नैतिक पतन कहीं ले न डूबे, लोकतंत्र

व्ही.एस.भुल्ले | अविश्वास और आक्रोश लोकतंत्र में एक ऐसी धुरी बनते जा रहे है, जो इतने बड़े महान लोकतंत्र के लिये शुभसंकेत नहीं। कारण जनसमर्थन, प्रदर्शन के जो तौर तरीके देश में मौजूद राजनैतिक दलों ने इजात कर रखें है। और सरकारों की पिछलग्गू बन, संवैधानिक सरंक्षण प्राप्त मशीनरी ने जो तौर करीके जनसेवा के नाम रखें है, वह इस सूचना क्रान्ति के दौर में किसी से छिपे नहीं।

   मगर नैतिक पतन के चलते लोकतंत्र के नाम सब कुछ चल रहा है। परिणाम कि जनता के अन्दर विश्वास दिन व दिन घटता जा रहा है। अब तो हालात ये है कि संस्थानों में अपनी डियूटी निभाने के लिये समय अनुसार निर्धारित कार्यक्रम चलते रहते है। तो सरकारें बनाने राजनैतिक  दल अपने ही हिसाब से चुनावी समीकरण चला रैली, सभाओं में भीड़ जुटा, लोकतंत्र में मौजूद विकाऊ ब्लैक मेलर मीडिया के सहारे खूब छवि चमकाते रहते है।
    बहरहाल कहने का तात्पर्य जिस तरह कीगलबहियों सरकारों, नौकरशाही व बिकाऊ मीडिया के बीच चल रही है। धीरे-धीरे जनता भी अब समझने लगी है। जिसके चलते हाताश निराश लोग, न उ मीद पाल या तो उदासीन रहते है या फिर जरा-जरा जरा सी बातों पर इतने आक्रोशित हो जाते है, कि वह समझ ही नहीं पाते कि क्या सही और क्या गलत है। 
    मगर लोकतंत्र की आज सबसे बड़ी बिड बना यह है कि जिनके कंधो पर स्वच्छ मजबूत लोकतंत्र का भार है। वह भी नैतिक पतन की बाढ़ में वह रहे है। कारण सत्ता, चाहे वह राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सत्ता हो या फिर इन्हें प्राप्ति के लिये नैतिक, अनैतिक संघर्ष करने में जुटे है। ऐसे में खून पसीने, कड़े संघर्ष और अनगिनत कुर्बानियों की खातिर इस लोकतंत्र को बचाने उसकी रक्षा करने आखिर किसी को शुरुआत करनी ही होगी। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब हम लोकतंत्र के नाम अराजक तंत्र में तब्दील नजर आयेगें। 
    बेहतर हो कि शुरुआत संयम और धैर्य के साथ सभी के सहयोग से सटीक हो। 
       जय स्वराज 
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