प्रधानमंत्री की जबावदेही देश, न कि दल, सड़े सिस्टम से सुधार की उम्मीद

व्हीएस भुल्ले। इस महान देश का गांव गरीब ही नहीं हमारी माता बहनों भी जानती है कि परिवार कैसे चलता है, फिर यह तो हमारे द्वारा चुनी हुई एक स...

व्हीएस भुल्ले। इस महान देश का गांव गरीब ही नहीं हमारी माता बहनों भी जानती है कि परिवार कैसे चलता है, फिर यह तो हमारे द्वारा चुनी हुई एक संवैधानिक सरकार है जिसके मुखिया प्रधानमंत्री है। जिन्हें देश की जनता ने अपना बहुमूल्य वोट देकर चुना है। जिन्होंने लोकतंत्र के सर्वोच्च सदन में प्रथमबार प्रवेश पूर्व स्वयं सदन की सीढिय़ों पर सबसे पहले मत्था टेक राष्ट्र सेवा और जनसेवा की शपथ ली है। फिर उनके किसी निर्णय पर आविश्वास कैसा। जबकि उन्होंने स्वयं देश की जनता के सामने आकर मंच से नोटबंदी से उत्पन्न स्थिति से एवं कालाधन, आतंकवाद, भ्रष्टाचार से आम गरीब को मुक्ति दिलाने मात्र 50 दिन का समय मांगा है। 

मगर हमारे द्वारा चुने हुये जनप्रतिनिध जो लगभग 200 की तादाद में इकट्ठा हो प्रधानमंत्री से सदन में उपस्थित रह जबाव देने पर अड़े है, और सदन को बाधित भी कर रहे है। अगर प्रधानमंत्री का निर्णय राष्ट्र या जनहित में है और उन्होंने सभी से खासकर देश की जनता से 50 दिन का समय चाहा है और यह वादा भी उन्होंने गाजीपुर की सभा में सार्वजनिक मंच से भी किया है कि अगर कुछ गलत हुआ तो देश की जनता उन्हें जो भी सजा देगी वह सहर्ष तैयार है। अगर ऐसे में देश का समुचा विपक्ष एक होकर सदन के अन्दर जबावदेही और सरकार देश के प्रति अपनी निष्ठा दिखाना चाहती है वह भी बगैर किसी राजनैतिक दुराभाव के तो हर्ज ही क्या? लोकतंत्र के मंदिर और देश के सर्वोच्च सदन में राष्ट्र और राष्ट्र की जनता की खातिर स्वच्छ मन से सवाल-जबाव अवश्य होना चाहिए यहीं पक्ष-विपक्ष का आज के माहौल में सबसे बड़ा राजधर्म है। 

बैसे भी कौन नहीं जानता कि हमारे देश की बैंकिंग और डाक व्यवस्था की व्यवहारिक स्थिति क्या है। जिनके सहारे देश के प्रधानमंत्री ने देश की खातिर एक आत्यिक और भावुक अपीले कर वर्षो से समाज में अपनी गहरी पैठ जमा चुका आतंकवाद, कालाधन, भ्रष्टाचार को देश से उकाड़ फैकने का बीड़ा उठा लिया है और यह भी सच है उस सड़ चुके सिस्टम के सहारे जिसकी कत्र्तव्यनिष्ठा सडक़ों पर अपने देश की खातिर अपने नौनिहालों के बेहतर भविष्य के खातिर लाइन में लगे मरते, ल_ों से कुटते लोगों के रुप में सामने है। 

मगर यह भी सच है कि अगर सुधार करना है तो कदम भी सोच समझ कर पूरी तैयारी के साथ उठाने पड़ेंगें। और कई ऐसे अप्रत्याशित निर्णय भी लेने पड़ेगें, जो भले ही कड़े हो। कौन नहीं जानता कि हमारी बैकिंग व्यवस्था में जनता का लाखों करोड़ रुपया विभिन्न कारणों से डकारने वाले इसी देश के वह धनाडय, संस्थान और नागरिक ही है, जो व्यापार उघोग के नाम टेक्स चेारी और बैंकों में जमा जनता व देश के धन को बैखोफ रुप से आज तक लूटते रहे है। क्योंकि गरीब के लिये बैंको के कानून स त है और करोड़ोंं अरबों का रिण डकारने वालो के लिये आज भी बैंकों के कानून काफी कमजोर है। कौन नहीं जानता कि जिस डाक विभाग के कई मक्कार कर्मचारी जनता के आधार कार्ड जैसे अहम दस्तावेजों को लोगों तक पहुंचाने के बजाये या तो आग के हवाले कर देते है उदहारण जिला श्योपुर म.प्र. या नदी में बहा देते है, जिला शिवपुरी म.प्र.।

