काम की जगह कोहराम, व्यवस्था पर कलंक

व्ही.एस. भुल्ले। जिस तरह से बात-बात पर हैरान-परेशान जनता धरना आन्दोलन कर कोहराम पर उतर आती है। अगर उसी को आगे बढ़ाते हुये, पढ़े लिखे शासकीय मशीनरी से जुड़े लोग कोहराम मचाने लगे। तो जिनके कंधो पर व्यवस्था बनाये रखने का भार है तो फिर लोकतंत्र कैसे चलेगा। 

कभी-कभी ऐसे शर्मनाक वाक्या तब सामने आते है जब जनता की गाड़े पसीने की कमाई से वेतन भत्तों से पोषित यह कर्मचारी बुरे वक्त में उसके शोषण या उनकी अनदेखी पर उतर आते है। जिसके पीछे सरकारों की वह नाकामी और राजनैतिक स्वार्थी होते है। जिनके कारण शोषित, प्रताडि़त कर्मचारियों का सडक़ पर उतरना पड़ता है। 

सरकारों को चाहिए कि वह अंग्रेजों की तरह टुकड़े-टुकड़ों में बांट देने वाला वेतन एक मुश्त रख हर तीन वर्ष में नियमित मंहगाई समीक्षा उपरान्त वेतन भत्ते बढ़ाये और कार्य क्षमता के आधार पर घटाये, जिसका आकंलन उसके द्वारा किय गये कार्यो की की गणना के आधार पर हो। और उसी आधार पर नियमित नियत समय वर्ष में चरित्राबली तैयार की जाये जिसका उल्लेख सर्विस बुक में भी रहे। 

वहीं नियमित और संविदा का उल्लेख स्पष्ट हो और सेवाओं की समय सीमा निर्धारित हो। उसी आधार पर नियमित सेवा का समय कम से कम 5 वर्ष हो, तथा कार्य क्षमता आंकलन प्रतिवर्ष अंकित चरित्राबली के आधार पर नियमित या उसी पद पर सेवा पर रहते हुये। पुनर संविदा नियुक्ति या सेवा से बाहर कर दिया जाये। जो सक्षम अधिकारी की जबावदेही के साथ प्रमाणिक आधार पर हो। विभागीय कार्य लेने वाले सक्षम अधिकारी को कलेक्टर के माध्ययम से निलंबन, बर्खास्दगी के अधिकार हो, जिससे वह पूर्ण क्षमता से कार्य ले सके, और सक्षम अधिकारी का भी उत्तर दायित्व सुनिश्चित हो सके। 

बरना आय दिन के कोहराम से सरकारें तो अपना उल्लू सीधा रख सकती है। मगर लोकतंत्र और लोकतंत्र में आस्था रखने वाली गांव, गरीब गली की जनता का जीते जिन्दा बेड़ा गरग होना सुनिश्चित है। जैसा कि आय दिन होने वाले कोहराम के चलते हो रहा है।
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