किन्तु, परन्तु से इतर राहुल जारी रखे भारत भ्रमण

व्ही.एस. भुल्ले। इतिहास गवाह है जितने भी सफल महान व्यक्ति भारत जैसे महान राष्ट्र में महान हुये उन सबके पीछे मां और मातृ भूमि का बड़ा योगदान रहा है। वहीं कड़ा संघर्ष उनकी शक्ति रही है। ये अलग बात है कि ऐसे जीवन में परेशानी विरोधाभास आते है। विरोधी ताकतें बांधा बनती है मगर मां का आर्शीवाद और मातृ भूमि के प्रति सेवा का समर्पण ही हमेशा कवच बनता है। फिर धर्म ग्रन्थों से लेकर इतिहास तक जाये तो चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक सम्राट, शिवाजी से लेकर महात्मा गांधी तक का, मां और मातृ भूमि के प्रति समर्पण बताता है कि संघर्ष कितना ही कड़ा क्यों न हो। मगर वह जीवन को एक मुकाम तक पहुंचा, सफलता अवश्य दिलाता है। 

जब से राहुल ने अपनी जि मेदारियों को स हाला है तभी से उनकों लेकर किन्तु परन्तु का दौर अनवरत चल रहा है। मगर जिस तरह से लोग अब अपने स्वार्थ, महात्वकांक्षा पूर्ति हेतु सीधे राहुल पर निशाना साध, उन्हें न काबिल साबित करने का अभियान चलाये हुये फिर चाहे उन्हीं के दल में मौजूद मण्डली हो या फिर कॉग्रेस के अन्दर कुछ जय चन्दों की फौज या फिर आलाकमान के सिंहासन से बंधे वह मूशदर्शक, मूड़धन्य हो, जो राहुल से कुछ बेहतर रखने की उम्मीद तो रखते है मगर वफादारों की तरह समय पर मुंह नहीं खोलते। 

इससे बेहतर है कि वह अपनी मां का आर्शीवाद ले, मातृ भूमि की शरण में निकल पड़े  और अपना भारत भ्रमण यात्रा को पूरे चिन्तन के साथ जारी रखें वह भी बगैर किसी संगी साथी सलाहकार, किन्तुु, परन्तु की परवाह किये बगैर अगर उनकी बुद्धि और बोल, लोगों को इतने खेलते है तो वह यात्रा के दौरान सार्वजनिक व्यानबाजी से बच, चुप भी रह सकते है। चुप रहकर ही भारत भ्रमण करे मातृ भूमि की गोद का भी आन्नद ले। यात्रा के दौरान उन्हें इतने साथी, सहयोगी, सलाहकार, वफादार तथा राजनीति के इतने धुर चाणक्य मिल जायेेगें कि हो सकता है। उन्हें उन दरबरियाँ या प्रखाण्ड विधवानों तथा कथित उन चाणक्यों तकनीक एजेन्सियों की जरुरत ही न रहे। जो 24 अकबर रोड़ या 10 जनपथ पर बैठ अपने ज्ञान विज्ञान पर स्वयं को गौरान्वित महसूस करते है। फिर न तो राहुल को कोई खाट, पाट सभा की जरुरत होगी, और न ही उन कद्दावर नेताओं की जिनकेे क्षेत्र, प्रदेशों में विगत 10-15 या फिर 24 वर्षो से कॉग्रेस की र्दुगति हो रही है या फिर गैंगो  में बटी तथा कथित कॉग्रेस संगठनात्मक तौर पर खत्म हो चुकी है। 

जो लोग आज राहुल की सोच उनके व्यान या काबलियत पर सवाल करते है कि 2014 में कॉग्रेस कहां से कहां पहुंच गयी। तो ऐसे लोग अपना सामान्य ज्ञान दुरुस्त कर समीक्षा कर सकते है, कि  केन्द्र में 10 वर्ष यूपीए की कॉग्रेस नेतृत्व वाली सरकार भले ही रही हो। मगर किन-किन घपले घोटालो में किस दल के किन नेताओं के नाम रहे उन पर क्या कार्यवाही हुई कितने कद्दावर नेता कॉग्रेस में मंत्री सांसद, विधायक रहे, तब भी राहुल ने एक ऐसा सार्वजनिक तौर पर बिल फाड़ा था जो कॉग्रेस के मूल्य सिद्धान्तों से मेल नहीं खाता है, लोगों ने तब भी उनकी समझ पर सवाल उठाये थे। 

आखिर कौन थे वो लोग जो एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में शान्ति प्रिय आन्दोलन का दमन कर टी.व्ही. पर सामन्ती भाषा या किसी वर्ग विशेष के लिये कॉग्रेस को कुर्बान करना चाहते थे। अगर यूपीए सरकार के सारे सदकर्म, दुष्कर्म के जि मेदार राहुल थे। तो आरोप जडऩे वाले लोग यह कैसे भूल सकते है कि जिस पार्टी का नेतृत्व करने या उस पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार होने के लिये वह जान जोखिम में डाल, राजनैतिक रुप से खूंखार प्रदेश की हजारों कि.मी. यात्रा कर चुके हो तो क्या वह स्वयं यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे। जिन सोनिया पर लोग पुत्र मोह कर आरोप लगाते है, क्या वह अपने पुत्र को यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री या उपप्रधानमंत्री नहीं बना सकती थी। जो कहते है गठबन्धन दल राहुल का नेतृत्व स्वीकार नहीं करेगें, आज नेता नहीं देश का बच्चा-बच्चा मुद्दा आधारित गठबन्धन सरकार में स्वयं के स्वार्थ पूर्ति हेतु किस स्तर तक पर्दे के पीछे दबाव, ब्लैक मैलिंग होती है। देखा जाये आज की राजनीति में स्वीकार्यता तो अब स्वार्थो को देखकर होती है। अगर 2014 की हार के दोषी राहुल है तो वह प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सके और कॉग्रेस का नेतृत्व करने आज वह क्यों कॉग्रेस मजबूत करने गली मोहल्ले भटक रही है। इस सवाल का जबाव आना चाहिए, जो नेता दिल्ली में बैठ बड़े-बड़े व्यान दे, राहुल का स्वयं को सबसे बड़ा बफादार और स्वयं को असल कॉग्रेसी ठहराना चाहते है वे बताये 15 या 10-10 वर्षो या 24 वर्षो से कॉग्रेस उन प्रदेशों में क्यों हार रही है उनका जमीनी संगठन कहां है। कॉग्रेस कार्यकत्र्ता कहां है, क्यों वह कॉग्रेस और संगठन को मजबूत नहीं कर पाये स्वयं परिवार से इतर कितने जनप्रतिनिधि उन्होंने विगत वर्षो में कॉग्रेस के बनवाये, सारा मामला साफ हो जायेगा। 

रहा सवाल विपक्ष का तो सूचना अधिकार भूमि अधिग्रहण बिल खादय बिल, आधार कार्ड, सर्व शिक्षा ग्रामीण स्वास्थ, महिला एवं बाल विकास सहित महात्मा गांधी रोजगार गारन्टी जैसे बिल गठबन्धन सरकार के रहते किसने पास कराये व सहयोगी दलो को कैसे मनाये, हर बिल पर आय दिन हंगामा खड़ा कर कॉग्रेस के स मानित नेताओं के सॉशल मीडिया पर अपमान जनक चित्र कामेन्टस किसने चलवाये अन्ना, बाबा के अखाड़े दिल्ली में किसने लगवाये। 

आखिर वह लोग खून की दलाली जैसे शब्द पर कैसे सवाल खड़े कर सकते है। जिनके नेता 60 वर्षो से कॉग्रेस ही नहीं देश के स मानित नेताओं के लिये अभद्र भाषा का उपयोग कर कोसते रहे और आज भी वहीं भाषा का इस्तमाल करते नहीं थकते। कौन नहीं जानता कि एक प्रदेश के मु यमंत्री, प्रधानमंत्री को मौन मोहन कहते नहीं थकते थे। कौन नहीं जानता, देश की संसद में देश के एक ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिये क्या-क्या नहीं कहा गया। और आज भी कुछ लोग पण्डित नेहरु जैसे देश भक्त महात्मा गांधी जैसे संत के हत्यारे को महिमा मण्डित करते नहीं थकते। किसी से किसी की वैचारिक सहमति असहमति हो सकती है। मगर उसके लिये हत्या कर देना उस व्यक्ति की जिसने अपने घर द्वार अपनी सारी दौलत, सौहरत छोड़ देश के लिये एक लगोंट गमछे में सारा जीवन गुजार दिया। उपवास व सलाखों के पीछे बैठ आजादी का सपना साकार किया। ऐसे व्यक्ति की जघन्य हत्या भरतीय संस्कृति का अपमान ही नहीं जघन्य अपराध है। 

मगर दुर्भाग्य कि स्वयं को कॉग्रेस का सर्वे सर्वा कहने वालो के मुंह से, न तो अपने नेताओं और न ही राहुल तथा न ही उस पार्टी के पक्ष में बोल फूटते, जिसने उन्हें राजनैतिक पहचान दी।  बेहतर हो कि अब राहुल अपने सुरक्षा कारणों का ध्यान रखते हुये बगैर किसी सहयोगी सलाहकार की मदद लिये मातृ भूमि की ओर बढ़ भारत यात्रा करे, चिन्तन करे।  ऐसे लाखों करोड़ों लोग आज भी है जिनकी लोकतंत्र में गहरी आस्था है और मूल्य सिद्धान्त और स्वाभिमान स मान की राजनीति करना चाहते है। वह चाहते है कि देश में भाजपा भी हो और कॉग्रेस भी और मूल्य सिद्धान्त की राजनीति करने वाले अन्य दल भी हो, मगर मातृ भूमि, मानव कल्याण प्रकृति रक्षा के विषय पर एक हो, तभी लोग समृद्ध खुशहाल राष्ट्र और महान कॉग्रेस का सपना साकार कर पायेगें। 
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment