गांव गरीब की ही कुर्बानी क्यों ?

व्ही.एस. भुल्ले | बड़ी शर्म आती है जब लोग हम गरीबों को स बोधित कर, दया सहानुभूति का पात्र बताते है। मगर इस सबके इतर सत्य यहीं है कि गुलामी के 1200 वर्ष बीत जाने के बावजूद भी इस महान मातृ भूमि का आम गरीब लाख कुर्बानियों के बाद न थका है, न रुका है और न ही मिटा है। बल्कि एक चुट्टान की तरह हर समस्या के निदान हेतु कुर्बानी देने के बावजूद भी अटल खड़ा है।

इस महान मातृ भूमि के गांव गरीब का एक सच यह भी है कि उसने विगत सेकड़ों वर्षो में कई महान राष्ट्र भक्त नेतृत्वों के नेतृत्व में अपनी मातृ भूमि अपने मान-स मान, स्वाभिमान की रक्षा के लिये अनवरत संघर्ष कर एक महान मातृ भूमि के महान नागरिक होने का परिचय दिया है। फिर भले ही उसका यह संघर्ष अदनंगे बदन भूखे पेट आभावों के बीच रहा हो, या फिर तोफ-बन्दूक संगीनों के सामने निहत्थे लडऩे का रहा हो। मगर इस महान देश के महान नागरिकों ने दुश्मनों से सामना करने में कभी अपने ग्रामीण जीवन के आभाव और गरीबों को आड़े नहीं आने दिया और न ही किसी से कोई शिकायत की और न ही यह अ िामान जताया कि अपनी मातृ भूमि की रक्षा के लिये सेकड़ों वर्षो से पीढ़ी दर पीढ़ी उनका या उनके पूर्वजों का क्या योगदान रहा। क्योंकि हमेशा से गरीब अपनी जिन्दगी अपने हाथों पर जिया है और कुदरत से निर्धारित समय के मुताविक अपनी मौत मरा है। 
मगर जब लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का मालिक आम गरीब है जो अपने वोट से समुची व्यवस्था संचालित करने एक संवैधानिक सरकार को चुनता है और आज भी औपचारिक-अनौपचारिक रुप से अपना पेट काट समुची व्यवस्था को संचालित करने धन देता है। कि कम से कम अब तो उसका जीवन सुरक्षित, खुशहाल, स पन्न हो सकेगा। मगर जब उसी के द्वारा स्थापित व्यवस्था के बीच से बार-बार इस तरह के आव्हन और आवाजे आने लगती है, कि देश की खातिर आपको तन-मन, धन से व्यवस्था की मदद करने कुछ दिन का कष्ट झेलना है, तो ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है, कि आखिर गांव गरीबों की कुर्बानी और कब तक?

आज एक बार फिर से सत्ता के गलियारों से और एक मजबूत नेतृत्व का आव्हन हुआ कि 500 और 1000 हजार के नोट प्रचलन से बन्द किये जा रहे है। क्योंकि भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंकवाद से बचाने गांव गरीब किसान की खातिर यह कदम जरुरी है तो देश सहर्ष तैयार है, देश का गांव गरीब कष्ट झेलने तैयार है। मगर आव्हन करने वाली व्यवस्था का भी अपना कत्र्तव्य है कि वह इस गांव गरीब की इस कुर्बानी को अब ााली न जाने दें। और ये कदम जरुरी उठा ले जिससे भविष्य के लिये जब भी कभी ऐसी जरुरत व्यवस्था को देश के गांव गरीब से आन पढ़े तो गांव गरीब की कुर्बानी का आकलन न करते हुये 1200 वर्षो की कुर्बानी का इतिहास पढ़ उसे ही प्रमाण मान ले। मगर अपने कत्र्तव्यों के मद्देनजर पहला कदम व्यापक प्रचार-प्रसार से पहले व्यवस्थाओं का पूर्व अनुमान और अनुमान आधारित व्यवस्थायें चाकचौबन्ध कर ली जाये। फिर व्यापाक प्रचार-प्रसार के साथ सारे अमले को चुनावों की तरह व्यवस्था सुधार होने तक झौंक दिया जाये। जिससे आम गांव गरीब जो एक वोट और टेक्स के रुप में कुछ नोट देकर सरकार और उसके सरकारी तंत्र को पोषित करता है उसे आभास ही नहीं महसूस भी हो सके। कि उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था ईमानदारी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी मातृ भूमि के लिये संघर्षरत है। 

दूसरा कदम सरकारों और व्यवस्था को वर्तमान 500-1000 हजार नोट के बन्द करने के साथ यह भी ले लेना चाहिए कि 10 करोड़ से अधिक के रिण लेने वाले किसी भी संस्था उघोग को रिण प्रदान करने वाली संस्था का एक सदस्य देख-रेख कर्ता के रुप में रहना चाहिए। जो समय-समय पर संस्था और सरकार को यह सूचना देता रहे कि रिण लेने वाली संस्था की आर्थिक स्थिति कैसी है। और रिण देने वाली संस्था को बगैर किसी कानूनी दांव पेच के सीधा अधिकार होना चाहिए कि वह उसका अधिकग्रण कर सरकार के सार्वजनिक उपक्रम पूल के हेन्ड ऑवर रिण लेने वाले संस्था को कर दे। इस बीच रिण देने वाली संस्था को यह अधिकार भी होने चाहिए कि रिण लेने वाली संस्था अन्य किसी संस्थान से रिण लेने से पूर्व स्वीकृति ले, या बाजार में अपना शेयर पत्र जारी करने से पूर्व अनुमति ले। क्योंकि बैंको में जमा धन देश के गांव गरीब का ही होता है। इसीलिये उसे हक भी है कि वह उसके द्वारा चुनी हुई सरकार और उसके द्वारा वेतन भत्तों से चलने वाले तंत्र से इस तरह की कानून की अपेक्षा र ो।

दूसरा कानून सरकार यह भी बनाये कि जितने भी सार्वजनिक प्रायवेट बैंक प्रतिवर्ष लेन-देन रखे। रिण एवं जमा का पूरी पारदर्शिता के साथ हर वर्ष मीडिया विभिन्न माध्यमों से देश के सामने रखे। अगर वर्तमान सरकार इस निर्णय के साथ ये दो काम भी कर ले, तो देश के आम गांव गरीब को बड़ी राहत एवं राष्ट्र हित में वह बड़ा काम होगा जिसकी अपेक्षा देश का गांव गरीब अपने द्वारा स्थापित व्यवस्था से रखता है। 
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