देश के सर्वोच्च सदन का संकट: कोई बोल नहीं रहा तो, किसी को बोलने नहीं दिया जा रहा

व्ही.एस.भुल्ले। आज जब समुचा देश स्तब्ध और गांव, गली, गरीब हैरान परेशान है। ऐसे में सर्वोच्च सदन ही नहीं देश के दो बड़े दलों के बड़े नेताओं के गैर जि मेदारना व्यान गांव, गली, गरीब ही नहीं देश को भी विचलित करने वाले है। यह सही है कि विगत 30 वर्षो से या तो अहम निर्णय नहीं हो पा रहे थे या फिर किये नहीं। मगर आज जब निर्णय हो रहे है तो देश में कोहराम मचा है। जिस तरह से विगत 30 वर्षो में जो निर्णय हुये उनके क्रियान्वयन को लेकर दृढ़ इच्छा शक्ति ढुल-मुल नजर आयी, तो कभी सरकारों को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। परिणाम कि इस असमंजस की स्थिति में विगत 30 वर्ष में राष्ट्र और राष्ट्र के गांव, गली, गरीब का बड़ा नुकसान हुआ है। 

अब अगर 30 वर्ष बाद देश में कोई निर्णय राष्ट्र, गांव, गली, गरीब के हित में कोई हुआ है। तो विगत 1 महिने से उसको लेेकर सडक़ से लेकर संसद तक कोहराम क्यों ? अब इसके पीछे कारण जो भी हो। आज एक माह पूरा होने को है। ठीक से सदन ही नहीं चल रहा है। सत्ता पक्ष कहता है विपक्ष चर्चा करना नहीं चाहता। विपक्ष कहता है कि सरकार  सदन में बोलना नहीं चाहती। उसके मुखिया मंचों पर तो बोलते है मगर सदन में नहीं बोलते। 

अगर बात यहां तक रहती तो ठीक था पहले विपक्षी दल के उपाध्यक्ष ने कहा वे बोलेगें तो भूक प आ जायेगा, तो अगले ही दिन देश के प्रधानमंत्री सत्ताधारी दल के सदन में मुखिया सार्वजनिक मंच से कहते है। उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा। इसीलिये वह अपनी बात जनता के बीच सीधे रखते है। 
   इससे पूर्व सत्ताधारी दल के वरिष्ठ नेता देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री भी पक्ष-विपक्ष का सदन में आचरण देख अपनी प्रतिक्रिया में संसदीय कार्य मंत्री व अध्यक्ष को संदेश दे चुके है। तो दूसरी ओर देश के राष्ट्रपति भी अपनी अप्रसन्नता सदन न चलने को लेकर व्यक्त कर चुके है। 
    अब यहां यक्ष प्रश्न यह उठता है कि इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसकी क्या जबावदेही बनती है और कौन क्या कर रहा है। तो जहां तक पक्ष-विपक्ष की जबावदेही का सवाल है तो देश को 130 करोड़ जनता ने बहुमत के आधार पर इन्हें चुन देश के सर्वोच्च सदन तक भेजा है। 
   जिसके आधार पर देश की एक चुनी हुई सरकार जिसके मुखिया प्रधानमंत्री है। और बहुमत के आधार पर विपक्ष है। जिसमें कई दल के चुने हुये जनप्रतिनिधि है। जिन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था अनुसार जनता अपना अमूल्य मत दें पूरे 5 वर्ष तक राष्ट्र व जनसेवा का कार्य सौंपा है। 
   जो राष्ट्र, जनसेवा के बजाये दलों के स्वार्थ अहम अंहकार को ले, पवित्र सदन को सियासी अखाड़ा बनाये घूम रहे है। बात सिर्फ इतनी सी है कि अगर जनता ने सरकार को बहुमत दें, राष्ट्र जनसेवा का कार्य 5 वर्ष का करने का मौका दिया हैै और विपक्ष को सकारात्मक आलोचना और सरकार की कार्यप्रणाली पर नजर रख, शेष देश की भावना सरकार के निर्णय में समाहित करा राष्ट्र जनकल्याण का कार्य सौंपा है तो फिर कोहराम क्यों? 
     बैसे भी जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझते है वह जानते है सदन चलाने की जबावदेही सत्ताधारी दल की होती है। क्योंकि संसदीय कार्य मंत्री व लोकसभा में अध्यक्ष लगभग सत्ताधारी दल का होता है। 
     संविधान में कानूनी रुप से लोकसभा अध्यक्ष को व्यापक अधिकार सदन चलाने प्राप्त है। वह सदन बाधित करने वाले सदस्यों के खिलाफ कार्यवाहीं कर सदन चला सकते है। सरकार भी बड़ा दिल रख संसदीय पर पराओं का आदर स मान रखते हुये सदन को संचालित रखने में माहती भूमिका निभा सकती है। वहीं विपक्ष भी जनाकांक्षाओं का प्रतिबि ब चर्चा में शामिल हो, रख सकता है। 
    मगर र्दुभाग्य देश के गांव, गली गरीब, के लोगों का कि हमारे सदनों में ऐसा न होकर अहम अहंकार दलों के स्वार्थो का मल युद्ध छिड़ा हुआ है। जो लोकतंत्र के हित में कतई उचित नहीं। जो आम जन के बीच कई सवाल खड़े कर रहा है। 
   अगर जनता ने सरकार को 5 वर्ष और प्रधानमंत्री ने 50 दिन देश से मांगे है तो नोटबंदी को लेकर हाय-तौबा कैसी। वर्तमान हालातों के मद्देनजर तो यहीं लगता है कि अब हमारा महान लोकतंत्र राष्ट्र सेवा, जनसेवा के नाम अहम अहंकार, स्वार्थ पूर्ति का अखाड़ा भर बनकर रह गया है। 
                जय स्वराज ..........? 
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