स्वार्थो के लिये उन्माद की इजाजत न तो राजधर्म, न ही राष्ट्र प्रेम देता

व्ही.एस. भुल्ले। आज जब राष्ट्र के बृद्ध, युवा, बच्चों, माता, बहिने, बच्चियों को खुशहाल जीवन के लिये सुरक्षा, संरक्षण की जरुरत है ऐसे समय में हमारे देश के महान नेताओं, धर्म गुरुओं, श्रषियों की पवित्र भूमि पर उन्माद पूर्ण राजनीति का प्रदर्शन, हम 82 करोड़ से अधिक सस्ते राशन वालो को क्या बताना चाहता है आखिर देश के समस्त राष्ट्र प्रेमी, राजधर्म के पालनहार इकट्ठा होकर हमें यह क्यों नहीं बता देते कि वाक्य में राष्ट्र के हालात क्या है? आखिर आप लोगों की क्या मजबूरी है जो आप लोग, हम देश वासियों के सामने ऐसा प्रदर्शन कर रहे है। 
मैं विश्वास दिलाता हूं मेरा देश और मेरे देश के महान नागरिक जो अनादिकाल से सामंत सूतखोर, अत्याचारी राजा, महाराजा, मुगल, अंग्रेजों के अत्याचारों का सामना, कम पढ़े लिखे होने के बावजूद भी नंगे भूखे रहकर करते आये है, और आज भी संघर्षरत है। वह भी तब जब वह पूर्ण विश्वास के साथ अपने हक का, कड़ी मेहनत का एक हिस्सा औपचारिक, अनौपचारिक धन के रुप में तथा सरकारें बनाने अपना अमूल्य एक वोट लोकतांत्रिक व्यवस्था चलाने अपने लोगों के लिये आपके एक आव्हन पर व्यवस्थागत देते आ रहे है, इसीलिये कि आज नहीं तो कल उन्हें ही नहीं, उनकी आने वाली पीढ़ी को मुफीद जीवन नसीब होगा। 

अगर राजधर्म पालन व राष्ट्र प्रेम पालन में और कुछ भी कम पड़ रहा है तो देश के करोड़ों करोड़ लोग संघर्षरत रहकर भी वह सबकुछ करने तैयार है, जिसकी जरुरत हो।  मगर ईश्वर का वास्ता कि हमारे महान राष्ट्र में उ माद पूर्ण सत्ता का सूत्रपात मत कीजिये, आप भी तो हमारे बीच ही से तो है, हम सब ही तो इस भू-भाग के रहवासी है। सत्ता हासिल करने या सतत सत्ता में बने रहने के, और भी तो रास्ते हो सकते है। हम भारत के 82 करोड़ से अधिक सस्ते राशन वाले लोग पूरी निष्ठा ईमानदारी से कह सकते है कि हम सस्ते सड़े अनाज या नंगे भूखे रहकर भी जिन्दा रह लेगें। लेकिन अपने बच्चों को नेता, मंत्री, मु यमंत्री, प्रधानमंत्री, अधिकारी, उघोपत्ति बनाने कभी गलत रास्तों कोई इस्तेमाल नहीं करेगें। ऐसा पीढ़ी दर पीढ़ी अनादिकाल से हम और हमारे पूर्वज करते भी आ रहे है। आपको सनद रहे कि आपके हमारे पूर्वजों ने हमारे अपने लोगों तथा हमारे इस महान भू-भाग भारत और करोड़ अपने गरीब साथियों के सुनहरे खुशहाल भविष्य तथा जीवन की ाातिर बड़ी पीढ़ाये सही है। हमारे अपनो ने अपना बचपन जबानी,बुढ़ापा दांव पर लगा अनगिनत कुर्बानियां दी है, और आज भी हम पूर्वजों द्वारा दिये संस्कारों की खातिर कुर्बानी देने व पीढ़ा सहने तैयार है। मगर उन्माद पूर्ण राजनीति हम अपने पवित्र भू-भाग पर नहीं चाहते। फिर सत्ता में जो भी रहे, पूंजीपतियों की तिजौडिय़ां खूब भरती रहे, हमें किसी से कोई द्वेष नहीं। क्योंकि उन्माद का रास्ता इन्सानियत और इस महान लोकतंत्र के लिये कतई उचित नहीं। 

इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि अभी तक तो हमारी पर परायें, संस्कार, स यता, मूल्य सिद्धान्त, क्षेत्र, भाषा, जाति, धार्मिक उन्मादो से हमें बचाये रखे और समय वे समय राजनीति में सत्ता की खातिर इसे हम झेलते भी रहे। मगर जिस तरह किसी भी राष्ट्र या उस राष्ट्र की रक्षा करने वाले सैनिकों को लेकर सत्ता पाने, सत्ता बढ़ाने या फिर सत्ता में सतत बने रहने राजनैतिक गलियारों में उन्माद मचा है वह बड़ा ही खतरनाक है। 
किसी भी राष्ट्र के नागरिकों के बाद सैनिक ही वह महत्वपूर्ण अंग होता है जिस पर किसी स प्रभु राष्ट्र का अस्तित्व टिका होता है। गत दिनों एक सेवा निवृत सैनिक द्वारा की गई आत्महत्या पर मचे सियासी बबाल पर राजनैतिक दलो की जो क्रिया-प्रतिक्रिया, उन्माद की अगुआ बनी मीडिया के माध्ययम से आ रही है, हम गरीबों को विचलित करने वाली है। क्योंकि अपने हक लिये धरना दे रहे सैनिक की आत्हत्या पश्चात जिस तरह से विपक्षी दल, कॉग्रेस, आम आदमी पार्टी के नेताओं ने अपने कत्र्तव्य को दिखाने तत्परता दिखाई, लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह किसी भी विपक्षी दल की स्वभाविक प्रक्रिया हो सकती है।। मगर जिस तरह से सत्ताधारी दल द्वारा बजाये उस सैनिक की समस्या समाधान करने या दोषियों पर कार्यवाही करने में राजधर्म का पालन किया जाना चाहिए था उसे न कर, सरकार के ही एक मंत्री को, इस बात में अधिक दिल चस्वी दिखी कि मृत सैनिक किस दल से जुड़ा था वह कितना कर्ज लेकर ग्राम प्रधान बना था और क्यों उसने आत्महत्या की और यह सब खोज हमारी सरकार की कोई ऐजेन्सी नहीं हमारी राष्ट्र भक्त मीडिया कर लायी। 

मगर यही राष्ट्र भक्त मीडिया अभी तक यह नहीं दिखा पाई, न ही उस अहम घटनाक्रम पर परिचर्चा करा पायी कि जिस प्रदेश में एक सैनिक ने आत्महत्या की उस प्रदेश के मु यमंत्री, उपमु यमंत्री ही नहीं, देश के सबसे बड़े दल कॉग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, सांसद सहित एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री, सांसद ही नहीं लोकसभा में विपक्षी दल के सचेतक को बीच रास्ते में रोक दिया जाता है वह भी बगैर कोई कारण बताये और गुन्डई स्टायल में पुलिस कर्मियों की टोली द्वारा देश के इन जि मेदार चुने हुये संवैधानिक पदो पर बैठे नेताओं को खूब धकिया कर खीच कर अपराधियों की तरह थानों में घन्टों बैठा दिया जाता है। 

ऐसे में सवाल उठता है खासकर उस पुलिस के व्यवहार पर जो सरेयाम सडक़ों पर हमारे माननीय चुने हुये जनप्रतिनिधियों और संवैधानिक पदो पर बैठे लोगों के साथ इस तरह का व्यवहार करती है जो अपराधियों के साथ होता है क्या उचित है? जो पुलिस सरेयाम अपराध करने वालो पर तो चुप्पी साध जाती है। और संवैधानिक शपथ ले संवैधानिक पदो पर बैठे प्रमुख लोगों को सरेयाम धकिया धमकाती है, इस तरह की घटनायें हम गरीबों के लिये ग भीर असहनीय ही नहीं विचलित कर देने वाली है। जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने हुये जनप्रतिनिधियों को सर्वोच्च सदन में बैठने सवाल करने नियम कानून बनाने नीति निधारण करने का अधिकार हमारा महान संविधान देता है उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमारे अपने ही पुलिस कर्मी सरेयाम हमारे चुने हुये माननीय जनप्रतिनिधियों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार करेगेंतो लोकतंत्र कैसे बचेगा। जिसके लिये हमारे पूर्वजों ने सामंत, सूतखोर, अत्याचारी, राजा-महाराजा, मुगल, सम्राट, अंग्रेजों का सामना करते हुये अपने खून की नदियां बहा दी हो, उस लोकतंत्र में उन्हीं की पीढिय़ों के साथ ऐसा व्यवहार लोकतंत्र में असहनीय और शर्मनाक ही है। 

इसलिये आप लोगों से गुजारिश है कि सही हालात देश के क्या है? हम 82 करोड़ से अधिक सस्ते राशन वालो को न सही कम से कम, उस देश भक्त मीडिया को ही बता दो, जिसे हम गरीब, बेहाल लोगो के बत्तर जीवन से अधिक आपके बेहतर सूट-बूट, उन्माद फैलाने वाले या हमारे दिल को ठेस पहुंचाने वाले उल-जुलूल व्यानों को दिखाने या फिर उन्माद पूर्ण माहौल बनाने की ज्यादा दिलचस्वी, जल्बाजी रहती है। अगर यह तरीका भी मुफीद न हो तो उस देश को ही बता दो जिसने आपको इस लायक बनाया है, हम गरीब आप से न तो कुछ कहेगें, न ही कोई शिकायत करेगें, क्योंकि हमारी तो अनादिकाल से नियति ही यहीं है। 
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