शहडोल में झूठ व साम्राज्यवाद को सबक सिखाने का मौका

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स। इस उपचुनाव में समझ नहीं आता कि किसका विरोध या किसका समर्थन करें, मगर इस सबके बीच इतना अवश्य समझ आता है। जो लोग जनसेवा के नाम झूठ बोल अपना साम्राज्य स्थापित कर अपने साम्राज्य को सत्ता के माध्ययम से निरन्तर स्थापित रखना चाहते है। इस उपचुनाव में वक्त है मौका है ऐसी ताकतों को  निस्तनाबूत करने का जो जन-धन को दोनो हाथों से लुटा आम गरीब को कलफने पर मजबूर रखना चाहते है। जो ताकते शहडोल ही नहीं म.प्र. की महान जनता के मान स मान, स्वाभिमान को दता-बता हर हाल में सत्ता में बने रहना चाहते है। 

और वह ऐसा समझते भी इसीलिये है कि वह अपनी धूर्त पूर्ण रणनीति के चलते झूठी संवेदनाओं के साथ अभी तक म.प्र. ही नहीं शहडोल की महान जनता को मूर्ख या लालची समझते है। जो उन्हें मुगेरीलाल के सपने दिखा तथा छोटे-मोटे बटोनो से भरी योजनाओं के माध्ययम से यूं ही मूर्ख बनाये रखना चाहते थे। मगर यह शहडोल की महान जनता की महानता के आगे उनका मुगालता भर है। क्योंकि यह वो भू-भाग है जहां आजाद भारत के सपने को साकार करने यहां के गरीब लोगों ने सन 1938 में स्व. सरदार बल्लभ भाई पटेल के एक आव्हन पर अंग्रेजों के खिलाफ नंगे भूखे होकर भी जंग छेड़ दी थी। कौन नहीं जानता विरषा मुन्डा के महान बलिदान को जिन्होंने अपनी राष्ट्र भक्ती का परिचय देते हुये अंग्रेजोंकी ईट से ईट बजा दी थी।  
ये अलग बात है कि भले ही शहडोल का चुनाव उपचुनाव हो, मगर मौका म.प्र. शहडोल की गरीब जनता के मान स मान, स्वाभिमान का है। और उनके मान-स मान, स्वा िामान से खिलबाड़ करने वाले झूठ, फरेब कर अपना साम्राज्य स्थापित रखने वालो को सबक सिखाने का है। अगर दूसरे शब्दों में कहे कि जिस तरह का चीरहरण म.प्र. ही नहीं शहडोल की महान गरीब जनता के साथ मान-स मान, स्वाभिमान के साथ विगत 10 वर्षो से चल रहा है, उसमें दरबार भी लगा है और राजा भी है उसके सिपहसालार सहित बड़े-बड़े बाहुबली विद्ववानों की फौज भी है। मगर एक जो कमी रही है वह प्रभु कृष्ण की है। जिनकी अनुउपस्थिति के चलते और कौन-कौन से दिन या दृश्य म.प्र. की गरीब महान जनता और हमारी आने वाली पीढ़ी को देखना पड़ेगें, यह कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी। 

शायद संघ के एक सेवक ने भोपाल में आयोजित अपने मातृ संगठनों की बैठक में सही कहा था कि उनका उद्देश्य जो भी रहा हो, मगर उन्होंने कहा था कि लोगों ने आप में कॉग्रेस से इतर विकल्प देखा था, मगर आपने क्या किया। यह यक्ष प्रश्र छोडक़र वह चले गये, शायद देश को समर्पित एक संगठन के कार्यकत्र्ता का इशारा सटीक था। मगर सत्ता लोलुप साम्राज्यवादी विचारों के धनी लोग इसे पचा नहीं पाये और हुआ भी वहीं जो विगत 10 वर्षो से जनसेवा के नाम म.प्र. में चल रहा है। अगर यो कहे कि वर्ष सन 2016 में म.प्र. की लिखी जाने वाली ईवारत के लिये दोषी लेखक है तो उसे देखने पढऩे वाले लोग भी म.प्र. की जनता के अपराधी कम नहीं, कारण जो भी रहे हो। 

