गांव, गरीब की खातिर, राहुल की हुंकार, आखिर प्रधानमंत्री ने माना कि राहुल बोले

व्ही.एस. भुल्ले। शायद धन्यवाद के पात्र है देश के प्रधानमंत्री जो उन्होंने बडक़पन दिखाते हुये पहली मर्तवा यह दिल से स्वीकार किया कि कॉग्रेस...

व्ही.एस. भुल्ले। शायद धन्यवाद के पात्र है देश के प्रधानमंत्री जो उन्होंने बडक़पन दिखाते हुये पहली मर्तवा यह दिल से स्वीकार किया कि कॉग्रेस के भावी युवा नेता राहुल ने बोलना तो शुरु किया। शायद उनका यह मानना था कि वह न बोलते तो भूक प आ जाता। मगर राहुल ने एक बार फिर से बहराइच, उत्तराखंण्ड में फिर कई सवालों को दौहराया जिनमें बेहराइच के उनके सवाल, कि सहारा से मिले 10 पैकटों में क्या था और यह आरोप कि नोटबंदी गरीबों के धन की लूट और गरीबों से खीचो और अमीरों को सीचों, उन्होंने अपने सवालो की श्रृंखला में भ्रष्टाचार, गरीब पर अत्याचार और उघोग पत्तियों के 1.40 हजार करोड़ के कर्ज के माफी का सवाल फिर उठाया। वह इन सवालो के साथ यह बताना भी नहीं भूले कि कालाधन, सोना, रियल स्टेट और स्विस बैंक  में है। 
लगता है अब राहुल भाषा, बॉडी लेंग्यूज में वह लयबद्धता, समानता के साथ उनके आरोपों में वह आग्रह का भी आभास का मिश्रण विपक्षी दल के नेता के रुप में देश में पहली बार देखा जा रहा है। जो सत्ता पक्ष के लिये ही नहीं कॉग्रेस के लिये  भी बेहतर शुभसंकेत है। 

       फिलहाल जो बबाल सत्ता पक्ष या विपक्ष के बीच 500-1000 के नोटबंदी को लेकर कटा है। उसमें सरकार की मंशा, राष्ट्र, जनहित को लेकर हासिये पर है। क्योंकि अभी भी प्रधानमंत्री द्वारा देश से मांगे 50 दिन में कुछ समय शेष है। मगर विपक्ष अपनी जानकारी, समझ अनुसार सरकार की घेरा बन्दी तो, सत्ता पक्ष 500-1000 नोटबंदी कर अपना कत्र्तव्य निर्वहन कर रही है। मगर सत्ता या विपक्ष को यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी देश तथाकथित मीडिया तथा लोकतंत्र कभी किसी सत्ता के इसारों पर नहीं चलता है। 

         ये अलग बात है कि वेबुनियादी आरोप-प्रत्यारोप पक्ष-विपक्ष के, एक दूसरे पर राजनैतिक तौर पर हो सकते है। मगर स्वस्थ राजनीति में उन्हें व्यक्तिगत स्तर तक नहीं पहुंचना चाहिए। क्योंकि ऐसे आरोप-प्रत्यारोपों से राष्ट्र व जन का ही नहीं समाज का भी बड़ा नुकसान होता है। मगर हमारे देश में वेबुनियादी आरोप-प्रत्यारोप कर, सत्ता तक पहुंचने की जो नई पर परा शुरु हुई है। वह शायद लोकतंत्र में बजूद कायम करने की सर्वोत्तम कला बन चुकी है। जिस पर हमारा तथाकथित मीडिया और आधे अधिक अनपढ़ लोग, 83 करोड़ के लगभग सस्ते राशन को पाने मजबूर देश की महान जनता भी त्वरित, क्रिया प्रतिक्रिया करती है। शायद देश की महान जनता की इसी कमजोरी का ला ा उठा वेबुनियाद आरोप-प्रत्यारोपों से स्वयं की छवि चमकाने और सत्ता तक पहुंच बनाने को इसे बेहतर हथियार मानने लगे है और तथाकथित मीडिया के सहारे लोकतंत्र का मजाक उड़ाने में लगे है। 

           जबकि होना तो यह चाहिए कि जैसे भी जिस भी स्थिति में जन राष्ट्र कल्याण के लिये देश की महान जनता ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व में लोकतांत्रिक व्यवस्था अनुसार 5 वर्ष के लिये चुना है। तो सरकार को राष्ट्र व जनहित में लोकतांत्रिक व्यवस्था को संरक्षण दे, पूरी निर्भीकता के साथ तेजी से कार्य करना चाहिए। बगैर आरोप-प्रत्यारोप की परवाह किये। क्योंकि सरकार ही है जिसे देश की 130 करोड़ जनता को 5 वर्ष पूर्ण होने से पूर्व जबाव देना। 

           साथ ही विपक्ष को भी सकारात्मक सहयोग के साथ किसी नीति, निर्णय पर संदेह होने पर सदन ही नहीं सडक़ तक सवाल करना चाहिए। क्योंकि उसे भी तो 5 वर्ष बाद अपना रिपोर्ट कार्ड जनता को प्रस्तुत करना है। 
          जब देश की सरकार देश के प्रधानमंत्री के नेतृत्व में लगातार राष्ट्र, जनहित में तेजी से निर्णय ले रही है। और देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के भावी नेता के रुप में राहुल अपना कत्र्तव्य निर्वहन कर, राष्ट्र व जनहित में सरकार पर सवाल खड़े कर रहे है। तो सरकार का कत्र्तव्य है कि उसके जबाव सकारात्मक रुप से सडक़ ही नहीं सदन सहित सार्वजनिक मंचो से भी आना चाहिए। न कि आजादी के 60 वर्ष या पूर्व प्रधानमंत्री से 35 वर्षो का हिसाब मांगा जाना चाहिए। क्योंकि सत्ता में रहकर भी सरकार के मंत्री या सत्ताधारी दल जब जबाव के बजाये विपक्ष का स्थान ले, विपक्ष से ही सवाल करेंगे। वह भी व्यक्तिगत तौर पर आरोप-प्रत्यारोप कर तथा विपक्ष के आरोप अनुसार उसका मुंह बन्द करने का असफल प्रयास करेगें। तो यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिये शुभसंकेत नहीं कहे जा सकते। अगर एक पुराने कॉग्रेसी कार्यकत्र्ता की पीढ़ा को माने कि जिसे देश को समझाने में कॉग्रेस को शायद शर्म आती है, कि यह वह कॉग्रेस और राहुल देश के उस परिवार के चश्मो चिराग है जिसने कुर्बानियों का इतिहास लिखा है। इसीलिये अगर 35-60 वर्ष के हिसाब पर कॉग्रेस ने मुंंह खोलना शुरु किया तो बात दूर तलक जायेगी। क्योंकि कॉग्रेस अहिंसा और सविनय के बीच बहने वाली वह तरल साफ वैचारिक धारा है जिसके धारा प्रवाह के वेग ने 200 वर्ष पुरानी अंग्रेजों की सल्तनत तक को उ ााड़ फेका था। इसीलिये हमें ऊल-जुलूल आरोप-प्रत्यारोपों से बच, राष्ट्र व जनसेवा की खातिर अपने-अपने कत्र्तव्यों का पालन करना चाहिए। 
      जय स्वराज 

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Village Times: गांव, गरीब की खातिर, राहुल की हुंकार, आखिर प्रधानमंत्री ने माना कि राहुल बोले
गांव, गरीब की खातिर, राहुल की हुंकार, आखिर प्रधानमंत्री ने माना कि राहुल बोले
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