कालेधन पर, जंगल में मचा, कोहराम...?

व्ही.एस. भुल्ले @तीरंदाज
भैया- कालेधन, आतंकवाद, भ्रष्टाचार को लेकर मचे कोहराम की भगदड़ में मने न लागे कि अब मने साबुत बच पाऊंगा। पहले तो आदमखोर, कालाधनधारी, आतंकवादी, भ्रष्टाचारी ही हमें नोच तूप सरेयाम बोटा पटा कलफाते थे तो कभी-कभी अपनी भूख मिटाने के बहाने हम जैसे अहिंसक निर्बल लोगों को सरेयाम हजम कर जाते थे। भाया आखिर इन्हीं सभी अन्याय, अत्याचारों से निजात पाने ही तो इस मर्तवा हमने इस चुनाव में शेर नहीं बल्कि बब्बर शेर को चुना था। और हाथियों के झुंण्ड पर पूरा भरोसा किया था। कि वह राजा बब्बर शेर के राम राज को अपनी पीठ पर बिठा राज-पाठ देखने बगैर किसी खतरे के जंगल घुमायेगें और नई राज सत्ता का सुख हमें दिखायेगें। मगर जिस तरह की चीहाण हाथियों की जंगल में सुनाई देती है उसे सुन मने न लागे कि नये राजा के राज में सब कुछ ठीक चल रिया शै। 

     मगर भाया नये राजा के बनने के बाद से जो हाका आदमखोरों की धरपकड़ के लिये जंगल की व्यवस्था में लगा है वह किसी से नहीं छिपा। हम जैसे निरीह प्राणियों की नोच तूप कर निकलने वालो के पकड़े जाने के बजाये। फिलहाल तो अब हमें ही जिन्दा रहने के लाले आन पढ़े है। क्योंकि इस कोहराम से मची भगदड़ में, अपने ही खुरो से अपना चारा खूंद अब तो जिन्दा रहने, भोजन के लाले पड़े है। मगर सुना है कि 15 दिन बीत जाने के बाद भी आदमखोरों का कोई अता-पता नहीं है, जंगल में पिंजड़ा लगे रास्तों से सिर्फ खरगोश, लोमड़ी, चीतल, हिरण, नेवले, नीलगायों जैसे निरीह प्राणियों के काफिले गुजर रहे है। 

     कै वाक्य में ही हारे 50 दिनी इस त्याग-तपस्या से हमारी और हमारी आने वाली नस्ल की तकदीर बदल जायेगी और नये राजा के हाके के हुकूम से कालाधन, आतंक, भ्रष्टाचारी आदमखोरों की मण्डली पकड़ जायेगी। फिलहाल तो जंगल का राजा दिलासे पर दिलासा दें, कुछ दिन की तकलीफ के बाद सुरक्षा और खुशहाल जीवन की बात सार्वजनिक तौर पर ताल ठोक कर कह रहा है। मगर इसके साथ ही 50 दिन की पीढ़ा सहने का भी अनुरोध हम निरीह प्राणियों से कर रहा है। मगर हारे मदमस्त हाथियों का झुंण्ड भी पूरी मुस्तैदी के साथ पूरे जंगल में चीहाड़ भर रहा है। और जंगल के राजा से हाके में मरने वाले निरीह प्राणियों की शहादत सहित उनकी, सुरक्षा पर सवाल खड़े कर रहा है। 

भैये- तने तो बावला शै, कै थारे को मालूम कोणी, जब से जंगल का निजाम बदला है, तभी से मदमस्त हाथियों की चिहाड़ से जंगल के राजा की कत्र्तव्यनिष्ठा में जबरदस्त खलल पड़ा है। और थारे जैसे चूहे, खरगोश, चीतल, हिरण भी तो दिन रात डकरा रहे थे, कि दुहाई हो, महाराज आपके राज्य में अत्याचार, अन्याय बढ़ रहा है। हम दीन-हीनों की कोई नहीं सुन रहा है। अन्याय, अत्याचार ऐसा कि गरीब दो वक्त का निवाला भी शुकून से नहीं खा पा रहा है न ही नौनिहालों का भविष्य कड़ी मेहनत बावजूद बेहतर बना पा रहा है। हालात ऐसे कि अब तो प्लाट, फार्म हाउसों के सहारे जंगलों में ं भी निशान खींचे जा रहे है और निरीह प्राणियों को सर छिपान झोपड़े भी नहीं मिल पा रहे है। अब ऐसे में जब राजा जागा है तो उसकी तरकीब अत्याचार, अन्याय से निजात दिलाने हाके की हो या फिर पिंजड़ा लगा आदमखोरों को पकडऩे की हो, तो फिर कोहराम कैसा? 

भैया- बात तो थारी सौ आने सच, मगर कै करु, जिस तरह से इस हांके से हारे रोटी, रोजगार पर आन पढ़ी है व प्रकृति प्रदत्त भोजन के रुप में प्राप्त दूव पत्तियां भी हमारे ही खुरो से खुंद नष्ट हो रही है। अगर ऐसा ही बगैर मुक्कमल इन्तजाम के कुछ और दिन चला तो भाया ााने के लाले पड़ जायेगें, आदमखोर तो फिर भी हम लोगों के झुंण्डों की आड़ में साफ बच निकल जायेगें। मगर हम जैसे दीन-हीन तो वेभाव ही जीते जिन्दा मर जायेगें। 
भैये- तने तो बावला शै, सुना है नये राजा ने पूरा आंकड़ा भिड़ा रखा है और हांके से पूर्व मु य रास्तों पर हर साइज का पिंजड़ा लगा रखा है। सो थारे जैसे नेवले, चूहे, बिल्ली, खरगोशों को डरने की जरुरत नहीं। क्योंकि इतने बड़े जंगल में पता ही नहीं चल रहा था। कि रीक्ष, लकड़बग्गे, लोमड़ी, भेडिय़ा, तेन्दुओं सहित बिल्लियों के बीच आदमखोरों का झुंण्ड कहां छिपा है। अब जबकि हाका लग चुका है तो सर्ब रख, जब सेकड़ों सालो से थारे जैसे दीन-हीनों का पीढ़ी दर पीढ़ी कुछ नहीं बिगड़ा तो इन 50 दिनों में थारा कौन क्या उखाड़ लेगा। 

भैया- हारी चिन्ता उखाडऩे, बिगाडऩे की नहीं, बल्कि हारी चिन्ता, उस भोजन को लेकर है, जिसके सहारे हारे पूर्वज अपनी नस्लों को अपनी पर परा, संस्कृति अनुसार आज तक जिन्दा रख पाये। हारी चिन्ता उस हरे भरे भू-भाग को लेकर है, जिसे हमारी जननियां संस्कृति बस स्वयं और आने वाली नस्ल के बेहतर भविष्य केे लिये बचाकर रखते लाये। मगर इस हांके में अब तो वह भी सार्वजनिक हो ली, जिसे हम और हमारे पूर्वज अपने-अपने घोसलों में वक्त वेवक्त के लिये जरुरत के हिसाब से बचाकर रखते थे। सो हारा तो भाया कलेजा मुंह को आवे। 

भैये- तने तो बावला शै, गर वो दिन भी नहीं रहे तो ये दिन भी नहीं रहेगें। सब्र रख और हाके पर विश्वास कर उसे जरा पूरा होने तो दे, शेर, चीता, सियार, भालूओं की भी गिनती पूरी हो जायेगी और आदमखोरों की मण्डली भी इसी जंगल में थारे को भी साफ नजर आयेगी। 
भैये- मने समझ लिया थारा इसारा लगता है इन 50 दिनों में समुचे जंगल की ग्रेडिंग होना है और 50 दिन बाद ही सही लगता है इन आदमखोर कालाधन, आतंक, भ्रष्टाचारियों का भी तिया पाचा होना है। सो मने इस कष्ट को शेष बचे दिनों पूरी हि मत से उठाऊगां जरुरत पड़ी तो, देश की खातिर छिडऩे वाले हर अभियान में एक राष्ट्र भक्त की तरह अपनी भूमिका निभाऊंगा।  जय जय श्रीराम 
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