संपर्क विहीन नेता, सांसत में कार्यकर्ता, क्या होगा केडर विहीन कॉग्रेस का

व्ही.एस.भुल्ले। कुछ सुनियोजित मौके झौके छोड़ दे तो कॉग्रेस के भावी नेता राहुल के प्रति सॉशल मीडिया की खिसिआहट स्वाभाविक है। जैसा कि देश और देश का आम नागरिक ही नहीं आम कार्यकत्र्ता भी महसूस करता। कारण, कॉग्रेस के भावी नेता के कार्यालय की संवादहीनता जिसका स पूर्ण सच जो भी हो, मगर कॉग्रेस के ाावी नेता राहुल या उनके रणनीतिकारों की व्यवस्था पर यह अवश्य यक्ष प्रश्र है। मगर दिल्ली से दूर बैठे आम नागरिक कार्यकत्र्ता में यह संदेश स्पष्ट है कि आसान नहीं कॉग्रेस के भावी नेता से फोन, ई-मेल या सीधा स पर्क कर पाना। ये अलग बात है कि कॉग्रेस के भावी नेता राहुल कभी कॉग्रेस का जनाधार बढ़ाने कभी गरीब के घर खाना खाते है तो कभी भ्रमण के दौरान गरीब बुजुर्ग को गले लगाते है। तो कभी समुचा उ.प्र. रथ में बैठ घूम आते है। तो कभी नोटबंदी को लेकर लोगों के बीच लाइन में लग जाते है। 

मगर देश के आम नागरिक, कार्यकत्र्ता तथा वैचारिक लोगों से सीधे संवादहीनता फिलहाल लोगों की समझ से परे है। जिसका जबाव भी स्वयं कॉगे्रस के भावी नेता राहुल को ही देश व आम कॉग्रेस कार्यकत्र्ता वैचारिक शुभ चिन्तकों को देना चाहिए। जबकि इसके उलट अगर हम प्रधानमंत्री निवास या कॉग्रेस अध्यक्ष निवास की बात करें, तो वहां पर भी संवाद, स पर्क की गुजांइस बनी रहती है। अगर कोई दूर-दराज से फोन भी लगाये या किसी केन्द्रीय मंत्री को फोन लगाये तो फोन उठता है। ये देश के वह नामचीन लोग है, जहां पर भी संवाद की गुजांइस न हो, मगर उ मीद तो लोगों को रहती है कि उन्हें सुना जायेगा। 

तो फिर कॉग्रेस के भावी नेता के ऑफिस में ऐसी क्या कमी है जो सीधे फोन या ई-मेल पर संवाद विहीन है। बात कुछ नहीं, मगर ग भीर है। क्योंकि कॉग्रेस के भावी नेता जिस देश के आम गरीब किसान की लड़ाई संसद से लेकर सडक़ तक लडऩा चाहते है। उनके व्यवस्थापक, रणनीतिकारों को यह समझना होगा कि देश में लोकतंत्र है। जनतंत्र है जिसकी मालिक जनता और राजनेता उसके सेवक होते है। जिन्हें देश की जनता उनके आचार व्यवहार कार्य के आधार पर वोट दें, सत्ता सिंहासन पर बैठालती है या फिर सत्ता सिंहासन से बेदखल कर देती है। 

         मगर फिलहाल सवाल यहां सत्ता या सडक़ का नहीं यहां सवाल है देश के एक ऐसे युवा नेता का जिसे आज नहीं तो कल कॉग्रेस जैसे महान संगठन की वागडोर स हालना है। और उनका कार्यालय स पर्क, संवाद विहीन की स्थिति में है। 

     बेहतर हो कॉग्रेस के भावी नेता राहुल स्वयं या उनके व्यवस्थापक रणनीतिकार, मीडिया से न सही, आम नागरिक, कार्यकत्र्ता या वैचारिक समर्थकों की पहुंच तक तो संवाद स पर्क की व्यवस्था बनाये। क्योंकि देश बड़ा है। देश की जनसं या लगभग 130 करोड़ फिर देश के प्रधानमंत्री से अधिक व्यस्थ कौन हो सकता है। जब उनका फोन उठ सकता है तो फिर कॉग्रेस के भावी नेता का क्यों नहीं। 

         क्योंकि यह भी सत्य है कि लोकतंत्र में बगैर स पर्क संवाद के कोई भी दल हो, अधिक दिनों तक जनता के बीच नहीं टिक सकता। खासकर जब तब उस दल की संगठनात्मक गतिविधियां वर्षो से मृत प्राय पड़ी हो, और कुछ लोगों ने अपना बजूद कॉग्रेस व सत्ता गलियारों में कायम रखने संगठनात्मक गतिविधियां निस्तनाबूत कर दी हो। 

     क्योंकि देश बड़ा है और कॉग्रेस कार्यकत्र्ता हमेशा से गांव, गरीब का सेवक रहा है। ऐसे में आम गरीब या कार्यकत्र्ता तथा वैचारिक शुभचिन्तक आय दिन दिल्ली दौड़ लगा, स पर्क संवाद नहीं बना सकता। न ही फोटो खिचा, बड़ा नेता  स्वयं को बता सकता। बैसे भी भाई लोग कॉग्रेस में रहकर कॉग्रेस को केडर वैश पार्टी नहीं मानते। फैसला स्वयं कॉग्रेस के भावी नेता राहुल और उनके व्यवस्थापक, रणनीतिकारों को ही लेना है, कि उनका या उनके भावी नेता का कार्यालय कैसे चले, क्योंकि 2018 कोई ज्यादा दूर नहीं। 
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment