सर्वोच्च मंच पर अभिव्यक्ति की बन्दिश...........?

व्ही.एस. भुल्ले @तीरंदाज
भैया- खतरे में लोकतंत्र, मने तो पहले ही बोल्या केडर वेश के कुछ फायदे है तो कुछ नुकसान भी। मगर हारे महान लोकतंत्र में हारी सुनता हीं कौन है? कई भाई लोग मीडिया तो, कोई माइक पर चिल्ला रहा है कि हमें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा। ऐसे महान मौके पर, मने हारे देश की महान जनता को बताना चाहूं कि गैंग बन्द लोगों के हुजूम ने अपना अपना ब्रान्ड चमका, हारे जैसे गांव, गली, गरीब को मंहगी चुनाव व्यवस्था में झौंक पहले ही सदन और सत्ता से बाहर कर रखा है। क्योंकि अब चुनाव हार जीत का पैमाना ही बदल गया। वोट लेने और देने का क्रम भी अब बदल गया है। पहले गुड़ पानी और सडक़ विहीन गांवों तक प्रसार-प्रसार हो, चुनाव के माध्ययम से सदनों तक पहुंचने का मार्ग प्रस्त हो जाता था। 

मगर अब तो चौपर, जहाज से लेकर लग्झरी वाहनों के काफिलों और संचार के हाइटेक संसाधनों तथा भावनाओं की लूट की नई-नई तकनीक होने के बावजूद भी लाखों, करोड़ों स्वाहा हो, हारे प्रतिनिधि चुनाव जीत,हार रहे है। जब गाड़ी भरे 2014 में चुने हुये लोग हारे लोकतंत्र के मंदिर में बोलने चिल्ला ही नहीं डकरा रहे है और बार-बार मंच मीडिया के बीच दोहरा रहे है, कि हमें बोलने नहीं दिया जा रहा। आखिर क्यों? ऐसा क्या हुआ है हारे महान लोकतंत्र में जो बड़े-बड़े बली, बाहुबली सदन में बोलने डकरा रहे है। और जनता का करोड़ों रुपया फूकने के बाद भी सदन में नहीं बोल और न ही सदन चला पा रहे है। 

अगर ऐसे ही सदन और लोकतंत्र चला तो हारे जैसे गांव, गली, गरीब का कै होगा, जो आशा, आकांक्षाओं के रंग बिरंगे गुब्बारे देख, तालियां ठोकने में लग जाते है। 

भैये- मुये चुपकर गर हारे महान कैडर धारियों ने सुन लिया तो सदन तो छोड़, थारे जैसे गांव, गली, गरीब को सडक़ पर भी नहीं बोलने दिया जायेागा। और बोलने का थारा मंसूबा धरा का धरा रह जायेगा। कै थारी काठी भूल ली कि किस तरह कैडर वालो के इसारों पर थारी काठी पर पुलिस की लाठियां बिजली की तरह सरेयाम सडक़ों पर गरजी थी। कै तने इतना भी भूल गया कि नोट बदलने लाइन में खड़े लोगों पर उ.प्र. पुलिस की लाठी किस तरह टूटी थी। मने तो थारी काया देख, चमक मिटाने, न तो पर्याप्त गांव, गली में डाक्टर है, न ही सुरक्षित कोई चिकित्सा पद्धति। मने तो बोल्यू भाया नोटबंदी ही नहीं हारे महान केडर वालों के टिड्डी दल के आगे अच्छे-अच्छे सियासी सूरमा, अब तो चीं बोल रहे है। और बड़े-बड़े तथा कथित हारे जैसे मीडिया वाले हड्डी देख, दुम हिला उनके आगे पैंड़ भर रहे। अगर लोकतंत्र महान है तो पैसा सर्वमान्य है जिसके लिये भाई लोग स्वाभिमान छोड़ संस्कृति, स यता को तार-तार कर सुनहरे इतिहास पर कालिख पोत, पेंटिंग बना रहे है। क्योंकि हारे महान देश में 2018 में चुनावी एक्जीबीजन जो होने वाली है।   

भैया- तो क्या नोटबंदी इसी का परिणाम है। जो लोग सदन में बोल, फोडऩे तरस रहे है तो कुछ गलबहियां कर, मशखरी कर रहे है। 
भैये- चुपकर तू हारे महान नेताओं की त्याग तपस्या को मशखरी कहता है तभी तो थारे जैसा गांव, गली, गरीब लोकतंत्र में मालिक होने के बावजूद भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ब शीस हासिल करने, हारे महान माई बापों के दर चप्पल रगड़ता है। 
भैया- तो मैं कै करु, बड़े-बड़े शूरमाओं के बोल सुन, हारा तो कलेजा मुंह को आवे। 
भैये- सुडऩा चाहे तो कान खोल कर सुन, फिलहाल तो यह नोटबंदी थारे जैसे गांव, गली, गरीब की खातिर है जिससे कालाधन, आतंक, भ्रष्टाचार मुक्त देश बन सके। और थारे जैसा गांव, गली, गरीब खुशहाल रहे, सुकून का जीवन जी सके। इतने पर भी गर तने मुंह खोला तो, बोल पाने वालो का कुछ हो या न हो, मगर पेस्टीसाइज रसायनिक खादों के उत्पादन आतंक, भ्रष्टाचार से लुहलुहान हों, गल चुकी थारी काठी अवश्य 63 जगह से टूट जायेगी। बेहतर यहीं है कि स्वराज, उराज को भूल जोरदार राम नाम के नारे लगा और इसी को राम राज्य समझ, अंडी बच्चों सहित विभिन्न योजनाओं के नाम बटने वाली ब सीस हासिल कर अपने कुनवे को पार घाट लगा और माल कबाडऩे वालों के रहमों-करम पर  मजेे उड़ा। तब तो थारी चल जायेगी, बरना ज्यादा ज्ञान गुन्ताड़ा पाला तो हारी तो हारी थारी काठी भी ऐसे ही बीच सडक़ पर धक्के खायेगी। और बैवजह ही केडर वैश वालो की देश भक्त फौज लंगोटी तक फाड़ जायेगी। 
भैया- मने समझ लिया थारा इशारा, जय जय श्रीराम, अब मने न तो नोटबंदी पर बोलूंगा, न ही स्वराज को लेकर मुंह खोलूंगा। गर जरुरत पड़ी तो, न तो घर, न ही गली, न ही खेत पर अब फंदा लगाऊंगा। मने भी अब अपनी किचिन, पोट टीम को तैयार कर नंगे भूखों की भय, भूख, ा्र्रष्टाचार मुक्त पार्टी बनाऊंगा। 
जय जय श्रीराम 
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