प्रधानमंत्री जी की मेहनत पर पलीता: देश के दो परिवारों के विरुद्ध संगठित द्वेष बना चर्चा का विषय

व्ही.एस. भुल्ले। सत्ता कितनी ही बलशाली रही हो और उनका सं या बल संगठित आधार पर कितना ही अभेद रहा हो, मगर सहानुभूति भारतीय स यता, संस्कृति का वह अचूक अस्त्र है जिसका प्रहार कभी खाली नहीं जाता। भारत ही नहीं विश्व का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिस तरह से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नेे अपना सारा जीवन यहां तक कि परिवार तक को त्याग देश की खातिर जो त्याग देश के लिये दिया है और जिस दिन से वह प्रधानमंत्री बने है उसी दिन से वह एक ऐसे भारत के निर्माण में जुटे है, जिसकी आकांक्षा हर भारत वासी को हो सकती है, उस पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। 

क्योंकि किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत या सामूहिक रुप से देश के प्रति समर्पण हो सकता है। उसकी अपनी निष्ठाये, ईमानदारी भी उसमें मौजूद संस्कार अनुरुप हो सकती है। उसका अपना व्यक्त्वि, शिक्षा, दिक्षा, प्रशिक्षण जो भी हो। मगर ऐसे में उसके द्वारा किये गये या किये जा रहे कार्यो का परिणाम उसका प्रतिबि ब होता और देश के प्रधानमंत्री के कार्य का प्रतिबि ब बताता है कि नेहरु, इन्दिरा, अटल, राजीव, मनमोहन के बाद निर्णय लेने का जो विश्वास देश वासियों के बीच पैदा हुआ है। वह मोदी की देश के प्रति निष्ठा, समर्पण और अथक परिश्रम का परिणाम है। जिन्होंने आज कई क्षेत्रो में अपना लोहा मनवाया। 

इतना ही नहीं जो याति या रुतवा भारत ने विश्व विरादरी में दर्ज किया है वह भी मोदी जी की ही मेहनत का परिणाम है अगर यो कहे कि कई क्षेत्रो में सुधार कार्यो की शुरुआत तीव्र गति से हुई है और केन्द्र में भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का जो भाव देने में आता है। उसके पीछे देश के प्रधानमंत्री का ही अथक परिश्रम है। ाले ही कुछ कार्यो की प्रष्ठ भूमि पूर्ववर्ति सरकारों की रही हो और देश के प्रधानमंत्री उसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकारते भी है। 

मगर वैचारिक रुप से संगठित किसी दल की सरकार के मुखिया के रुप में उन्हीं के मातहतों द्वारा किये जा रहे कार्य उनके जीवन का राष्ट्र को समर्पण या उनकी मातृ संस्था पर सवाल खड़े करने का मौका दे रहे है। फिर चाहे देश के दो राजनैतिक रुप से महत्वपूर्ण परिवारों के विरुद्ध चलाये जा रहे अघोषित रुप से विद्वेष पूर्ण अभियान हो, या फिर वैचारिक रुप से प्रतिद्वन्दी दलो का दमन हो। 

इस तरह के कृत्यो से न तो राष्ट्र का भला होने वाला है, न ही देश की आवाम सहित उस दल संगठन का जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में दमन पूर्वक विरोधियों को कुचलना चाहते है। शायद ऐसे लोग इतिहास से कुछ नहीं सीखना चाहते। विश्व हो या फिर हमारा देश जिसने सहानुभूति की चिंगारी को हवा अपने दमन पूर्ण रवैये से दी है, वह सत्ता जलकर रा ा ही हुई है, और आज उसका नामों निशान तक नहीं। इतिहासों में हम पढ़ते है बैसे भी कहावत है कि नियति के आगे किसी की नहीं चलती सो जो नियति में लिखा है वहीं होगा। 

मगर बुद्धि विवेक का भी मानवीय जीवन एवं समाज, राष्ट्र में एक अपना स्थान होता है। सो जनहित, राष्ट्रहित में इसका इस्तमाल होना चाहिए किसी की राष्ट्र भक्ति उसके आम जन एवं राष्ट्र के प्रति समर्पण पर सवाल नहीं हो सकते। अगर उसका व्यवहार, कार्यप्रणाली, परिणाम अहंकारी, दमनकारी है तो सहानुभूति के अचूक अस्त्र का हरकत में आना स्वभाविक ही नहीं, नैसर्गिक, प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसका प्रादुर्भाव लगभग हर सत्ता में देखने मिलता है। मगर जिस तरह से भाजपा शासित प्रदेशों की सरकारें शिकार हो, अब केन्द्र को भी जो राष्ट्र को समर्पित सरकार कही जाती है को अपने आकोस लेने तैयार हो। तो विचार व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं, संगठनात्मक स्तर पर भी प्रधानमंत्री जी को करना चाहिए क्योंकि देश को बड़ी उ मीद है प्रधानमंत्री से। 

जो खेल चोर, पुलिस का दिल्ली प्रदेश सरकार और केन्द्र के बीच मुंह जुबानी के माध्ययम से चल रहा है जिस अहंकारी बादलो की गडग़ड़ाहट दोनों ओर से चल रही है उससे दिल्ली की जनता बैवस सहमी हुई है उसे डर है कि बादलो की गडग़ड़ाहट से उत्पन्न बिजली कहीं उनके झोपड़ों को निवाला न बना ले, नहीं तो सब कुछ जलकर रा ा हो जायेगा। 

ऐसा ही कुछ कॉगे्रस, भाजपा पक्ष-विपक्ष के नाम चल रहा है जिसमें सीधे-सीधे तौर पर दो राजनैतिक परिवार गांधी और सिंधिया परिवार को निशाना बनाया जा रहा है। जो किसी भी लोकतंत्र में स्वस्थ राजनीति का धोतक नही हो सकता। जिसका उदाहरण दिल्ली की सडक़ों पर तब प्रमाणिक तौर पर सामने आया जब एक सैनिक द्वारा की गई आत्महत्या पश्वात गांधी परिवार और सिंधिया परिवार के मुखिया उस सैनिक परिवार जनो से मिलने जा रहे थे। 
मगर जिस तरह केन्द्र सरकार के अधीन दिल्ली पुलिस के कुछ जवानो द्वारा उन्हें बीच रास्ते में गिरफतार किया उनके साथ धक्का मुक्की हुई जबकि दोनो सांसद देश के सबसे बड़े दल के प्रमुख नेता है जिसमें राहुल जहां कॉग्रेस के भावी अध्यक्ष है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया लोकसभा में सचेतक है। 

अगर संवैधानिक पदो पर बैठे चुने नेताओं के साथ चन्द पुलिस कर्मी सार्वजनिक तौर पर ऐसा व्यवहार करेगें तो लोकतंत्र कहां रह जायेगा। और यहीं से सहानुभूति का जन्म होता है। जो किसी भी सत्ता के लिये खतरनाक हो सकता है। फिर उसका मुखिया भले ही निर्दोष ही क्यों न हो। वह संगठन कितना ही देश भक्त, राष्ट्रवादी क्यों न हो, कोई विश्वास नहीं करेगा। 
 क्या ऐसी स्थिति में देश को एक और लोकतांत्रिक आजादी के लिये तैयार रहना चाहिए ये कुछ देश व देश के मुखिया और राष्ट्रवादी संगठनों के सामने अहम सवाल होना चाहिए। 
क्योंकि यह देश का सौभाग्य है जो देश को वर्षो बाद मेहनती निर्णायक ईमानदार प्रधानमंत्री मिला हो। उसका जनहित राष्ट्रहित में उपयोग अपेक्षा ही नहीं उसका संरक्षण और सहयोग भी होना चाहिए। क्योंकि द्वेषपूर्ण व्यवहार कभी भी किसी सत्ता के लिये शुभसंकेत नहीं हो सकता। यह बात भाजपा व भाजपा के सहयोगी, संगठन सहित अन्य राष्ट्रवादी संगठनों को ाी समझना चाहिए क्योंकि इस देश में एक कहावत और प्रचलित है  कि घर की छूट और जगत की लूट से सभी भारत वासी परिचित है। इसलिये लोकतांत्रिक भावना अनुरुप राजनैतिक दलो का आपसी व्यवहार भारत वर्ष ही नहीं उसकी करोड़ों करोड़ आवाम के हित में है।   

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