देश हित में नहीं, दलो की आक्रमक शैली, संशय में गांव गरीब किसान

व्ही.एस.भुल्ले | मुद्दा कालाधन, आतंकवाद, भ्रष्टाचार के खात्मे को लेकर 500-1000 के नोटबंदी का हो, या फिर देश के दलों के बीच जमकर उपयोग हो रही आक्रमक ााषा शैली, बॉडी लेंग्यूज का हो जिसे लेकर देश का गांव गरीब किसान परेशान ही नहीं संशय में है, खासकर अपने ही राजनैतिक दलो के इस व्यवहार के चलते। देश स्तब्ध है राजनैतिक दलों की देश के अहम मुद्दों पर तू-तू मैंमें देखकर। 

लगता है कि जिस महा भूल को जानकर भी कॉग्रेस आज भी उसे मानना नहीं चाहती, जिसके चलते कॉग्रेस अपना सारा वैभव गवायें बैठी है। और आज भी उसी आक्रमक शैली की अगुआ बन जिस दिशा की ओर अग्रसर है। जिसे न तो स्वयं कॉग्रेस देखना समझना चाहती है उसी महा भूल को देश में मौजूद अन्य दल देखना समझना चाहते है। फिर चाहे सत्ताधारी दल या अन्य विपक्षी दल।

   शायद आज भी कॉग्रेस वहीं भूल करती जा रही है जो आज तक वह सत्ता में रहकर और आज विपक्ष में बैठकर विपक्षी दलों के बहकावे पर करती आई है और निरन्तर करती जा रही है। 

    मगर देश के गांव गरीब किसान का दुर्भाग्य यह है कि देश की जनता ने जिस आचरण व्यवहार के चलते कॉग्रेस को बेदखल कर विपक्ष में बैठने मजबूर कर दिया। वहीं आचरण व्यवहार और आक्रमक शैली, अंहकार आज सत्ता होने के बावजूद भी सत्ताधारी दल व उसकी सरकार में देखने मिल रहा है। जो न तो गांव गरीब किसान और न ही देश के हित में है। 

    जबकि राष्ट्र व जनहित में होना यह चाहिए था कि जिस आचरण, व्यवहार, भाषा शैली से छुब्द देश की जनता ने कॉग्रेस को सत्ता से बेदखल कर 5 वर्ष तक देश की सेवा करने का जो मौका सत्ताधारी दल को दिया है। तो सरकार को देश हित, जनहित में बगैर किसी किन्तु-परन्तु के कार्य करना चाहिए। और सत्ताधारी दल को अपनी सरकार की मदद करना चाहिए। जबकि विपक्ष बै सर पैर के बगैर बहस किये विरोध करना अपना धर्म मान चुका हो, जबकि देश में ऐसे अनगिनत देश हित, जनहित उसके मान-स मान स्वाभिमान से जुड़े कई मुद्दें आज भी अपनी-अपनी बारी की बांट जौह रहे है। जिन्हें सदन या सडक़ पर उठा सरकार की घेरा बन्दी की जा सकती है। मगर कॉरपॉरेट कल्चर और प्रायवेट लिमिटेड में तब्दील कुछ दलो का र्दुभाग्य यह है कि वह देश व जनता के अहम अहंकार को छोड़ अपने अहम अहंकार और अपने-अपने राजनैतिक द्वेश भुनाने में लगे है। 

      मगर यहां सरकार व सत्ताधारी दलो की जबावदेही बड़ी बनती है कि वह अपने कार्य के साथ देश हित, जनहित में तर्क रख मुद्दा उठाने वालो को तरजीह दे, उन्हें सुने। बरना जिस तरह की संस्कृति आज इस महान लोकतंत्र में पनप रही है। इससे न तो महान राष्ट्र, न ही गांव गरीब किसान और ऐसे दलो का भला होने वाला है। जो अहम अंहकार में भूल देश व देश की जनांकाक्षाओं को दरकिनार करना चाहते है। 
  आज जिस तरह भाजपा एक केडरबैस पार्टी है उसी तरह कभी कॉग्रेस भी 90वे के दशक तक केडरवैश पार्टी रही है। कुछ अन्य दल भी अपना केडर कायम किये हुये है। तरीका व्यक्तिगत, सार्वजनिक हो सकता है जैसा कि कॉग्रेस का रहा है। मगर जब भी वैचारिक ठहराव किसी भी दल में आता है तो उसका पतन भी सुुनिश्चित हो जाता है। क्योंकि प्रवाह के आभाव में शुद्ध जल भी बदबू मारने लगता है तो दल क्या चीज है। 
जय स्वराज..........? 
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