भीख से भविष्य और माली से जंगल, झरने, नदी, नाले नहीं बनते

व्ही.एस.भुल्ले। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सतत सत्ता सुख की खातिर भीख से भावनाओं को भरवाने का खेल पुराना है। मगर उससे कभी स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना साकार नहीं हो सकती, न ही उस आवाम के बेहतर भविष्य के निर्माण की नींव रखी हो सकती है। जिसके लिये हर सरकार से अपने नौनिहालों के बेहतर भविष्य की खातिर आवाम अपना बहुमूल्य मत देकर उनके बेहतर भविष्य का सपना देखती है। सरकारों द्वारा सस्ती लोकप्रियता हासिल कर, सतत सत्ता सु ा भोगने की लालसा ठीक उसी प्रकार है। जिस प्रकार खेत का मालिक या गांव का पटेल, माली के माध्ययम से बगीचा लगा, जंगल, झरने, नदी, नाले निर्माण होने का सपना देखते है। जबकि दोनो ही स्थिति में जमीन आसमान का अन्तर है। एक भौतिक विलासिता पूर्ण सिद्धान्त का पालन करता है तो दूसरा प्रकृति द्वारा स्थापित सिद्धान्तों का पालन करता है। 

जो लोग सस्ती लोकप्रियता हासिल कर सतत सत्ता के आकांक्षी बने रहते है वह भोले भाले नागरिकों के आगे कुछ भी बोल, सत्ता के मद में चूर हो, मनचाहे ढंग से खुद को सर्वोत्तम ठहराने से नहीं चूकते है। ऐसा ही कुछ आज की राजनीति में हो रहा है। कभी स्वयं को जन भक्त, तो कभी राजनीति को व्यवसाय नहीं अपना धर्म ठहराने की असफल प्रयास करते है। तो कभी सस्ती लोकप्रियता हासिल करने समुचे सिस्टम को ही धता बता मनमानी करने से भी नहीं चूकते।

राजनीति में धर्म का पालन करने वाले शायद यह भूल जाते है कि किसी भी राज व्यवस्था को चलाने के लिये धर्म की नहीं, राजधर्म पालन की आवश्यकता होती है। और जिस राज्य में राजधर्म का पालन नहीं होता, वह राज्य किसी भी बैबा- की उस उजड़ी मांग की तरह होती है। जिसकी आंखे अपने नौनिहालों के बेहतर भविष्य के सपने देखते-देखते पथरा जाती है, मगर वह दिन नहीं आ पाता, जिससे वह अपने नौनिहालों को स पन्न, खुशहाल जीवन जीता देख सके।  

राजनीति को व्यवसाय नहीं अपना धर्म मानने वालो के राज में गांव के मजदूर, शहर के ठेकेदार, सप्लायरों से सत्ता के मद में चूर लोगों द्वारा उनका रोजगार, काम छीन लिया गया हो। इतना ही नहीं सुगम परिवहन के नाम, म.प्र. राज्य सडक़ परिवहन को बन्द कर, उसकी बहुमूल्य स पत्तियों को अखबार मालिक, माफिया, नेताओं के सुपुर्द कर, आम नागरिकों को प्रायवेट ट्रान्सपोटर्स के आगे लुटने छोड़ दिया गया हो। जिस राज्य में सुरक्षा के नाम अवैध उगाही, पैसा न देने पर, बेरहम पिटाई होती हो। 

जिस राज्य की शिक्षा प्रायवेट स्कूलों के आगे घुटने टेक, दम तोडऩे पर मजबूर हो, बैचारी जनता, जानवरों द्वारा न पीने वाले पेयजल को पीने पर मजबूर हो। 

जिस राज्य में शुद्ध पेयजल के लिये आम गरीब को लाले हो, और गांव-गांव अवैध मेहखाने हो। जिस राज्य सत्ता के चाकरों के यहां छापों में करोड़ों, अरबों रुपया मिल रहा हो, उस राज में राजनैतिक धर्म और राजधर्म की कल्पना बैमानी है।  

जिसके परिणाम बहुमत के मत में, भले ही मिले या न मिले। मगर र्दुगति भविष्य की होने वाली है। वह न तो सस्ती लोकप्रियता से हासिल भीख पर मजे उड़ाने वालो को भविष्य में कभी माफ करेगी, न ही उस राज सत्ता को जो, अपने किराये के भोपुओं से वाहवाहीं व स्वयं के हाथों, स्वयं की पीठ थपथपाने में लगी है। अगर किसी को मुगालता यह है कि हम तो धन, बल, सं या बल, सत्ता बल में पार पा चुके है तो धर्म को सर्वोच्च मानने वाले धर्म की खातिर जनसेवा की खातिर कम से कम उन, दो महान धर्म ग्रन्थ, गीता और रामायाण को अवश्य पढ़े या सुने जिसमें राजधर्म के पालन का समुचा ब्रातान्त लिखा है, गीता में कौरव, पाण्डव की सेना का सार तो रामायाण में प्रभु राम और रावण की सेना का सार लि ाा है इन महान ग्रन्थों को सत्ता के मद में चूर लोग अवश्य पढ़ ले, सारी गलत फहमी स्वत: ही दूर हो जायेगी।
जय स्वराज .............?  
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