सनसनी से स्वराज असंभव: संयोजक स्वराज

हमारे महान राष्ट्र में राष्ट्र, जनसेवा के नाम सनसनी फैला सत्ता या सार्वजनिक जीवन में सर्वोच्च स्थान हासिल करने का जो सांस्कृतिक उपक्रम चल निकला है, उसके दिखाये मार्ग पर चल, इस महान भारत में कभी भी स्वराज या खुशहाल, स पन्न जीवन प्राप्त नहीं किया जा सकता। 

    जिस तरह से आज हम स्वराज, खुशहाल जीवन के लिये सामाजिक, राजनैतिक संगठनों की सनसनी के रथ पर सवार निहित स्वार्थ, अहम अहंकार के चलते एक दूसरे को नीचा दिखा स्वयं की सर्वोच्चता हासिल करने का असफल प्रयास कर रहे है। वह कुदरत के प्राकृतिक सिद्धान्त का उल्लघंन तो है ही, बल्कि मानवीय स यता के खिलाफ होकर, लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये भी सबसे बड़ा खतरा है। 

     सकारात्मक सामाजिक विकास में बगैर किसी को ठेस पहुंचाये संगठनात्मक या व्यक्तिगत कार्य विधि की इजाजत प्रकृति भी हमें देती है। बशर्ते आपके कार्य, व्यवहार से प्राकृतिक सिद्धान्त या सकारात्मक, कल्याण उन्मुखी गतिविधि, स्वच्छन्द जीवन जो अनुशासित है, प्रभावित न हो। 

        मगर र्दुभाग्य कि सर्वोच्च आध्यत्मिक भू-भाग व महान विभूतियों की जन्म स्थली रहे, भू-भाग पर स्वयं की संस्कृति में छिपे अध्यात्म ज्ञान, विज्ञान को भुला हम खाना बदौसो की तरह अपने पूर्वजों की महान संस्कृति को कलंकित कर स्वयं को महान कहलाने का भ्रामक प्रयास कर रहे है। 

      जिसके चलते आज हमारी नई विकृत संस्कृति ने हमारे ही बीच अवैध जन्म ले, स्वयं का नामाकरण सनसनी के रुप में कर लिया है जो हमें और हमारे महान राष्ट्र को, कहीं का भी नहीं छोडऩे वाली। 

      ये सही है कि लोकतंत्र के नाम जिस तरह से सत्ता तक पहुंचने या समाज में सर्वोच्च स्थान हासिल करने भीड़तंत्र का प्रभाव हमारे बीच बड़ा है। वह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च सत्य हो सकता है। जिस राष्ट्र भू-भाग पर मर्यादा कर्म, समानता, प्रेम, अनुशासन व मिल-जुल कर ईमानदारी से अपना कर्म बगैर किसी को कष्ट पहुंचाये खुशहाल एवं स्वाभिमानी जीवन जीने की पर परा रही हो। जहां कि शिक्षा, संस्कृति में माता-पिता के साथ गुरु-शिष्य की महान पूज्यनीय पर परा रही हो। उस महान राष्ट्र में चन्द चालाक, चापलूस स्वार्थियों के झुण्ड के आगे, इस महान राष्ट्र के महान नागरिकोंं, बुद्धिजीवियों का चुप रह, अपनी जबावदेही से आंख, कान बन्द कर लेना, प्रकृति के साथ तो द्रोह है ही बल्कि  हमारी आने वाली पीढ़ी के साथ अन्याय भी है। 

         इसीलिये जो जहां भी है जिन्हें लगता है कि समाज या हमारे महान भू-भाग पर मौजूद राजनीति, समाज या हमारे परिवारों के बीच ऐसा कुछ घट रहा है, जो न तो जनहित, न ही राष्ट्र हित में है। तो उन्हें अपनी  सकारात्मक भूमिका सामाजिक, राजनैतिक तौर पर अवश्य, उस महान राष्ट्र उस भू-भाग की खातिर अवश्य निभाना चाहिए। जो आपकों स्वच्छन्द एवं खुशहाल जीवन जीने के लिये संरक्षण प्रदान करता है। और यह कार्य समाज, सत्ता, शासन, संगठन, संस्था या व्यक्ति कोई भी कर, अपना योगदान प्रकृति राष्ट्र, समाज के प्रति दे सकता है। 

       क्योंकि आज राष्ट्र अहम मोड़ पर है। अगर हमने रास्ता ठीक नहीं चुना तो हमारी आने वाली कई पीढिय़ां इस स्वार्थ, अहम, अहंकार के चलते बर्बाद होती जायेगीं। फिर न तो वह स्वराज, खुशहाल जीवन की प्राप्ति का सपना कभी पूर्ण हो सकेगा, जिसके लिये सेकड़ों वर्षो तक, हमारे पूर्वज कुर्बानियों दें, हमारे खुशहाल जीवन के लिये संघर्षरत रह इस  दुनिया से बिदा होते रहे है। 

      क्योंकि आज विद्ववान, काबिल लोग व्यवस्था के हाथों धक्के तो चालाक, चापलूस, मुर्ख महान कहला रहे है। दोष भीड़ तंत्र का नहीं, दोष तो हमारा है। जो चुप रह, अपने-अपने स्वार्थ या मजबूरी बस सब कुछ सहते, दे ाते, सुनने के बावजूद भी सकारात्मक रुप से अपनी पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से अपने कर्म और कत्र्तव्यों का पालन नहीं कर रहे। जो एक महान राष्ट्र के महान नागरिकों के लिये कलंक है। 
जय स्वराज।
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