गरीबों के गलीचे पर कुबेरपतियों का महाकुंभ

विलेज टाइम्स। लोकतंत्र की कल्पना कर उसे साकार रुप देने वालो ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि सभी वर्गो की सहभागिता से शासन स्थापित कर सर्वकल्याण की कल्पना को इस तरह कलफना पड़ेगा जैसा कि मां नर्मदा के आगोश समाये प्राकृतिक रुप से स पन्न हमारे म.प्र. में हो रहा है। 

निवेश व उघोगों की बाढ़ लाने की गरज से 2007 से शुरु हुई ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिटो का क्रम विगत 10 वर्षो से चल रहा है जिसमें गत दिनों इन्दौर में हुई वह पांचवी समिट थी जिसमें दांवा किया गया कि लगभग 5 लाख 6 हजार 847 करोड़ निवेश करने के 2630 क पनियों ने प्रस्ताव दिये है। अगर खबरों से प्राप्त आंकड़े की माने तो विगत 10 वर्ष में हुई 5 समिटो में एम.ओ.यू या ई.ओ.आई और निवेशको की स्थिति इस प्रकार रही। 
               वर्ष                      राशि लाख करोड़              निवेशक सं या
                2007  -                        1.22                               301
                2010  -                        2.41                               673
                2012  -                        2.94                               2200
                2014  -                        4.42                               5000
                2016  -                        5.46                               5000
अब ऐसे में आंकड़ों की हकीकत और जमीनी सत्य सब लोगों के सामने है युवा बेरोजगार रोजगार के लिये ाटक रहे है। अगर कुछ केन्द्र सरकार की यूनिटो को छोड़ दे तो इन 10 वर्षो में एक भी ऐसा उघोग स्थापित नहीं हो सका जिस पर कि गर्व मेहसूस किया जा सके। जबकि इन समिटों की तैयारियों और कुवेर पतियों की आओं भगत में सरकार ने गरीबों का अरबों रुपया फूक दिया। 
सच तो यह है कि अगर शासकीय कर्मचारी, केन्द्र या राज्य की विकास उन्मु ा या जनकल्याण से जुड़ी योजनाओं को प्रदेश में वैध, अवैध उत्खनन सबसे बड़ा शराब उघोग जिसमें करंट मणी सरक्यूलेट होती है को दरिकनार कर दें तो ऐसा कुछ म.प्र. में नहीं बचता जिससे लोगों को रोजगार हासिल हो सके जिस म.प्र. में बेरोजगारों की मानसिक हालत रोजगार को लेकर ऐसी बन चुकी हो कि इन्जीनियर, पोस्ट ग्रेज्यूएट तक भृत्य की नौकरी हासिल करने हजारों की तादाद में आवेदन करते हो तो अन्दाजा लगाया जा सकता है। सरकार की ग भीरता का अब ऐसे में प्रदेश के युवा बेरोजगारों के पास मात्र एक रास्ता छोटा-मोटा रोजगार करने का था वह भी ठेकेदारी, छपाई, सप्लाई तो इसे भी मंत्रियों की भूख और भ्रष्ट अधिकारियों के समूह ने भोपाल तक क्रेन्द्रित कर दिया, जिसमें आम गरीब की सहभागिता दूर-दूर तक नहीं रह सकी। बेतहासा धन लालसा ने कुछ विभागों को तो इतना आदम खोर खूंखार बना दिया है कि अब ईमानदारी से काम करने वाले लोग चाह कर भी काम नहीं सकते। निर्धारित मूल्य से 41 फीसदी कम दर पर हो रहे निर्माण कार्यो की अगर ईमानदारी से जांच हो तो सरकार की मंशा और संवेदनशीलता युवाओं के लिये रोजगार को लेकर साफ हो जायेगी। 
बहरहाल आज सवाल यह नहीं कि  इसके लिये दोषी कौन है? इसके लिये सीधे तौर पर न तो मु यमंत्री और न ही वह मंत्री जो अपने दलगत आदृश्य शक्ति के आगे नतमस्तक है।
असल दोषी तो वह लोग है, जो पर्दे के पीछे से अपने स्वार्थो को सामने रख सरकार को विगत एक दशक से अघोषित तौर पर संचालित कर रहे है। असल दोषी तो वह विपक्ष है जिसने अपना जमीर मार न जाने क्यों चुप रहने में अपनी जबावदेही समझ रखी है। और सबसे बड़ी दोषी तो वह मीडिया है जिसने चौथे स्तं भ के नाम लोकतंत्र की कीमत पर म.प्र. के आम गरीब अपने पाठक और दर्शकों से गद्दारी कर अपने-अपने घर भर असली मीडिया को सरकारों से मिल कुचलने पर मजबूर कर रखा है। इससे बड़ी शर्म की बात क्या हो सकती है, कि म.प्र. का आम गरीब कलफ रहा है। बेरोजगार फ्रस्टिेट हो कुछ भी करने पर मजबूर हो रहा है किसान आत्महत्या तो म.प्र. में कुपोषण का आंकड़ा दिन व दिन बढ़ रहा है, बलात्कार और बच्चों के गायब होने की घटनाओं के आंकड़े मुंह चिड़ा रहे है। 
अफसोस कुछ लोगो का समूह गरीब भोली भाली म.प्र. की जनता की भावनाओं का लाभ उठा किस तरह से प्रदेश को लूट अपनी स्वार्थ सिद्धी में लगे है शायद ही इससे बड़ा उदाहरण देश में और कहीं मिले। मगर दुर्भाग्य इस प्रदेश और लोकतंत्र में कलफते बिल-बिलाते लोगों की परवाह किसे है शायद प्रदेश की यहीं नियति है। 

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