मप्र: सिंधिया को रोकने बाहर-अन्दर गोलबन्दी शुरु, सत्ता को लेकर अब सडक़ पर संग्राम

व्ही.एस.भुल्ले। मप्र में कॉग्रेस का इसे सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य कि जब भी कॉग्रेस के सुनहरे दिनों की आस आम कार्यकत्र्ता में बंधती है तब तक कॉग्रेस का आन्तरिक संग्राम सडक़ पर आ जाता है। और सत्ता में वापसी का सपना चकनाचूर हो जाता है। ऐसा नहीं कि इस तरह का घटनाक्रम समय की नियति हो बल्कि यह सत्ता के लिये सुनियोजित षडय़ंत्र भी है। निहित स्वार्थो की बलबेदी पर स्वाहा होता कॉग्रेस संगठन मप्र में यूं ही दम नहीं तोड़ गया, बल्कि एक छत्र कॉग्रेस में राज की मंशा रखने वाले लोगों ने इसे धरासायी करने में अहम रोल अदा किया है। जिसका स पूर्ण ला ा विपक्षी दल विगत 10 वर्षो से उठाता चला आ रहा है। 

अगर अपुष्ठ सूत्रों की माने तो जिस गत विधानसभा चुनावों में या उससे पूर्व के विधानसभा चुनाव में कॉग्रेस की जो र्दुगति हुई वह कोई अवश्यम भावी नहीं थी, बल्कि सत्ता में भागदारी बनाये रखने व भविष्य में अपना राजनैतिक भविष्य सुरक्षित रखने हेतु सुनियोजित चाल थी। जिसे भुनाने में आलाकमान की अरुचि और आलाकमान के इर्द-गिर्द वह रणनीतकारों की फौज थी जिन्होंने अपने कत्र्तव्यों का सटीक निर्वहन न करते हुये कॉग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की 26 दिन की राजनैतिक रुप से खूंखार प्रदेश में की गई यात्रा के समापन पर उनके उदबोधन में दिये गये व्यान में उपयोग शब्दों से करा दी। जैसा कि एक बार इसी तरह का व्यान म.प्र. के श्योपुर जिले में दिये गये व्यान के माध्ययम से कॉग्रेस को क्षती हुई थी वहीं लोग म.प्र. कॉगेे्रस में ऐसे लोग को प्रसय दे रहे है। जिन्होंने 10 वर्ष तक रही म.प्र. की कॉग्रेस सरकार में मलाई लूटी और कॉग्रेस को रसातल में जाकर छोड़ा। वहीं लोग सत्ता में अघोषित भागीदारी बनाये रखने, इस तरह की हरकतें कर रहे है। 

हालिया उदाहरण विगत 2014 के विधानसभा चुनावों का है, जब कॉग्रेस ने सिंधिया को प्रोजक्ट करते-करते अचानक कदम वापिस खीच लिये। क्योंकि उस दौरान भी सिंधिया के खिलाफ वहीं लोवी सक्रिय हो ली, जो या तो स्वयं के हाथ में कॉग्रेस की कमान चाहती थी या फिर कॉग्रेस की सत्ता में वापसी न हो, ऐसे प्रबंध करना चाहती थी। और ऐसा ही हुआ भी कॉग्रेस न तो सिंधिया को प्रोजक्ट कर पाई और न ही कॉग्रेस की सत्ता में वापसी हो सकी। 

अब जबकि अन्दर खाने की खबर यह है कि कॉग्रेस 2018 में सिंधिया को प्रोजक्ट कर सकती है, तो इस मर्तवा तो संग्राम खुलेयाम सडक़ पर छिड़ चुका है। बगैर किसी भय के लोगों के व्यान आ रहे है, सिंधिया को काले झण्डे दिखाये जा रहे है इससे तो यहीं लगता है कि अघोषित रुप से गलवईयां डाल विधानसभा में चुप बैठने वालो की जुबान बजाये विपक्ष को कोसने के अपने ही नेताओं को कोसने पर उतर आई है। 

बहरहाल कॉग्रेस का भविष्य क्या होगा कहना जल्दबाजी होगी, अगर राहुल ने उत्तरप्रदेश की ही तरह म.प्र. पर संज्ञान नहीं लिया तो कोई कारण नहीं, जो चौथी बार भी भाजपा का परचम म.प्र. में लहरा जाये। क्योंकि भाजपा पूरी रणनीति तैयार कर मिशन 2018 में जुट चुकी है, वहीं कॉग्रेस सर फुटबल में लगी है। आलाकमान को चाहिए कि वह वरिष्ठ कॉगेे्रसियों के अनुभव और बौद्धिक ताकत का इस्तेमाल कर ऐसे नेताओं को दरकिनार करने की शुरुआत करें, जो स्वयं को कॉग्र्रेस से बड़ा जनाधार वाला नेता या स्वयं को राजनीति का चाणक्य मानते है। 

इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए अगर राहुल म.प्र. में मौजूद नेताओं को जो स्वयं का जनाधार वाला मानते है को दरकिनार कर नेता विहीन कॉग्रेस को भी 2018 की चुनावी जंग में झौक दें तो कॉग्रेस के कार्यकत्र्ता, शुभचिन्तक ही कॉग्रेस को सत्ता वापसी करा लायेगें। क्योंकि जिस तरह की छीछर लेदर कॉग्रेस को लेकर चल रही है वह न तो कॉग्रेस के लिये ही शुभसंकेत है और न ही म.प्र. के आम गांव, गरीब के व्यक्तियों को। क्योंकि राजनैतिक गलियारों में अब यह किसी से छिपा नहीं कि सत्ताधारी दल और कॉग्रेस के कुछ नेताओं के बीच क्या चल रहा है। आलाकमान को किलियर कट निर्णय लेना होगा वह भी जल्द कि म.प्र. में कॉग्रेस की अगली रणनीति क्या होगी और 2018 के चुनावों में उसका कोई चेहरा होगा या फिर कॉग्रेस के चेहरे पर भी चुनाव लड़ा जायेगा।
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