जिन क्षेत्रों में लोग धन की खातिर नैतिक अनैतिक कार्य यहां तक कि मानव बिक्री, तस्करी तक करने पर मजबूर हो। वहां 4000-4500 या 2000 तक के नोट बदलने आतंकवाद, कालाधन, भ्रष्टाचार से जुड़े लोग उनका उपयोग नहीं करेगें। जिसे नकारा नहीं जा सकता। 

कौन नहीं जानता कि वर्तमान में मौजूद कई बैंको, डाकघरों में बारह महिने ही लोगों की ल बी-ल बी लाइने लगी रहती है। कौन नहीं जानता भ्रष्टाचारी, कालाधन धारियों का स्थान बैंकों की लाइनों में नहीं बल्कि बैंक मैनेजरों के एसी चे बरों में होता है। कई जगह तो मैनेजर स्वयं चलकर इन भ्रष्टाचारियों, कालाधनधारियों के आगे डिपोजिट कराने खाता खुलवाने गिड़गिड़ाते है और जिन फोरमल्टियों के लिये इनके कर्मचारी गांव गरीब को सारा दिन दुदकारते रहते है अपना काम कराने उसकी चप्पले तक चक्कर लगाते-लगाते घिसवा लेते है। वे ही बैंकों के कर्मचारी, मैनेजर स्वयं उन भ्रष्ट, कालाधन धारी, भ्रष्टाचारियों के यहां जाकर फॉरमल्टी पूरी कराते है। 

     कौन नहीं जानता वर्षो से बैंकों में आने वाले नोटो की गड्डियों पर पहला अधिकार घोषित अघोषित तौर पर इन्हीं कालाधनधारी, भ्रष्टाचारियों का ही रहा है। गांव गरीब तो नये नोट हासिल करने हमेशा से ही किसी को कमीशन, किसी की सिफारिस या बैंक कर्मचारियों से गिड़गिड़ा कर ही हासिल करता रहा है। 

    अगर इतनी सारी व्यवहारिक जानकारी सरकार पर नहीं थी तो यह देश का र्दुभाग्य है अगर यह जानकारी सरकार को थी तो फिर भी इतने बड़े निर्णय में मात्र बैंक, डाकघरों के सहयोग से सफलता, सुधार का स्वांग सिर्फ और सिर्फ नोटंकी भर ही है। जैसा कि एक जुट विपक्ष निर्णय का समर्थन कर आरोप लगा रहा है। 

   अगर सरकार चाहती तो 10 दिन बाद भी अचानक, मगर जरुरी निर्णय की सार्थकता और जनता के कष्ट तथा धैर्य को देखते हुये तत्काल यह कदम भी उठा सकती थी कि 50 नहीं 90 दिनों के लिये देश में मौजूद समुचे जिलों के कलेक्टर, एसपी की बैठक बुला जिला तेहसील, पंचायत, वार्ड स्तर पर मौजूद अमले से जैसे शिक्षक, पुलिस गार्ड, सैनिक, पंचायत सचिव, रेाजगार, सहायक, सोसायटी सचिव, राशन वितरक, आशा कार्यकत्र्ता, आंगनबाड़ी कार्यकत्र्ता और गांव चौकीदारों समिति गठित कर, तेहसील विकासखण्ड, पंचायत स्तर पर मात्र 3 माह के लिये मुद्रा बैंक खोल लोगों तक नये या प्रचलन में मौजूद पुराने नोट पहुंचाने की व्यवस्था कर सकती थी। अगर यह व्यवस्था पंचायत स्तर पर स भव नहीं थी। तो ब्लॉक स्तर पर भी की जा सकती थी। जहां तक पुराने नोट बदलने की व्यवस्था का सवाल है तो निर्धारित समय सीमा 4500 तक के लिये जो फार्म और परिचय फ्रूप के साथ फार्म के पीछे बदले जाने वाले नोटों के न बर और विवरण बैंक स्लिप के अनुसार नोट बदलने वाले से भरवाया जा सकता था जो नकली नोट पहचानने वाली मशीनों की कमी को पूरा कर सकती थी। और इन्हीं पर्चियों के आधार पर नोट बदलने वालों का डेटा तैयार कर जहां भी नकली नोट पकडऩे वाली मशीन होती वहां बार-बार नोट तो बदले ही नहीं जाते क्योंकि वार्ड, पंचायत का अमला सभी को जानता है बल्कि नकली नोट जमा करने वालों की भी पु ता पहचान होती। इसके अलावा सरकार जल्द से जल्द अधिक से अधिक माइक्रो एटीएम, नकली नोट पहचान करने वाली मशीनों की व्यवस्था कर लेती। जिससे देश में गरीबों के बीच केाहराम नहीं मचता। 
     ऐसे में प्रधानमंत्री को चाहिए कि वह प्राकृतिक न्याय सिद्धान्त का पालन कर देश में उपजे वर्तमान हालातों के मद्देनजर देश व देश के 130 करोड़ देश वासियों की खातिर लिये गये कड़े निर्णय पर अडिग रह, मुद्रा स्तर पर सारे संसाधन झौंक लोगों तक ही नहीं खासकर गांव गरीब तक 8 नव बर 2016 से पूर्व जमा धन के विरुद्ध, नये नोट आवश्यकता अनुसार वैधानिक कारण सहित मुहैया कराने की व्यवस्था जुटाये जिससे रोजमर्रा की जरुरतें प्रभावित न हो।   क्योंकि प्रधानमंत्री किसी दल, संगठन, विपक्षी दलों के अकेले मात्र नहीं होते समुचे देश के मु िाया होते है। जिनकी एक लोकतांत्रिक, संवैधानिक व्यवस्था के तहत वैधानिक कुछ अहम जबावदेही होती है। मगर अपने राजधर्म की खातिर आपका पहला सर्वोच्च कत्र्तव्य देश व देश की 130 करोड़ जनता के प्रति है। जिसने आपको वोट देकर संवैधानिक तौर पर 5 वर्ष तक की सेवा करने का मौका दिया है। 
    प्रधानमंत्री जी यह प्रकृति की रक्षा और सत्य के लिये छेड़ा गया राष्ट्र युद्ध है जिसमें आपके साथ भी आपके मित्र-शत्रु हो सकते और आपके सामने मौजूद दुश्मनों के रुप में आपके मित्र-शत्रु हो सकते है।  

सच कहे तो आपको यह चक्रव्यूह अगर तोडऩा है देश व देश की गरीब आवाम की खातिर तो आपकों सजग रह   निस्कंटक भाव से अपनी यात्रा जारी रखना चाहिए। तभी वर्षो से लुटते पिटते गांव गरीब व इस महान राष्ट्र को भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंकवाद ही नहीं कई समस्याओं से बचाया जा सकता है। मगर भाव बासुदेव, कुटु वकम का होना जरुरी है और ये तभी स भव है जब विपक्ष को स मान के साथ लेकर महान राष्ट्र के निर्माण की सार्थक शुरुआत हो। यहीं लोकतंत्र का तकाजा है क्योंकि देश की 130 करोड़ आवाम ने सत्ता का सिरमोर आपको बनाया है न कि समुचे विपक्ष को। वह जायज-नजायज विरोध कर अपना कत्र्तव्य निभा रही है तो आपकों भी लोकतंात्रिक पर पराओं का पालन कर राष्ट्र की खातिर अपना कत्र्तव्य निभा देश को बता देना चाहिए कि राष्ट्र आपके लिये है और आप राष्ट्र के लिये। तभी देश का गांव गरीब एक शक्तिशाली, खुशहाल, समृद्ध, राष्ट्र की कल्पना कर सकता है।  

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Village Times: प्रधानमंत्री की जबावदेही देश, न कि दल, सड़े सिस्टम से सुधार की उम्मीद
प्रधानमंत्री की जबावदेही देश, न कि दल, सड़े सिस्टम से सुधार की उम्मीद
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