सच न सुनने की प्रवर्ति नासूर बन सकती है, फलते फूलते लोकतंत्र और राष्ट्र के लिये

व्ही.एस. भुल्ले। राष्ट्र हित और जनहित के नाम देश से आतंकवाद, कालाधन, भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने देश के प्रधानमंत्री के नेतृत्व हुई आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक से उत्पन्न स्थिति से निवटने पक्ष-विपक्ष ही नहीं सिस्टम सहित समुचे देश को मिलकर अपनी-अपनी सार्थक भूमिका निभाना और यह भूमिका निभाते रहना होगी। क्योंकि देश के प्रधानमंत्री ने स्थिति सामान्य करने के लिये देश से 50 दिन का समय सीधे जनता के बीच जाकर मांगा है। ऐसे में सभी को सुनने समझने और सार्थक सकारात्मक प्रवृत्ति को देश की खातिर प्रबल करने की जरुरत है। और इसमें प्रधानमंत्री के नेतृत्व में उनकी समुची सरकार के केन्द्रीय सिस्टम मु य विपक्षी दल कॉग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल अपनी-अपनी सोच, व्यवहार के चलते देश वासियों के अहम भूमिका निभाने की कोशिस कर रहे है। 

मगर इस सबके बावजूद विपक्ष की कुछ शिकायतें और स भावनायें भी है। आम जनता की परेशानियों और केन्द्र सरकार द्वारा लिये गये अचानक निर्णय को लेकर जिसका गैर जि मेदार मीडिया अभी भी बखूबी लाभ उठाने से नहीं चूक रहा। जिस मीडिया पर देश आंख बंद करके अन्धा विश्वास करता है वह इतना गैर जि मेदारना व्यवहार कैसे कर सकता है। मगर यह भी हमारे महान देश में महान जनता के बीच चल रहा है। 

पहले जब क ाी कालाधन अपराध-अपराधियों और भ्रष्टाचार को लेकर देश का आम नागरिक, उघोगपति या नौकरशाह शिकार होते थे। तो सवाल उठता था कि आखिर इन सब कार्यो में सनलिप्त राजनेताओं पर नकेल कौन कसेगा। जनता के बीच से जबरदस्त मांग भी समय वे समय होती थी कि आतंकवाद, कालाधन, भ्रष्टाचार देश ही नहीं देश के गांव गरीब को निगल रहा है। आने वाली पीढ़ी के भविष्य को चौपट कर एक अंधकारमय वातावरण देश में तैयार हो रहा है। जिसकी पुष्टि अपनी भाषा में देश के प्रधानमंत्री ने अपनी गाजीपुर की सभा में मौजूद जनसमूह से तालियां बजवाकर भी की। और उन्होंने देश में या देश के बाहर कालेधन के रुप में मौजूद देश के धन, आतंकवाद, भ्रष्टाचार पर इशारों-इशारों में अपनी मंशा भी साफ कर दी कि वह अब देश व देश के गांव गरीब की खातिर रुकने वाली नहीं। जिसकी कीमत उन्हें जो भी चुकाने पड़े वह अब पलटने वाले नहीं। 
वहीं जहां कॉग्रेस के भावी मुखिया ने एटी.एम की लाइन में लग कॉग्रेस के कार्यकत्र्ता ही नहीं देश वासियों को यह संदेश देने का प्रयास किया कि कुछ परेशानी हो सकती है। मगर राष्ट्र हित में यह परेशानी झेलना समुचे देश को जरुरी है। इतना ही नहीं उन्होंने अपने दल के कार्यकत्र्ताओं को भी निर्देश दिये कि वह परेशानी की इस घड़ी में जनता के साथ कंधे से कंधा मिलकार देश की जनता की मदद करें। वहीं अन्य क्षेत्रीय विपक्षी दल सरकार के निर्णय से खपा अपने-अपने राजनैतिक ऐजन्डों से इतर खुलेयाम सवाल दागने से नहीं चूक रहे। तो कुछ दल निर्णय की टाईमिंग और समय को लेकर विचलित दिखे। उनका कहना है कि देश की जनता को वेवजह बगैर पूर्ण तैयारी के निर्णय थौप परेशान किया जा रहा है। 

 मगर इस सबसे इतर जहां सरकार को तत्काल पलटवार करने बजाये सुनने की आदत डालना होगी। वहीं विपक्ष को भी वेबजह चिल्लाने की जगह सकारात्मक सहयोग के साथ एक ताकतवर विपक्ष की भूमिका गैर जि मेदार मीडिया से बचकर निभानी होगी। क्योंकि न तो आतंकवाद, कालाधन, भ्रष्टाचार का मर्ज छोटा है और न ही इसका इलाज इतना आसान। 

मगर राष्ट्र के लिये यह स त जरुरी है गलतियां सभी से हो सकती है मगर सही दिशा और सुधार की उ मीद चुनी हुई सरकार हमारे संवैधानिक सिस्टम और चुने हुये विपक्ष से अवश्य की जा सकती है। बैसे भी केन्द्र सरकार और राष्ट्रीय प्रमुख विपक्षी दल कॉग्रेस एक जि मेदार भूमिका में है। और एक सशक्त विपक्षी दल होने के नाते अन्य क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने राजनैतिक नफानुकसान को सुरक्षित रख अपने कत्र्तव्य निर्वहन में जुटे है। मगर सब से बढक़र सबसे बड़ा त्याग देश के गांव गरीब ल बी-ल बी लाइनों में लग देश के लिये कर रहे है, इसे देश और इतिहास कभी नहीं भुला पायेगा। 
सरकार को चाहिए कि वह जल्द से जल्द ऐसा सिस्टम जनता के बीच लाये जिससे व्यवहारिक जरुरतें पूरी और लोगों का 
जीवन चक्कर आर्थिक स्तर पर न चरमरायें। वर्तमान जो व्यवहारिक परेशानियां और संकाये आम जनता या विपक्ष के बीच बलबति हो रही है। उनका समाधान पूरी सजगकता के साथ सिस्टम और सरकार कर पाये। 
सरकार को चाहिए कि वह नोट बदलने के काउन्टर अलग और बैंकों के सामान्य कामकाज को अलग रखने की व्यवस्था करें। जिससे होने वाली भीड़ से बैंकिंग से जुड़े लोग प्रभावित न हो और जो लोग नोट बदलना चाहते है वह भी ल बी-ल बी कतारों में न लगे। यह तभी स भव है जब इस व्यवस्था में अतिरिक्त संसाधन चुनावों की तरह झोंके जाये। 
  सरकार को चाहिए कि वह तत्काल नये रिण नियम बैंकों के लिये बनाये। जिससे बैंकों द्वारा दिये जाने वाले रिणों की चवन्नी भी 8 न वबर 2016 के बाद डूब पाये और न ही कोई बैंक के पैसो को खा पाये। क्योंकि बैंको में जमा होने वाला धन देश का ही होता है। 
सरकार को चाहिए कि वह तत्काल यह सुनिश्चित कर लें, कि 8 नव बर 2016 के बाद जमा राशि से नये रिण नियम आने तक एक पैसा भी किसी को रिण के रुप में न दें। और एक शासकीय सार्वजनिक उपक्रम संगठन की स्थापना करें जिससे डूबते उघोग, क पनियों को समय रहते तत्काल राज साथ कर बैंक या सरकार अपने अधिपत्य ले, पुन: उनका संचालन या ब्रिक्री सुनिश्चित कर सके। जिससे बैंक और देश का पैसा कोई खाकर न भाग सके। 
सरकार को चाहिए कि वह छोटे-छोटे मुद्रा बैंकों में डिस्टीक मजिस्टे्रटों की मदद से स्थानीय स्तर नगरपालिका वार्ड, ग्राम पंचायतों के मौजूद अमले को सक्रिय कर, ल बी-ल बी लाइनों और देश वासियों को हो रही परेशानियों से निजात दिला सकती है। कुछ दिन के लिये सरकारे चाहे तो रुपये बदलने के लिये डिस्टीक मजिस्ट्रेटों के मदद से हर विभाग की लेखा शाखा को सक्रिय कर पुरानी पद्धति के आधार पर जबावदेही फिक्स कर बैंको की भीड़ कम कर करोड़ों नागरिकों को राहत दे सकती है। मगर यह रिस्की भी हो सकता है। लोग इसका राजनैतिक उपयोग अपने हित में भी कर सकते है। मगर जिस तरह चुनाव में इन ऐजेन्सियों के साथ निष्पक्ष चुनाव कराने समन्वय रहता है, बैसा किया जा सकता है।
 और अन्तिम आग्रह सत्ता पक्ष के दल से हो सकता है कि वह देश को सब कुछ न्यौछावर कर समर्पित प्रधानमंत्री की गरीमा और उनके स मान का याल करते हुये कम से कम उनसे ऐसा कोई राजनैतिक व्यान न दिलवाये। जो उनकी गरीमा को ठेस पहुंचाने वाला हो। क्योंकि यह सत्ताधारी दल का सौभाग्य है कि उसने कई पुरुष मौजूद है। जो समय वेसमय राजनैतिक व्यान ऑन बेहाव सरकार के कार्यो के आधार पर दे सकते है। और विपक्ष को भी चाहिए कि राजनैतिक दलो में प्रतिस्पर्धा हो सकती है। हल्के पूरे व्यान भी एक दूसरे के खिलाफ हो सकते है। मगर कम से कम देश के एक ऐसे प्रधानमंत्री की गरिमा का तो याल रखे। जिसके पास गवाने के अलावा पाने अब कुछ भी नहीं। तभी हम एक महान राष्ट्र और महान देश बन पायेगें।  

SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment