तार-तार संस्कृति में, दम तोड़़ता स्वाभिमान: अवैध उत्पत्ति को ढोता तथाकथित सम्मान- संयोजक स्वराज

विलेज टाइम्स। नन्द, गुप्त, शक, हूड़, तुर्क, मंगोल, मुगल, मराठा, अंग्रेजों के पतन के तर्क कुतर्क भले ही इतिहास में दर्ज हो और कई रुपों में परमपिता परमात्मा के भी इस महान लोक पृथ्वी जहां मानव सहित विभिन्न जीव-जन्तु, जानवर अपना जीवन चक्र शुरु पूर्ण कर, कर्तव्य निर्वहन पश्वात आते-जाते रहे हो, मगर प्राकृतिक सरंचना वहीं की वहीं है। नियम, सिद्धान्त यथावत है जिसे मानव द्वारा अपनी समझ अनुसार समय-समय पर परिभाषित किया जाता रहा हो। जिसे विभिन्न व्यक्ति, परिवार कबीले, समाज अपनी-अपनी समझ अनुसार आगे बढ़ते रहे हो। 

मगर पृथ्वी के जिस महान भू-भाग की चर्चा महापुरुषों, धर्मगुरुओं, प्रतिभाओं, चमत्कारों को लेकर रही है, वह इतिहास में आज भी मौजूद है। यह भारत वर्ष की उस महान संस्कृति, संस्कारों का प्रतिफल कहा जा सकता है। जिनके  आधार पर कभी हम हमारे महान स्वा िामान सुरक्षित रह, स पन्न खुशहाल जीवन के स्वर्ग सी कल्पना को कायम रखने में कामयाब रहे। आज उसी संस्कृति को तार-तार देख,  हमारा समाज घातक तो हमारा महान स्वाभिमान दम तोड़ता नजर आता है। 

जिसमें फिलहाल कोई सुधार दूर-दूर तक नजर नहीं आता। कारण दम तोड़ती हमारी महान संस्कृति के नाम अवैध उत्पत्ति के रुप में हमारे बीच मौजूद विनाश शिक्षा का ल बा, लगातार, निरन्तर दौर और विनाश संस्कृति की ओर हमारी अन्धी दौड़ है। जिसकी धार तेज करने में हमारे तथा कथित शासक, स्वार्थी, चापलूसों की वह जमात रही। जिन्होंने अपने स्वार्थो, अहम अंहकारों की खातिर विनाशित शिक्षा, संस्कृति को बढ़ावा दिया। जिनकी व्यवस्था ने विधा, विद्ववान, स्वाभिमान की निरन्तर हत्या की और अपना रसूख कायम रख, नई शिक्षा, संस्कृति को दबे कुचले समाज निर्माण में अहम भूमिका का निर्वहन किया। जो इस महान भारत वर्ष के भू-भाग पर आज सर चढक़र बोल रहा है। हो सकता है समय परिस्थितियों की ऐसी मांग रही हो, मगर वह हमारी महान संस्कृति अनुसार कतई नहीं।  क्योंकि आज हमारे समाज में प्राकृतिक समझ, नियम, सिद्धान्तों की नई-नई परिभाषायें, नई-नई संस्कृति, संस्कार व्यक्ति, परिवार, समाज में अवैध जन्म ले चुके है। जो प्राकृतिक नियम सिद्धान्तों के विरुद्ध है और हमारे सम्पन्न खुशहाल जीवन तथा वैबसी और विनाशता का कारण है। 

चूंकि जीवन जीने के स्थापित प्राकृतिक नियम सिद्धान्त पहले, और आज भी वहीं है तथा भविष्य में भी वहीं रहेगें। क्योंकि प्रकृति सर्वोच्च है और सर्वस्वीकार्य भी। मगर बदली, नव संधारित जीवन शैली से शुकून, शान्ति, स पन्नता, खुशहाली हमारे पास सब कुछ होने के बावजूद भी जाती रही। देखा जाये तो आजादी से लेकर आज तक व्यवस्थागत कई नये-नये प्रयोग होते रहे। मगर सच्चा और अच्छा सर्वमान्य, मान-स मान, स्वा िामान, समाज और व्यवस्था से जाता रहा। जिसका अब न तो कोई सर्वमान्य सामाजिक पैमाना बचा, न ही व्यवस्था में वह मान्यता। क्योंकि भ्रम का वातावरण इस तरह से  हमारे बीच घर कर चुका है। कि अब हमारी महान संस्कृति भी तार-तार हो, दम तोड़ती नजर आती है। जो किसी भी मानव स यता ही नहीं, हर जीव-जन्तु के स पन्न, खुशहाल जीवन की जान होती है। जिसके ओझल होते ही,सारे समाज, स यतायें व्यवस्थायें बैजान नजर आती है। देखा जाये तो मान-स मान, स्वाभिमान आज हमारे अपनो के ही बीच कलफ रहा है। जिसे हम देख व समझ भी रहे है। मगर हमारी वैबसी ऐसी कि सब कुछ जानते देखते भी हम कुछ भी नहीं कर पा रहे, आखिर क्यों? ये घर, समाज, राष्ट्र, नागरिक तथा इस राष्ट्र में स्थापित व्यवस्थायें हमारी है, फिर भी ऐसा क्यों? 

अगर यो कहें कि भावनाओं के मंद विष ने हमारी संस्कृति को बैजान कर, हमें नरक के अथाये सागर में धकेल दिया है, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। क्योंकि अब इस दुख पीढ़ा के सागर को देख, हम दुखित तो हो सकते है, मगर इससे पार-घाट कैसे लगे, उसके लिये कुछ कर नहीं सकते। क्योंकि आज हमारी अवैध उत्पन्न संस्कृति से तार-तार हुई महान संस्कृति के बैजान होते ही हमारा मान-स मान, स्वाभिमान भी जाता रहा। 

अगर हमें इस दुख के सागर से पार पाना है, और खुशहाल स पन्न जीवन की ओर बढऩा है तो प्रभु भगवान राम के बताये रास्ते पर चल, मानव न सही भालू, बन्दर, पशु-पक्षियों के ही सहयोग से संगठित हो हमारी महान संस्कृति को बचाने की खातिर इस नरक सागर पर एक ऐसा पुल बांधना होगा।  जिससे हम उत्पन्न हुई अवैध संस्कृति पर जीत हासिल कर अपना स पन्न, खुशहाल, महान जीवन फिर से प्राप्त करने और समुचा जीवन चक्र स पन्नता खुशहाली के साथ पूर्ण कर, परम पिता तक पहुंचने का अपना मार्ग प्रसश्त कर सके। क्योंकि कर्म ही पूजा और सबसे बड़ा धन होता है।  
जय स्वराज ...? 
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