क्या लोकतंत्र की हत्या पर उतारु है, दल ? जनाकांक्षा बनी, राजनीति का अखाड़ा

व्ही.एस.भुल्ले। जब कोई राष्ट्र या उस राष्ट्र के नागरिक अपने कत्र्तव्य निर्वहन पश्चात भी मौजूद व्यवस्था के सरंक्षण में सुरक्षित, खुशहाल न रहे, तो ऐसी व्यवस्था पर सवाल होना लाजमी है। मगर आज हमें गर्व कम और शर्म ज्यादा मेहसूस हो रही है। कि 130 करोड़ के देश में चन्द लाख महात्वकांक्षी लोगों की टोली हमें खून के आंसू रुलाने पर आमादा है। क्योंकि इनके पास सत्ता, बल, धन और पर्याप्त संसाधन है। और आम गरीब आज भी आभावों का जीवन जी अध नंगे पेट रह, इस उ मीद में जिन्दा रह, विगत 70 वर्षो से अपना वोट और टेक्स के रुप में नोट दें, अपना खून पसीना एक कर इसलिये इन्हें ढो रहा है कि आखिर उन्हेंं कभी तो इस महान लोकतंत्र में स्वराज की अनुभूति होगी। 

मगर साधन स पन्न महात्वकांक्षियों की टोलियां, लोकतंत्र के नाम अपनी-अपनी महात्वकांक्षा पूर्ति हेतु प्रकृति के नियम कानून एवं स्थापित मूल्य सिद्धान्तों को रौंध, कुचल देना चाहती है। जो देश के भोले भाले लोगों के बीच अपनी चालाकी से स यता में मौजूद विधा की चोरी कर स्वयं को महिमा मंडित करने में माहिर ये मण्डलियां नई-नई विधाओं का उपयोग कर स्वयं के स्वार्थो के चलते, सत्य को देश के सामने ही नहीं आने देना चाहती। जिसकी छत्र-छाया में मानव खुशहाल जीवन व्यतीत करता है, जिसके तेज से समुचा प्राकृतिक वातावरण सुन्दर और सुखमय होता है। 

मगर देश में जब से 500-1000 की नोटबंदी क्या हुई है इन महात्वकांक्षी, स्वार्थियों की मण्डलियों ने कोहराम मचा, लोगों का जीवन हराम कर रखा है। अब इस नोट बंदी के पीछे लोकतंत्र में बहुमत प्राप्त कर चुनी हुई, सरकार का मतव्य जो भी रहा हो। मगर जिस तरह सत्ता धारी दल, या जनता के वोट से चुने, विपक्षी दल, विगत दिनों से ऐसी बहस, आचरण करने में मशगूल है कि देश का महान नागरिक आज भी उन्हें मूर्ख ही नजर आता है। और वह अपने भले बुरे या राष्ट्र में मौजूद व्यवस्था के बारे में कुछ नहीं समझता है। 

जबकि हकीकत यह है कि देश का बच्चा-बच्चा जागरुक हो, आज यह जानने लगा है कि दल अब जनता की सेवा कम, सत्ता हासिल करने, किस तरह जनसेवा के नाम स्वयं सेवा में जुटे रहते है। देश का हर नागरिक यह भी जानता है कि जब भी उनके प्रधानमंत्री कोई अहम निर्णय देश या देश के गांव गरीब के हित में लेते है तो वह देश की जनता से ही सीधा संवाद करते है, फिर हाय-तौबा क्यों। 
आज जब देश के अधिकांश नागरिक यह समझते है कि नोटबंदी के फैसले के पीछे कारण क्या है। यहीं समय नोटबंदी का क्यों चुना गया और अचानक 500-1000 की नोटबंदी क्यों हुई? इस पर आज कोई सच बोलना नहीं चाहता। इस पर कोई सदन में चर्चा या बहस नहीं करना चाहता कि 8 नव बर 2016 से पहले बैंकों में जमा धन का जो हुआ हो, मगर अब उस बारे में न तो देश ही जानना चाहता है और न ही देश का जागरुक नागरिक। देश की सरकार और देश काकानून स्वयं सक्षम है बैंक में जमा जनधन के लुटेरों से निवटने के लिये।

मगर 8 नव बर 2016 के पश्वात बैंकों में जमा होने वाले धन की तो सुरक्षा नया कानून बना चाक चौबन्द कर ली जाये। जिससे आने वाले भविष्य में कम से कम अब बैंको की होने वाली आय और व्यय को तो इतना पारदर्शी बनाया जा सकता है कि बैंकों में जमा गरीबों के धन को रिण के नाम अब कोई न लूट सके। 
मगर दुर्भाग्य कि इस सबसे इतर स्वयं की महात्वकांक्षा पूर्ति में जुटी महात्वकांक्षी कुछ मण्डलियां सामने तो कुछ गुप्त रुप से एक चुनी हुई सरकार या व्यवस्था के निर्णय पर भ्रम फैला देश में कोहराम मचाये हुये है। जो न ही देश हित और न ही देश नागरिकों के हित में है। जबकि होना यह चाहिए था कि कोई भी दल या महात्वकांक्षी मण्डलियां देश में ल बे अन्तराल के बाद हुये जनहित और राष्ट्र हित के इस अहम संवेदनशील निर्णय की न तो मार्केटिंग कर, राजनैतिक लाभ उठा पाये, और न ही इस निर्णय को विरोध कर कोई अपनी राजनीति चमका पाये। मगर आज जब जनभावना, जनाकांक्षाओं से कट चुके दल या महात्वकांक्षी मण्डलियां मुद्दा विहीन हो, अपने-अपने अस्तित्व को बचाने संघर्षरत है। औरइस उ मीद में बेसर पैर का विरोध कर, सदन को बाधित कर, सडक़ों पर कोहराम मचाये हुये है, कि वह देश में हुये अहम निर्णय पर भ्रम फैला। शायद अपनी मौजूदगी सुनिश्चित रख पाये, जो अब मिटने के कागार पर हो सकते है। इतना ही नहीं हो सकता है कि उन्हें यह मुगालता भी हो, कि देश की जनता को आज भी कोई समझ नहीं। जबकि जनता ऐसे दल, महात्वकांक्षी मण्डलियों की नोटंकियों से अब अच्छी खासी बाकिब हो चुकी है। 

मगर एक सत्य यह भी है कि सरकार व देश का प्रधानमंत्री, किसी दल या महात्वकांक्षी मण्डली का मुखिया भर नहीं होता, बल्कि वह समुचे देश का मुखिया होता है। अगर देश के प्रधानमंत्री ने 130 करोड़ के मुखिया होने के नाते राष्ट्र हित गांव गरीब के हित में कोई निर्णय लिया है, तो फिर उन्हें ाी अब बगैर दल, बल, विरोध की परवाह किये बगैर अपने निर्णय पर अडिग रहना चाहिए फिर कीमत जो भी हो। भारत ही नहीं समुचे विश्व में यह संदेश जाना चाहिए कि यह वहीं महान भारत भूमि है जिसने इतिहास को बड़े-बड़े महान लोगों के नाम दिये है। 
कोशिस हो कि 130 करोड़ देश वासियों का विश्वास और आम गांव गरीब की कुर्बानी अब बेकार न जाये। क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री देश के ऐसे तीसरे प्रधानमंत्री है जिसे देश की करोड़ों करोड़ जनता ने दिल से उनके निर्णय को लाख कष्टों के बावजूद खुला समर्थन दिया है। 500-1000 के नोटों की बंदी देश के महान लोकतंत्र में स्वराज प्राप्ति का प्रसब नहीं अभी तो पीढ़ा मात्र है जिसका जन्म होना स्वभाविक है। जिस पर अभी से कोहराम मचा हुआ है। मगर देश के लोग मानते है कि जिस तरह हमारा देश महान है उसी तरह इस देश का हर नागरिक बच्चा-बच्चा महान है जो देश की खातिर देश के लिये प्रधानमंत्री के साथ खड़ा है क्योंकि वह देश में स्वराज और सुरक्षित, खुशहाल, जीवन स्वयं के लिये चाहता है। जय स्वराज  
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