कॉग्रेस: वैशाखियों से फिर उम्मीद

व्ही.एस. भुल्ले। अंग्रेजों के चगुल से देश, गांव, गरीब को एक जुट कर आजाद कराने वाली कॉग्रेस यूं तो आजादी के समय से ही अरोप-प्रत्यारोप वैचारिक विरोध का शिकार रही है और अहंम, अहंकार, चापलूस, स्वार्थी लोगों की बढ़ती फौज के चलते कॉग्रेस हाथों से देश के कई बढ़े प्रदेश जिनमें पश्चिम बंगाल, तमिलनायडू, उड़ीसा, उ.प्र., बिहार, पंजाब निकाल चुकी है। जो आज तक उसके हाथ आज तक नहीं लग सके। ऐसा नहीं कि कॉग्रेस कि इस अपंगता का क्रम यहीं रुका हो। इससे भी एक कदम आगे बैशाखियों के सहारे बन्धन-गठबन्धन का क्रम एक बार फिर से उ.प्र. में होने की सुगवुहाट है।

ज्ञात हो कि 13 वर्ष पूर्व म.प्र., छत्तीसगढ़, गुजरात और हालियां, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, असम, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित कुछ छोटे-मोटे प्रदेश व कुछ जनाधार वाले नेता आज कॉग्रेस के हाथो से निकल बाहर जा चुके है। जिनकी उ मीद भी अब इन बंधन-गठबन्धनों की वैशाखियों के सहारे पूर्ण होती नहीं दिखती। आखिर ऐसा क्यों? यहीं यक्ष प्रश्र समुचे देश और कॉग्रेस के सामने कई तरह के सवाल खड़ेकरता है।  

मगर र्दुभाग्य कि कॉग्रेस ल बे अन्तराल तक लगातार संगठन सफाये पर आज भी चुप रह क्यों ? जबानी जमा खर्च कर ऐसी सशक्त हो चुकी संगठनों, संस्थाओं से सीधे ठकराना चाहती है। जो अब कॉग्रेस से कई गुना अधिक मजबूत संगठन बना कई अपने मातसंगठनों के सहारे आगे बढ़ रहे है। जिन्हें ताकत सहयोग करने कई सक्रिय संस्थाओं, संगठन, समाजसेवी, संस्थाओंसहित संगठनात्मक निस्वार्थ कार्यशैली के समर्पित कार्यकत्र्ता दिन-रात एक कर रहे है। 

आखिर क्यों कॉग्रेस बगैर संगठनात्मक आधार तैयार किये उधार के जबानी जमा खर्च के सहारे राजनीति चमकाने वालो की दम पर केन्द्र व कई राज्यों में सत्तारुढ़ राजनैतिक पार्टियों से बगैर वैचारिक विश्वास और विश्वास पात्र संगठनों के आभावों में दो-दो हाथ करना चाहती है। आखिर कब तक शेष बचे कॉग्रेस संगठन को स्वार्थी या अविश्वसीनय महत्वकांक्षी नेता व संगठनों की बैशाखियों के सहारे ढो आत्महत्या करना चाहती है। 

यह यक्ष प्रश्र आज कॉग्रेस के भावी नेता और उम्रदराज हो चुके वरिष्ठ कॉग्रेसियों के सामने होना चाहिए। जिनकी चुप्पी और सरपरस्ती में कॉग्रेस यहां तक आ पहुंची है। मगर आज भी एक बार फिर से उ.प्र. में बन्धन गठबन्धन की चर्चायें सरगर्म है। जिससे कॉगे्रस का कम व क्षेत्रीय दलो का पूर्व की भांति ज्यादा भला होने वाला है। जो कॉग्रेस के लिये घातक हो सकता है। कॉग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि एक समय था जब समुचे देश में कॉग्रेस की केन्द्र सहित राज्यों में सरकारें थी मगर आज परिणाम सामने है। समय लग सकता है मगर सुधार स भव न हो, यह अस भव है। 
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