अगर शहडोल की महान जनता हमारे महान लोकतंत्र और लोकतंत्र की मालिक गरीब, निशाय, वैबस जनता के मान-स मान, स्वाभिमान की रक्षा की अगुआ बनना चाहती है तो उसे संकल्प लेना होगा, उन साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ जो म.प्र. में लोकतंत्र और जनसेवा के नाम अपना सतत साम्राज्य स्थापित करने राजनीति के मूल्य सिद्धान्तों का ताक पर रखकर संस्कार और जनाकांक्षाओं का दमन करना चाहती है। अगर म.प्र. के इतिहास में शहडोल की महान जनता ने अपने इतिहास मान-स मान, स्वाभिमान की रक्षा उस भ्रामक प्रचार और निहित स्वार्थो, लालच को दरकिनार कर धोखा देने वालो को सबक सि ााने का काम नहीं किया तो निश्चित ही वह मानवता, म.प्र. का इतिहास और आजादी के लिये दी गई वह महान कुर्बानियां, जिन्होंने अपना सबकुछ न्यौछावर कर, इस देश और प्रदेश को आजाद कराया, माफ नहीं करेगीं।  

बड़ी शर्म की बात है जब प्रदेश के वित्तमंत्री जी 2016-17 के बजट में कहते है कि 98 हजार करोड़ का कर्ज म.प्र. पर है। जबकि सीजीए की रिपोर्ट में 31 मार्च 2015 की स्थिति में म.प्र. पर 1 लाख 59 हजार करोड़ रुपये के कर्ज का आंकड़ा प्रस्तुत किया गया था। इतना ही नहीं म.प्र. के पूर्व मु यमंत्री ने विधानसभा में 1 लाख 40 हजार करोड़ के कर्ज का हवाला दिया था। कौन नहीं जानता कि म.प्र. का खजाना खाली है। अगर खबरों की माने तो म.प्र. अभी भी विदेशी बैंको की विभिन्न संस्थाओं से 56 हजार 310 करोड़ का कर्ज लेने की तैयारी में थी मगर व्याज दर अधिक होने से उसका मंसूबा पूरा नहीं हो सका।  
मगर दुर्भाग्य कि जिस योजना के तहत म.प्र. के लोग फ्री घूम तीर्थ यात्रा पर जा हम स्वयं को गौरान्वित महसूस करते है वह यात्रा महान भारत में कभी वह नागरिक करता था जो अपनी सभी जबावदेहियों से निवृत हो जाता था और तीर्थ धाम जाता था। अब इसे हम म.प्र. या शहडोल वासी अपना भाग्य या सौभाग्य कहे कि हम फ्री की तीर्थ यात्रा तो कर रहे है मगर जिनके लिये समुचा जीवन लगा, त्याग, समर्पण करते है। उन्हें हम कर्जदार बनाकर छोड़ रहे है, आखिर कैसे हमें मुक्ति मिलेगी यह समझने की बात है।

जिस प्रदेश में भृत्य का वेतन 15 हजार से ऊपर बाबू का वेतन 20 हजार से ऊपर और अधिकारी, मंत्री का वेतन 1 ला ा से ऊपर हो, वहां हम सस्ते राशन पानी वालो की औकात क्या? जो हम सवाल करना तो दूर उफ तक कर सके। 

देखा जाये तो साम्राज्यवादी व्यवस्था में या तो साम्राज्य स्थापित करने वाले लोग उसका मुखिया उसके सिपहसालार और उन्हें मदद करने वाली स्थापित व्यवस्था के लोग सुख भोगते है। मगर आम गरीब ऐन-केन प्राकेण इस साम्राज्यवादी ताकतों के अहंकार के शिकार होते है। फिर व्यवस्था जो भी हो, ाले ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में हम क्यों न हो। मगर यह कृत्य हम गरीब लोगों के लिये असहनीय एवं अपमानजनक है यह समझना शहडोल वासियों के लिये अति आवश्यक है। हमें उ मीद करना चाहिए कि हमारी शहडोल की महान जनता हमें निराश नहीं करेगी। हार-जीत जिसकी भी हो, मगर साम्राज्यवादी ताकतों का जश्न इस शहडोल की महान भूमि पर नहीं होना चाहिए हार-जीत तो एक व्यवस्था मात्र है, मगर निर्णय हमारा मौलिक अधिकार है। जिस सत्ता सरकार ने हमें भावुकता बस खून के आंसू रुलाये है, कम से कम ऐसे लोगों की हार सुनिश्चित करना हमारा कत्र्तव्य होना चाहिए। और जो भी लोग रणनीति बस जीते या हारे उसे अपना भाग्य नहीं, नियति का फैसला मान, स्वीकार करने तैयार रहना चाहिए। क्योंकि महान म.प्र. की जनता भावुक हो सकती है, मगर अन्याय प्रिय कतई नहीं। 
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