साम्राज्य की होड़ में कलफता लोकतंत्र

वीरेन्द्र शर्मा। यह सच है कि प्रकृति के विरुद्ध इस पृथ्वी पर आज तक ऐसी कोई शख्सियत नहीं टिकी, फिर चाहें स्वयं प्रभु के दूत, अंश, अहंकारी, बलशाली, वैभवशाली स पन्न या फिर कोई शासक सेवक रहा हो, सभी को नियति की खातिर मानवता के लिये नतमस्तक हो अपना अस्तित्व, साम्राज्य, वैभव प्रकृति में ही लीन करना पड़ा। 

जिनका वैभव, साम्राज्य का उल्लेख भी हमें हमारे धर्मग्रन्थ, इतिहास और मौजूद लावारिस महल, किले, गडिय़ों में मिलता है। इतना ही नहीं वो नाम भी पढऩे मिल जाते है जिनके वैभव के आगे आज के सत्ता, साम्राज्य के लिये संघर्षरत लोग बौने नजर आते है। मगर आजाद भारत में सत्ता, साम्राज्य स्थापित रखने या कायम करने कुछ लोग अंग्रेजों की तरह जो कभी देश के 35 करोड़ लोगों पर 2 लाख होकर भी भारी थे उन्हीं के पद चिन्हों पर चल सत्ता की खातिर कुछ भी करने तैयार है। 

जिस तरह से सत्ताधारी लोग या सत्ता को लालहित लोग नये-नये इतिहास गढ़, रच रहे है वह न तो प्रकृति अनुकूल है न ही मानवीय स यता, संस्कृति, संस्कारों के अनुकूल है। न ही उनकी कार्यप्रणाली प्रकृति अनुसार स्थापित मूल्य सिद्धान्तों के अनुरुप है। 

देखा जाये तो पूर्र्व में सत्ता संचालन करने वाले कुछ ज्यादा ही अहिंसावादी शान्ति प्रिय लोग थे जिनकी नैकनियति भलमनसाहत का लाभ उठा जहां लोग स्वयं का घर भरने में मशगूल रहे तो राष्ट्र के दुश्मन अपनी जड़े जमाने में जुटे रहे। मगर देश के बदले निजाम के उताबलेपन ने देश ही नहीं समुची मानव स यता को हिंसा की आग में झौंक दिया है बगैर आन्तरिक सुरक्षा को पु ता किये। 

ये अलग बात है कि वाह सुरक्षा के मामले में तीव्र गति से विकास हुआ है व राष्ट्र प्रेम और सेवा को लेकर चर्चायें भी सरगर्म हुई है। मगर आन्तरिक सुरक्षा, वोटों की राजनीति के चलते तार-तार हो कलफने पर मजबूर है। आम आदमी यह विश्चास नहीं कर पा रहा कि वह अपने घर में भी सुरक्षित है या नहीं। जिस तरह की वैमनश्यता भारतीय समाज में सत्ता की खातिर स्थापित होने की कोशिस कर रही है वह समुची लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये खतरनाक ही नहीं शर्मनाक भी है। 

जिस तरह से सत्ताधारी दल अपना कदम पाक दामन साफ दिखाने की कोशिस करते है उसी तरह विपक्षी दल बगैर सोचे समझे सत्ता की खातिर विरोध में कूद पढ़ते है। फिर शुरु होता है आरोप-प्रत्यारोप का दौर जिसे धार देती है धन लोलुप मीडिया जिससे राष्ट्र का तो नुकसान हो ही रहा है बल्कि मानवता भी कलफ रही है जिसमें स यता, संस्कार, संस्कृति, मूल्य सिद्धान्त भी दम तोड़ते नजर आते है। 

बेहतर हो कि हम प्राकृतिक सिद्धान्तों का पालन कर प्रकृति की रक्षा कर मानवीय सभ्यता को जिन्दा रख पाये, यहीं प्रकृति और मानवता की सबसे बड़ी पूजा और राष्ट्र सेवा होगी। 
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment