सड़े सिस्टम से जनधन का प्रवाह: पारदर्शी प्रधानमंत्री की पीढ़ा सदन से इतर सभा में

व्ही.एस. भुल्ले। अगर देश के प्रधानमंत्री ने पारदर्शिता के सर्वोच्च सिद्धान्त को साक्षी मान सदन के बजाये सभा में स्वयं की पीढ़ा सार्वजनिक करने तथा देश व गांव, गली, गरीब, के हित में लिये गये निर्णयों पर बोलने का मंच, जनसभा को बना लिया है। तो निश्चित ही देश के प्रधानमंत्री की दिशा और दशा सच्चे-अच्छे लोकतंत्र की ओर अग्रसर रहे। बैसे भी राजनैतिक गोल बन्दी कर स्वयं के स्वार्थो के चलते लोकतांत्रिक व्यवस्थापक पर पानी फेरने का कार्य विगत 30 वर्षो से लगभग निरन्तर चल रहा है। लगता है अब लोकतांत्रिक पर परा और लोकतांत्रिक सोच को समझने का मौका समुचे देश को भी मिल सकेगा।  

बैसे भी कहावत है कि सदन में जब भी वोटिंग होती है तो वोट की गिनती पक्ष में या विपक्ष में मिले मतों के आधार पर होती है। जिससे सरकार के मुखिया का निर्धारण होता है या जो भी विषय सदन में लाया जाता है। उसमें मतों की गणना दल गत न होकर चुने हुये जनप्रतिनिधियों द्वारा समर्थन या विरोध के आधार पर होती है। 

मगर जब अब दलों के चुने हुये प्रतिनिधि अपनी क्षेत्रीय जनाकांक्षाओं को रौंध, दलों के इसारों पर गोलबन्दी कर समर्थन, विरोध पर उतारु हो तो, ऐसे में उसी जनता से सीधा संवाद करना बेहतर हो जाता है, जो पक्ष-विपक्ष को चुनकर सदन तक भेजती है। लगता है कि प्रधानमंत्री के इस आचार व्यवहार से भारतीय लोकतंत्र को नया संदेश गया है। और उन दलों को चुनौती भी जो गोलबन्दी कर स्वयं के अहम अहंकार में डूब जनाकांक्षाओं को रौंधना चाहते है। 

शायद यहीं सही वक्त है चुनेहुये उन जनप्रतिनिधियों को जो अपने दल के इसारों पर आज तक जनाकांक्षाओं को रौंधते आये है। फिर वह चाहे सत्ताधारी दल हो या फिर विपक्ष सभी को लगता है कि अब प्रधानमंत्री का स्पष्ट संदेश है। मगर प्रधानमंत्री की पीढ़ा से इतर आम गांव, गरीब की पीढ़ा यह है। जैसा कि नोटबंदी के बाद स्वराज समर्थकों ने व्यक्त किया था। 

सड़े गले सिस्टम पर नजर और जनधन की सुरक्षा के साथ 9 नव बर 2016 से देश के बैंको में जमा होने वाले गांव गरीब, गली के जनधन की पु ता सुरक्षा क्योंकि 8 नव बर 2016 तक मौजूद कानून व्यवस्था में कई ऐसे छेद मौजूद है। जिनसे देश के गांव, गरीब, गली का हजारों करोड़ का धन बैंक के माध्ययम से बह गया। क्या सरकार ने उसे रोकने की पु ता व्यवस्था की है, बरना गांव, गरीब, गली सहित राष्ट्र के लिये बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। 

दूसरा 9 नवम्बर 2016 के बाद बैंकों में जमा होने वाले जनधन को पूर्णत: पारदर्शी बनाया जाये जिससे जनता प्रधानमंत्री जी की भावना अनुसार यह देख सके कि देश के किस बैंक संस्थाओं में देश की जनता का धन इन 50 दिनों में कितना जमा हुआ है और जमा धन से सरकार गांव, गरीब, गली राष्ट्र का क्या कल्याण करने वाली है। 

साथ ही यह भी पारदर्शी हो कि किस बैंक या संस्था को नई करेन्सी के रुप में जनता के बीच पहुंचाने कितना रुपया इन 50 दिनों में दिया गया। जिसका प्रदर्शन देश के सामने अखबार टी.व्ही. संचार माध्ययमों सहित सभाओं में हो। 

तभी प्रधानमंत्री जी की भावना और पारदर्शिता देश वासियों को दिलाशा दिला, सन्तुष्ट कर सकती है। जिसका आभाव स्पष्टता दिखाई देता है। जिसका लाभ उठा बेईमान, भ्रष्टाचारी देश की जनता के कष्ट त्याग को दरकिनार कर अपने मंशूवे पूरे करने में जुटे है, जो देश की महान जनता के साथ धोखा ही नहीं अन्याय भी है।
जय स्वराज...? 
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment