विकास के रथ पर सवार अखिलेश का समाजवाद

विलेज टाइम्स। डॉ. लोहिया के समाजवाद से लेकर मुलायम के समाजवाद को लांघ, विकास के रथ पर अखिलेश के समाजवाद ने भले ही चुनाव के ठीक पूर्व जो विकास मॉडल प्रस्तुत किया है। पूर्व समाजवादी सरकार के क्रिया-कलापों के दंश को झेलते हुयेे, मगर उ.प्र. की आवाम अखिलेश के इस समाजवाद से कितनी सहमत है। यह तो चुनावों में उसके द्वारा लगने वाली मुहर से ही साबित होगा। अब अखिलेश के समाजवाद की दिशा और दशा क्या होगी। चुनाव पूर्ण होने तक उ.प्र. की जनता और रणनीतिकारों के बीच यह सवाल फिलहाल भविष्य के गर्भ में ही रहेगा। 

मगर अखिलेश के नेतृत्व वाली समाजवादी सरकार के शुरुआती वर्षो में अपराधी, अपराध, दंगा, भ्रष्टाचार से तृस्त समाजवादियों की सरकार को भले ही 5 वर्ष होने तक उसके दंशो को झेल, समाजवाद को बढऩा पढ़ा हो। मगर आखिरी दौर में जिस तरह से जनकल्याण, विकास, सुरक्षा के इन्तजाम उभर कर विवादों के बीच उ.प्र. की जनता के सामने आये है। या फिर टी.व्ही. विज्ञापन और अखबारों की कतरनो से अखिलेश का समाजवाद विकास के रथ पर सवार नजर आ रहा हो। मगर समाजवादियों की देश में इस इकलौती सरकार देश में अपराध, अपराधी, परिवारवाद के आरोपों से वहनहीें बच सकी। 

मगर चुप रह, कम व सटीक बोलने वाले उ.प्र. के मु यमंत्री अखिलेश यादव चुनाव से ठीक पूर्व समाजवाद व समाजवादियों की छवि पूर्व समाजवादी सरकारों से अलग बनाने में अवश्य कामयाब रहे। लखनऊ में मैट्रो, दिल्ली से लखनऊ एक्सप्रेस वे पर सुखाई उ.प्र. डायल 100, गोमती नदी में जल बस, समाजवादी पेन्शन, लेपटॉप, मोबाइल, किसान बीमा इत्यादि जनहित उ.प्र. के हित के वह कार्य है। जिन्हें उन्होंने अपराध, अपराधी, दंगो, भ्रष्टाचार की काली छाया से निकाल उ.प्र. की जनता तक पहुंचाने की शुरुआत की है।  

अब उ.प्र. की जनता पर भ्रष्टाचार, अपराध-अपराधी, दंगो का दंश कितना गहरा और ज म कितने हरे है तथा  विकास का रंग कितना गहरा और विज्ञापन एजेन्सी या सीधे जनता को अखिलेश के कार्यो से होने वाली अनुभूति उसके दिल के कितने नजदीक है जिसे महसूस कर स्वयं को समाजवादी सरकार के कार्यो को से स्वयं को कितना अभिभूत महसूस कर रहे है। यह तो बैंलेड बॉक्स ही तय करेगें। मगर अखिलेश के नव समाजवाद की दशा और दिशा अवश्य इस चुनाव में यह तय करने वाली है कि अब समाजवाद की विरासत स हालने के सच्चा उत्तराधिकारी कौन है।                 बहरहाल जो भी हो, मगर उनका भविष्य भले ही स.पा. के सशक्त नेता के रुप मे स्थापित हुआ है। मगर उन्हें पुन: सत्ता में लौटने फिलहाल कड़ा संघर्ष करना ही होगा। 
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