संगठित सरकार के 13 वर्ष का जलसा: उप्र में सुखोई, मैट्रो का सफर, तो मप्र में सडक़ों के लाले

व्ही.एस.भुल्ले। अगर संगठित सरकार के 13 वर्षो की उपलब्धियों पर नजर डाले तो सुशासन के लिये संघर्षरत म.प्र. में 11 वर्ष पूर्व भय, भूख, भ्रष्...

व्ही.एस.भुल्ले। अगर संगठित सरकार के 13 वर्षो की उपलब्धियों पर नजर डाले तो सुशासन के लिये संघर्षरत म.प्र. में 11 वर्ष पूर्व भय, भूख, भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की बात हुई थी अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन शहरों में बड़े-बड़े होर्डिगं लगाकर ही नहीं खबरनवीसो के बीच भी यह बात दोहराई गई थी। कि इसकी शुरुआत गंगा की तरह गंगोत्री से की जा जायेगी। मगर र्दुभाग्य म.प्र. के गांव गरीब, गली, किसान का कि 13 वर्ष संगठित सरकार के शासन के बीतने के बाद भी माई के लाल के नाम से चर्चित लोगों की सरकार इस नारे का बहुत कुछ नहीं कर पायी।

यूं तो संगठित सरकार ने, इस बीच म.प्र. को तीन-तीन मु यमंत्री दिये। मगर बहिन भारती को छोड़ दें तो बैलगाम नौकरशाही पर लगाम नहीं लग पाई। जहां उ.प्र. की सरकार लखनऊ शहर में सरपट मेट्रो दौड़ा, सडक़ पर सुखोई तक उतार लाई। वहीं म.प्र. के लोग आगरा-मु बई राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. 3 की दुर्दशा देख, पथरा से रहे है। कई वर्षो से सडक़ों का दंश झेलते म.प्र. वासी मेट्रों, सुखोई का सपना तो देखना दूर सुरक्षित सुगम सडक़ों तक को देखने तरस गये। भय, भूख, भ्र्रष्टाचार के बीच सुशासन का दम भरने वाली संगठित सरकार तीनों ही मुद्दों पर अभी भी हाफती नजर आती है। 

लेकिन तीर्थ दर्शन, लाडली लक्ष्मी और डायल 100 जैसी योजनायें अवश्य जमीन पर नजर आती है। जिसमें डायल 100 को और कारगार परिणाम मूलक बनाने की गुजाइन्स है। अगर सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति मजबूत और संगठित सरकार का संकल्प मजबूत हो, तो कम खर्चे में ही म.प्र. के आम नागरिकों को बेहतर सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराई जा सकती है। जो म.प्र. ही नहीं भारतीय आन्तरिक सुरक्षा के लिये भी म.प्र. का एक ऐतिहासिक कार्य हो सकता है। 

    अगर यो कहें कि  म.प्र. की संगठित सरकार तीर्थ दर्शन लाडली लक्ष्मी पर अवश्य अपनी पीठ थपथपा सकती है। मगर गरीब जनता का पैसा खर्च कर, जश्र नहीं मना सकती। क्योंकि नैतिकता भी कोई चीज सार्वजनिक जीवन मेंं होती है। रहा सवाल संगठित सरकार के भय, भू ा, भ्रष्टाचार मुक्त म.प्र. के नारे का तो तीनों ही मुद्दों से म.प्र. की जनता को भले ही मुक्ति न मिली हो, मगर एक वैचारिक विशेष लोगों को अवश्य इन तीनों मुद्दों से मुक्ति मिल गई। जिसके लिये संगठित सरकार बधाई की पात्र है। 

     मगर 13 वर्षीय इस संगठित सरकार में आम गांव, गरीब, गली को ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका, जो जनता के पैसे पर जबरन जश्रों को छोड़, अपनी खुशहाली पर जश्र मना सके। 

    कारण साफ है कि सरकार की केन्द्रीकृत महात्वकांक्षा पूर्ति हेतु, बैलगाम नौकरशाही को आम गांव, गरीब, गली की जनाकांक्षाओं को गन्ने की फोई की तरह निचोड़ आदमखोरों के आगे फैक दिया है। न तो लाखों, करोड़ फूक इन्वेस्टर मीट के नाम बड़े-बड़े होटलो में जनधन से होने वाले जलसे गांव, गरीब को रोजगार ही दिला पाये। न ही वह स्वास्थ सेवायें, ऐसी शिक्षा नीति ही सुनिश्चित कर पाये जिसके लिये आम गरीब आये दिन कलफता रहता है। न ही ऐसी सुरक्षा सुनिश्चित कर पाये जिससे पुलिस जनसेवक और लोग सडक़ ही नहीं घरों में स्वयं को सुरक्षित मेहसूस कर पाये। 

    बिजली शहरों तक तो ठीक मगर गांवों में अभी भी सभी को निर्धारित समय में पूरे वोल्टेज के साथ बिजली मिले सुनिश्चित नहीं कर पाये। जिसमें मां नर्मदा की सेवा का दम भरने वाली इस संगठित सरकार को शायद नहीं पता कि जिस पानी को पीने से पशु-पक्षी भी शर्म खाते है उस पानी को शहर ही नहीं गांव गरीब भी पीने पर मजबूर है। 

     हालात ये है कि विगत 2 वर्षो से गांव, गरीब, रोजगार पाने अन्यंत्र प्रदेशों में रोजगार पाने जा रहे है। रहा सवाल तेल राशन का तो अब भी लाइन में लगने पर भी समय से नसीब हो, ऐसी कोई गारन्टी नहीं।

    ऐसे में भय, भूख, भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का दम भरने वाली संगठित सरकार भले ही मौके बेमौके जन-धन से जश्र मना, जनता के धन से बटने वाली ब सीस से संगठित सरकार का कीर्तिगान बढ़ा अपनी यश कीर्ति छपवा अपनी पीठ थपथपा सकती है। क्योंकि चाहे अनचाहे ढंग से प्राप्त समर्थन आपके पक्ष में है। मगर जिस तरह से र्दुव्यवस्था का दंश गांव गरीब, गली का नागरिक झेल रहा है। प्रबन्धन के सहारे उसमें उबाल मृत प्राय: विपक्ष के चलते भले ही न आये। लेकिन अगर गांव, गरीब का जमीर जागा तो संगठित सरकार की बात तो हम छोड़े पूर्व इकला चली सरकार की तो 36 सीटें भी आ गयी थी। हो सकता है मद में चूर नौकरशाही पर सवार इस संगठित सरकार को यह सौभाग्य भी न मिल सके। वह भी हम गांव, गरीब, किसान का र्दुभाग्य ही होगा। 
    जय स्वराज........? 

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संगठित सरकार के 13 वर्ष का जलसा: उप्र में सुखोई, मैट्रो का सफर, तो मप्र में सडक़ों के लाले
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