परिणाम से पहले कोहराम, निर्णय क्रान्तिकारी मगर सिद्धान्त: राष्ट्र व जनहित में

व्ही.एस.भुल्ले। आगरा की परिवर्तन यात्रा के मंच से देश में घठित लोमहर्षक इन्दौर, पटना रेल र्दुघटना से व्यतीत भारत के प्रधानमंत्री के भाषाणों का लब्बों लुबाब लगभग यहीं था कि नोटबंदी को लेकर उनका निर्णय अडिग है। और उन्होंने राष्ट्र व जनहित में यह दोहराया भी कि उनकी सरकार लकीर की फकीर नहीं, जनहित व राष्ट्र हित में जो भी निर्णय हो सकते है। उन्हें सरकार तत्काल ले रही है और आगे भी यह क्रम जारी रहना वाला है। उन्होंने पुरजोर दोहराया कि 8 नव बर 2016 को ही उन्होंने देश की जनता से कह दिया था कि देश की महान जनता को कुछ परेशानी तो होगी ही। क्योंकि कालाधन, भ्रष्टाचार, आतंकवाद के समूल नाश करने नोटबंदी का निर्णय जरुरी है। और 50 दिन का समय जो उन्होंने देश की जनता से मांगा था जनता ने उस पर सहमति भी व्यक्त की थी मगर जिन्होंने चिटफंड क पनी या विभिन्न माध्ययमों से जनता को लूट कालाधन बड़ी मात्रा में बनाया था उन्हें सरकार नहीं छोड़ेगी।

 मगर जिस तरह से भारत सरकार के निर्णय में राष्ट्र व राष्ट्र की जनता के हित की खातिर विपक्षी दल कॉग्रेस के भावी मुखिया ने एटीएम पर जाकर लाइन में लग 4000 हजार रुपये अपने खाते से निकाल देश व देश की जनता सहित आम कॉग्रेसी को संदेश दें, अपने कार्यकत्र्ताओं को लाइन में लगे परेशान लोगों की मदद करने का आव्हन किया। उसका परिणाम कि कॉग्रेस कार्यकत्र्ता देश के नागरिकों की सेवा में जुट गये। और चाय पानी सहित फार्म भरने की जबावदेही निभाते दिखे। और दूसरे मोर्चे पर जि मेदार विपक्ष के नाते कॉग्रेस के भावी मु िाया ने वह सवाल भी, सरकार की नियत पर ाड़े किये, जो लाजमी थे।   

मगर देश के विभिन्न प्रदेशों में सत्तारुढ़ राजनैतिक दलों ने जिस तरह से भारत सरकार के निर्णय पर सवाल खड़े कर, विरोध प्रदर्शन का रास्ता अखतियार किया है। और जिस तरह से इन दलो द्वारा केन्द्र में सत्तारुढ़ सरकार के खिलाफ प्रमाणों सहित सरकार की नियत पर सवाल खड़ा किया जा रहा है हो सकता है, उनकी या सत्तारुढ़ दल की इस महान लोकतंत्र में राजनैतिक मजबूरी हो। मगर यह बात भी अपनी जगह सही है, कि हमारे महान देश में अधिकांश लेन-देन नगद में होता है। इस व्यवस्था से अछूते वह विकासशील या विकसित देश भी नहीं। जिनकी संस्कृति, स यता को महान समझ चंद लाख लोग खुशहाल जीवन और विकसित देश कहलाने के लिये सर्वोच्च सत्य समझते है। मगर यह स पूर्ण सत्य नहीं, खासकर उस भू-भाग पर बसे उस राष्ट्र और उस महान मातृ भूमि पर जन्म लेने वाले नागरिकों के लिये, क्योंकि भारत महान था और है तथा रहेगा। यह वह महान भू-भाग है जहां कुदरत ने दिल खोलकर प्रकृति के स पूर्ण खजाना उड़ेल ठंड, गर्मी, बरसात जैसे मौसमों की सौगात अपने नौनिहालों को दी है और इन धरती पुत्रों को किसी भी मौसम में लोहा लेने का आर्शीवाद भी दे रखा है। 

 भारत वह महान भूमि है जिसका साढ़े सात हजार वर्षो का अपना मर्यादित, न्याय प्रिय, समता मूलक, बुद्धि पूर्ण, त्याग, तपस्या, भाईचारे सहित मर्यादित जीवन जीने का एक इतिहास रहा है। जिसका पीछा करते विज्ञान, विकसित देश या विकासशील देश अभी तक 25 फीसदी भी रास्ता तय नहीं कर पाये है। 
 ऐसे में जब उस महान मातृ भूमि की उन महान सन्तानों की रगो में कुर्बानी त्याग, तपस्या, प्रेम, भाईचारा कत्र्तव्य निष्ठा खून बनकर दौड़ती हो। अगर उनके हित मेेंं उस भू-भाग पर उनके लिये कुछ ठीक हो रहा है तो उस राष्ट्र के मुखिया द्वारा जनहित व राष्ट्रहित में लिये गये निर्णय से असहमत लोगों को कुछ धैर्य अवश्य रखना चाहिए। 

अगर बात व्यवस्था की है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का भी तकाजा है कि नागरिकों और राष्ट्र के हित सर्वोपरि होना चाहिए जिसमें किसी का कोई भी व्यावदान अस्वीकार हो। आज जब सत्ता और प्रमुख विपक्षी दल आमने-सामने है और अन्य क्षेत्रीय दल प्रखर विरोध पर उतारु है। ऐसे में इस कड़े निर्णय पर सरकार को भी अगर स भव हो तो पूर्ण पारदर्शाता के साथ प्रमुख विपक्षी दल को विश्वास में लेकर क्षेत्रीय दलो की संकायो को भी दूर करना चाहिए। साथ ही जो कमियां समय वेसमय दिखें, उन्हें भी सार्वजनिक रुप से स्वीकार कर उनका हल खोज तत्काल समाधान करना चाहिए। तभी हम महान लोकतंत्र के बीच स्वराज और खुशहाल भारत की कल्पना कर सकते है। जय स्वराज..........?
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