माननीयों आपकी मेहनत, कर्तव्य निष्ठा को लेकर हम विश्वस्त है, मगर चिन्तित भी

व्ही.एस.भुल्ले। जिस तरह का कड़ा और अहम निर्णय चुनी हुई सरकार ने हमारे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में लिया है और जिस तरह से निर्णय पर सवाल उठा विरोध प्रदर्शन करने का कार्यक्रम विपक्षी दलों ने चला रखा है। वहीं देश की मीडिया द्वारा अपनी सजगकता सिद्ध करने इस निर्णय को सही या गलत दिखाने के लिये ऐड़ी चोटी का जोर शहर ही नहीं गांव-गांव में लगा रखा है ऐसी स्थिति में हम ही नहीं समुचा देश का भ्रमित होना या जागरुक होना स्वभाविक है। जो किसी के भी हित या अहित मेें हो सकता है। दे ाा जाये तो स्वस्थ लोकतंत्र खासकर जिसे जिन्दा बनाये रखने के लिये देश के भोले भाले गांव गरीब लाख परेशानियों के बावजूद भी ऐड़ी चोटी का जोर लगाये अपने जीवन निर्र्वहन में लगे है। ऐसे लोकतंत्र में इस तरह का माहौल न तो राष्ट्र हित में है और न ही देश के करोड़ों करोड़ गांव गरीब तथा आवाम के हित में है। 

मतभेद, मनभेद दलो, सत्ता, सरकारों विपक्ष के बीच निर्णय, सफलता, असफलता को लेकर हो सकते है। देश की आवाम और देश के हित को लेकर कई सवाल भी लोगों के जहन में हो सकते है। मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह देश  हमारा है और इस देश में रहने वाले लोग हमारे है। इस देश की सरकार हमारी है, विपक्ष हमारा है, मीडिया हमारी है। मगर नोट बन्दी से उत्पन्न माहौल पर सभी की अपनी-अपनी चिन्तायें और विश्वास अलग है। यहीं आज देश और देश की आवाम के बीच सबसे बड़ा सवाल है। 

