नोटबंदी के मंथन से निकलने वाले अमृत पर, अगर हक गांव गरीब का है, तो संकोच क्यों?

व्ही.एस.भुल्ले। प्रधानमंत्री जी आप अकेले भाजपा या भारत सरकार के ही मुखिया नहीं, आप तो 130 करोड़ भारत की जनता और सरकार सहित सदन के मुखिया ...

व्ही.एस.भुल्ले। प्रधानमंत्री जी आप अकेले भाजपा या भारत सरकार के ही मुखिया नहीं, आप तो 130 करोड़ भारत की जनता और सरकार सहित सदन के मुखिया भी है। अगर वाक्य में ही नोटबंदी के मंथन से निकलने वाला अमृत पर पहला हक राष्ट्र व गांव, गरीब का है तो देश की 130 करोड़ जनता ने आपको उनके हक में पूरे पांच वर्ष तक नि:संकोच काम करने का मौका दिया है तो फिर सदन में पारदर्शी चर्चा पर संकोच कैसा? होने दीजिये देश के सर्वोच्च सदन में एक पारदर्शी बहस और दे ाने दीजिये इस देश के आम नागरिक गांव गरीब को जिनके लिये आपने नोटबंदी जैसा साहसिक निर्णय लिया है। जिससे कालाधन, आतंकवाद और भ्रष्टाचार से इन्हें और इस महान देश को मुक्ति मिल सके। 

सच तो यह है कि प्रधानमंत्री जी देश व देश के गांव गरीब को आपकी निष्ठा और देश भक्ति पर कतई संदेह नहीं। मगर विगत 20 दिनों से पक्ष-विपक्ष के बीच टी.व्ही., अखबारों में आ रही दलीलों से वह हैरान परेशान है। आपकी सरकार कहती है कि विपक्ष चर्चा नहीं करना चाहता है और विपक्ष कहता है कि सरकार चर्चा नहीं करना चाहती, जो बातें प्रधानमंत्री अन्य मंचो से कहते है आखिर वह उस सदन में आकर क्यों नहीं कहना चाहते, जिसके प्रति वह जबावदेह है। ये भी सच है प्रधानमंत्री जी आप केवल सदन ही नहीं बल्कि देश की 130 करोड़ जनता के प्रति भी जबावदेह है। जब देश की करोड़ों करोड़ जनता को आपके निर्णय और निष्ठा पर पूरा विश्वास है तो फिर सदन में बैठे विपक्षी दलो को क्यों नहीं?

माननीय प्रधानमंत्री जी विगत 20 दिनों से दोनों सदनों में कोहराम मचा है। देश और देश का गांव गरीब यह नहींं समझ पा रहा कि सच क्या है? कम से कम अगर सदन में पारदर्शी चर्चा हो जाये तो देश की 130 करोड़ लोगों की आबादी और नोटबंदी के मंथन से निकलने वाले अमृत की देश व गांव गरीब भी समझ सके, जिसमें राष्ट्र व गांव गरीब हित का है। इससे स्वत: ही साफ हो जायेगा कि आ िार सच क्या है। और नोटबंदी पर मची तू-तू, मैं-मैं भी बन्द हो जायेगी। 

आदरणीय देश में 8 नव बर 2016 से शुरु  हुई नोटबंदी के मंथन से हम अवश्य प्रताडि़त है जैसी कि आपने स भावना जताई थी। अब जबकि मंथन शुरु हुये 20 दिन गुजर चुके है और लगभग 30 दिन शेष है। इस बीच नोटबंदी के मंथन से अमृत निकलने का रास्ता भी साफ हुआ है। फिर बगैर विपक्ष के आप अकेले ही मंथन क्यों चाहते है। 

माननीय आज देश व देश के गांव गरीब को आपके राष्ट्र के प्रति समर्पण, आपकी निष्ठा ईमानदारी पर किसी को कोई संदेह नहीं। जो सपना देश व देश के गांव गरीब के हित में आपने देखा है वह सच होने की दिशा में अग्रसर है। बस थोड़ी संवेदनशीलता के साथ सबको साथ लेकर आगे बढऩे की जरुरत भर है। आप बखूबी जानते है कि सरकार और विपक्ष का सदन में क्या महत्व और कत्र्तव्य है। तो लोकतंत्र के नाते विपक्ष की अहमियत और कत्र्तव्य पालन में संकोच कैसा। होने दीजिये गांव गरीब और राष्ट्र की खातिर एक पारदर्शी बहस, आखिर अपना अमूल्य मत देकर सदन तक अपने जन प्रतिनिधियों को चुन, सदन तक पहुंचाने वाले भी तो समझे कि उनके द्वारा चुने हुये जनप्रतिनिधि किस तरह से उनके हक और राष्ट्र हित के लिये अपना कत्र्तव्य निर्वहन कर लड़ रहे है। 

देश की आवाम को अपने प्रधानमंत्री पर गर्व है। मगर उन्हें यह संशय भी है कि कहीं ऐसा न हो कि इस तू-तू मेंमें, मैं नोटबंदी के चलते राष्ट्र व गांव गरीब के हक के हित में निकलने वाले अमृत कलश को कोई कालाधनधारी, आतंकवादी या भ्रष्टाचारी न ले उड़े, जिसके समूल नाश के लिये आपने नोटबंदी जैसा महान निर्णय राष्ट्र व राष्ट्र के गांव गरीब की खातिर लिया है। जिस पर न तो देश, न ही विपक्ष और न ही गांव गरीब को कोई संदेह है।  
जय स्वराज 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: नोटबंदी के मंथन से निकलने वाले अमृत पर, अगर हक गांव गरीब का है, तो संकोच क्यों?
नोटबंदी के मंथन से निकलने वाले अमृत पर, अगर हक गांव गरीब का है, तो संकोच क्यों?
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