर्तवा जनधन के सहारे शुरु हुआ अघोषित चुनावी अभियान, हो सकता है, कि वह पूर्ववत सफल हो जाये, क्योंकि फिलहाल सच यहीं है।  ये अलग बात है कि यहां छोटे-मोटे दल दृढ़ इच्छा शक्ति और धन के आभाव में वह जि मेदारी नहीं नि ाा पाते, जो सशक्त विपक्ष निभाने में असमर्थ है। 2018 में म.प्र. का भविष्य क्या होगा यह आज भी फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। 
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