देश और देश की आवाम को समझना होगा कि जब माननीयों को वोट दिया है तो विश्वास भी करना चाहिए। 130 करोड़ के लगभग आबादी वाले देश में नोटबंदी के निर्णय और उसकी सफलता, असफलता को लेकर मची खींच-तान तथा वर्तमान हालातों के मद्देनजर आम नागारिकों को पीढ़ा तो हो ही रही है इस बीच विभिन्न कारणों से जनहानि भी हुई है। मगर यह वक्त देश को एक जुट हो, आतंकवाद, कालाधन, भ्रष्टाचार से पूरी ताकत के साथ सामना करने का है।
 देश के इतिहास में अगर 500-1000 के नोटबंदी का फैसला पहला नहीं अजूबा है। तो इसके भावी परिणाम भी अजूबे ही होगें, जिसे देश का इतिहास हमेशा याद रखेगा। क्योंकि जिस तरह से नोटबंदी के अचानक निर्णय की तरह भारत सरकार हाई एलर्ट पर रह आने वाली समस्याओं के समाधान में जुटी है। उसे देखकर हमें विश्वास करना चाहिए कि जितना कड़ा निर्णय हुआ है उतनी ही सजगकता सक्रियता के साथ हमारी सरकार हमारा विपक्ष और हमारी मीडिया और हमारा हर राष्ट्र भक्त, नागरिक दिन रात अपने कत्र्तव्य निर्वहन में जुटे है।  
मगर वर्तमान हालातों को लेकर संका, संदेह और सवाल हमारे ही नहीं, देश के गांव गरीब के मन में भी है, और यह संका, संदेह, सवाल कोई वेवजह ही नहीं। उसके पीछे गांव गरीब की जनधन लूट का पूरा प्रमाण भी है। कारण साफ है कि हमें चिन्ता 8 नव बर 2016 से पूर्व बैंकों के  धन की स्थिति क्या थी और उनके धन का कैसे-कैसे क्या हुआ कि नहीं? हमे तो चिन्ता 8 नव बर 2016 के बाद 500-1000 कि नोटबंदी के पश्चात देश के बैंको में जमा होने वाले आम गांव गरीब के उस धन की है जो रोजाना अरबों की सं या में बैंकों में देश का गांव गरीब आम नागरिक जमा कर रहा है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह गांव गरीब, घर-झोपड़ी और हमारी महान मातृ शक्ति का वह धन है जिसके बल पर हमारे देश के महान नागरिकों ने विश्व आई आर्थिक मंदी को भी हमारे महान गांव गरीब के आस-पास भी नहीं फटकने दिया। 
कहने का तात्पर्य हमारा यह है कि हमारा आप सभी माननीयों से अनुरोध यह निवेदन भी है कि देश के गांव गरीब का 8 नव बर 2016 के बाद जमा होने वाली पाई-पाई का हिसाब या तो देश के बैंक रखें या फिर रिर्जव बैंक। साथ ही चलते हमारे सदनों में यह भी सुनिश्वित भी हो जाये कि 500-1000 के नोटबंदी के कारण जमा धन तब तक बैंक कोई ऐसी पुरानी उधारी न चुकाये, न ही इस धन से कोई नया रिण खासकर 10 करोड़ से अधिक का किसी को दें। जब तक कि इकट्टे धन को खर्च करने की पद्धति पूर्णत: पारदर्शी एवं सुरक्षित न हो जाये। और यह तभी स भव है जब माननीयों चलते सदनों के बीच आप लोग यह कानून बना दें कि 10 करोड़ से अधिक के रिण पर, रिण दाता बैंक रिण लेने वाली क पनी, उघोग, संस्था में पूर्ण जबावदेही तय कर अपना प्रतिनिधि बतौर संचालक रिण नियुक्त नहीं कर देती। जो हर तिमाही नफानुकसान की रिपोर्ट रिण दाता अपनी संस्था और सरकार को यथा स्थिति के बारे में देता रहे। जिससे कोई भी देश की गरीब जनता का धन लूट कर न तो खा सके, और न ही देश छोडक़र भाग सके। और न ही सरकार को रिण माफ करने की स्थिति का सामना करना पड़े। 
 और यह भी त ाी स भव है जब भारत सरकार अपने सार्वजनिक उपक्रमों का एक विभाग ऐसा बनाये जो तिमाही रिपोटे के आधार पर अधिग्रहित की जाने वाली संस्था, क पनी, उघोगों का संचालन स्वयं या ठेके  पर या उनकी तत्काल नीलामी कर रिण की भरपाई कर सके। जिससे न तो बैंक का रिण डूबेगा, न ही कोई गलत रिण ले, गरीब जनता का पैसा पचा सकेगा। इसके अलावा बैंक  हर वर्ष इस जमा धन से दिये गये रिण और रिण लेने वाली क पनियों के नफानुकसान को सार्वजनिक भी करें। जिससे समुचा देश एक स पूर्ण पारदर्शा के माहौल में सांस ले सके। अगर माननीयों हम हम हमारे देश वासियों को उसके धन सुरक्षा और पारदर्शिता दे पाये, तो कोई कारण नहीं कि हमारा देश एक बार फिर से सोने की चिडिय़ा की तरह खुशहाल, स्वाभिमानी राष्ट्र न बन सके। 
माननीयों हमारी एक चिन्ता और निवेदन यह भी है कि  जब हमें लाइन में लगकर अपने धन के बदले, धन प्राप्त करने काली सियाही उंगली पर लगवानी पड़ रही है। तो ऐसे में उन लोगों के मुंह पर हमारा नया कानून कब सियाही पोतेगा जो रिण के नाम पर गरीब जनता का हजारों ला ाों करोड़ रुपये बैंकों के माध्ययम से पचा गये। 
माननीयों आपसे हमें बड़ी उ मीद है और आप पर विश्वास भी कि आप लोग हमारे साथ अब ऐसा नहीं होने देगें जो आज तक होता रहा। एक अन्तिम निवेदन हमारा आप लोगों से और है कि हमारे प्रधानमंत्री जी की अपनी गरिमा है और चुने हुये पक्ष-विपक्ष और मीडिया का अपना स मान भी है। मगर हम गरीबों को फिर भी आपसे बड़ी उ मीद है। कि आप हमें विसार कोई ऐसा कदम कभी नहीं उठायें जो हमारे हित में न हो, भले ही आपके राजनैतिक स्वार्थ महात्वकांक्षायें ही आड़े क्यों न आये। हमने तो आप सभी को चाहे पक्ष हो या विपक्ष हो। सभी को वोट देकर राष्ट्र और स्वयं की खातिर 5 वर्ष के लिये चुना है। और उस मीडिया को भी अपना अमूल्य समय दे, टीआरपी बढ़ा बाजिब धन विज्ञापन के रुप में कमाने का मौका दिया है। अभी तक का इतिहास बताता है कि हम गरीबों की बड़ी कुर्बानी हमारे महान राष्ट्र और हमारे अपनो के लिये अनादिकाल से आज तक ही नहीं और भविष्य में भी चलती रहेंगी। मगर राष्ट्र और राष्ट्र की महान आवाम का सर न झुकने न पाये इतनी ार उ मीद आप लोगों से हमारी है। 
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment