विकास पुरुष की व्यथा: न उघोग, न अधोरंचना धूमिल हुआ सपना

विलेज टाइम्स। अगर यो कहें कि सर्वाधिक भ्रष्ट लोगों के खिलाफ छापे, कार्यवाहीं अन्य प्रदेशों की तुलना में मप्र में अधिक हुई है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। मगर भ्रष्टाचार कम होने के बजाये दिन दूना रात चौगुना रफतार से बड़ा है। आखिर इसके पीछे के सच जो भी हो। मगर भय, भूख, भ्रष्टाचार मुक्त मप्र का नारा देने वाले मप्र के विकास पुरुष इस मुद्दे पर फिलहाल चुप और व्यथित दिखाई पड़ते है। 

सुना है आजकल वह बगैर किसी आरोप-प्रत्यारोप की परवाह किये बगैर, स्वयं बगैर किसी सूचना शौर शराबा किये सीधे अचानक पहुंच अपनी व्यवस्थाओं का हाल देख दोषियों पर सीधे कड़ी कार्यवाहीं कर रहे है। अब इसके पीछे पवित्र यात्रा के बीच इस तरह की कार्यवाहीं का सच क्या है। यह तो विकास पुरोधा ही जाने। मगर एक सच उनका यह भी है कि जिस तरह से मप्र के सत्ता शीर्ष से सफाई तथा जनसेवा के लिये 13 वर्ष पूर्व दिन-रात संघर्ष शुरु हुआ। वह सार्थक परिणाम नहीं दे सका। जिस तरह से गांव गरीब के लिये खजाना खोल दिया गया और बगैर समय की परवाह किये बगैर जनकल्याण का कार्य हुआ। 

उससे बाह-बाही तो मिली मगर कोई स्थाई परिणाम नहीं मिल सका। लोग आज भी अपने वर्तमान भविष्य को लेकर हैरान-परेशान और गांव गरीब गली के लोग हैरान है। जो आज भी यह सवाल करते नहीं थकते कि आखिर कौन सी ऐसी कमी रही, जो न तो पूर्ण सुरक्षा भाव रोजगार, अधोरंचना निर्माण का कार्य उतना नहीं हो सका। जो परफॉरमेन्स को देख स भावित था।  

फिलहाल उम्मीद से अधिक जनसेवा या संगठन की महात्वकांक्षा से संघर्ष जो भी रहा हो, मगर इन 13 वर्षो में विकास पुरुषों को उस स मान का मुकाम आज तक नहीं मिल सका। सिवाय सतत सत्ता सुख को छोड़, जिसकी हर इन्सान को अपने जीवन में दरकार होती है। जो कार्यो के आधार पर दिल से हासिल होती है। और यह तभी स भव जब ईमानदारी सहयोगी और ईमानदार प्रयास हो, यहीं प्रयास अगर किसी संगठन परस्त या स्वार्थ परस्त व्यक्ति के कार्यो का परिणाम है तो, काश वर्तमान के साथ नौनिहालों के बेहतर भविष्य के लिये बेहतर शुरुआत हुई होती, तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। अब इसे स्वच्छ राजनीति का सौभाग्य कहा जाये या र्दुभाग्य जो विपक्ष विहीन प्रदेश में लोकतंत्र, जनसेवा के नाम खुशहाल जीवन को लोग आज भी तरस रहे है। 
जय स्वराज
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