अतिरंचना से आहत लोकतंत्र, स्वाभिमानी कौम पर सवाल

व्ही.एस.भुल्ले। अगर हम इन्सानियत के दुश्मन, आतंकवाद बढ़ती कट्टरता से लडऩा चाहते है तो हमें हर हाल में अतिरंचना का दामन छोडऩा ही होगा जिसकी शिकार इन्सानियत ही नहीं आम नागरिक हमारा लोकतंत्र भी हो रहा है। आज हमारी एकता क्या वाक्य में ही राजनीति समाज, मीडिया सभी क्षेत्रों एवं एकता अखण्डता पर भी सवाल हो रहे है, और इसका दिन व दिन देश में प्रभाव बढ़ रहा है। अगर हम अतिरंजना को मदर ऑफ कट्टरता, आतंकवाद, स प्रदायिकता, जाति, धर्म, क्षेत्र वादिता कहे तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। जिससे समुचे समाज ही नहीं देश की एकता अखण्डता को बड़ा खतरा पैदा हो गया है। दुर्भाग्य कि जिस तथा कथित मीडिया में देश की आवाम अपना अक्स देख, फूली नहीं समाती थी आज उसका बदरंग चेहरा देख, वह अच िभत है। कारण जिस  प्रकार कि अतिरंचना खबरों के माध्ययम से समाज को परोसी जा रही है उसे देख समझने वाले अब विचलित है। 

जिस तिगड़म को तोडऩे मीडिया की भूमिका लोकतंत्र में अहम समझी जाती थी लगता है कि वह भी अब उसमें शामिल हो ली। चकाचौंध की दुनिया में सत्ता, नौकरशाह पूंजीवादियों की सरपस्त, तथाकथित मीडिया अब उस मीडिया को भी कुचलने पर आमदा है, जिससे आज लोकतंत्र जिन्दा है। सत्ता, नौकरशाह, पंूजीवादियों के अनैतिक गठजोड़ की सरपरस्ती में माल कबाड़ तथाकथित मीडिया को सत्ता व पूंजीपतियों की कतार में खड़ा करने में स्वयं को गौरान्वित मेहसूस कर रही है। यह राष्ट्र ही नहीं समाज व इस देश के भोले भाले नागरिकों के साथ अन्याय है, देश की मीडिया को खत्म करने का जो काम कभी सत्ता, नौकरशाह, माफिया, अपराधियों का समूह और साम्राज्य, सामंत, पंूजीवादी नहीं कर पाये, वह कार्य उन्होंने इन धन लोलुप, तथाकथित मीडिया से करा डाला। जिसके चलते देश में पनपता आक्रोश, अराजकता, दंगे, फसाद, बल्बा बल्कि अब तो हमें जंग के मुहाने तक ले जाने वाली तथाकथित मीडिया हमारी महान सत्ता व पूंजीवादियों के संरक्षण में उन लोगों के दमन का माध्ययम बनने से भी नहीं चूक रही, जो समाज, देश व इन्सानियत के लिये देश में कुछ करना चाहते है। फिर चाहे वह दल, संस्था, इन्सान, नेता, नौकरशाह, पूंजीपति हो, जिस अतिरंचना का माहौल धर्म, भाषा, क्षेत्र, जाति या देश को लेकर तैयार हो रहा है वह किसी विकट भूचाल से कम नहीं। 

देश की आधे से अधिक आबादी का दुर्भाग्य यह है कि वह चाहते हुये भी मजबूर है जिन्दा रहने जो कुछ बोल नहीं सकती तो 25 फीसद आबादी ऐसी है जो कुछ कर नहीं सकती, शेष कुछ कर सकते है, उनमें से भी आधे से अधिक कुछ करना नहीं चाहते, जो करना चाहते है, उन्हें करने नहीं देते। 
हालिया उदाहरण देश की सेना कै प पर हुये आतंकी हमले पर भाव विभोर मीडिया के रुधन के चलते राष्ट्र में जंग जैसे हालात है इसमें किसका क्या नफानुकसान ये तो देश के मूड़धन्य ही जाने। 

मगर विलखती मीडिया को यह नहीं भूलना चाहिए कि न तो महान राष्ट्र का आम गरीब, नागरिक , न ही इस देश की सेना के सैनिक इतने कमजोर रहे है, और न है, जो दुश्मन से अपने देश के नागरिकों की शहादत का प्रतिशोध न ले पाये, न ही इस देश के वह बच्चे, मातायें, बहिने, भाई, पिता इतने कमजोर है जो शहादत पर विलखे और आंसू बहाये, इस देश में कुर्बानियाँ होती रही है और आगे भी मौका आया तो होती रहेंगी। 

अगर हमारी माता, बहिनों, बच्चों के विलाप करते चित्र टी.व्ही., अखबारों में छाप, देश के नागरिक को कमजोर और सैनिक की शहादत को रुधन भरे लेहजे में दिखा, यह देश का अपमान है। क्योंकि यह देश, विज्ञापन, टी.आर.पी, माल बनाने वाली बड़ी-बड़ी क पनी चलाने वालो से नहीं बना है और न ही चलता है , यह देश उन महान शहीदों की शहादत, कुर्बानी से बना है जिसमें कईयों ने तो जिन्दगी के 20 बसन्त तक नहीं देखे, तो कईयों को तो यहीं पता नहीं रहा, जबानी, बुढ़ापा, हैसियत, धन, पंूजी क्या चीज होती है। उन्होंने तो देश व देश की करोड़ करोड़ जनता के लिये अपना सर्वस्य न्यौछावर कर दिया। यह देश हमारे उन महान किसान, मजदूर, उघोगपति, शिक्षक, सैनिको के बल पर जिन्दा है, जो अपना खून पसीना एक कर देश व देश के नागरिकों की सेवा करते है। मीडिया और देश में संवैधानिक संरक्षण प्राप्त नेता, नौकरशाहों ने अपने महान शहीदों की शहादत और भारतीय स यता से ओत-प्रोत इतिहास, कहानियाँ, कविताऐं देखी, सुनी होती तो देश  आज धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा की कट्टरता की ओर नहीं बढ़ रहा होता, न ही सा प्रदायिकता का सहारा ले, देश के दुश्मनों का दिल बड़ा होता, जो हमें बात-बात पर धमकाते ही नहीं, समय वेसमय नीचा ाी दिखाते है। जरुरत आज जंग की नहीं, दुश्मन के मंसूबो को हमेशा के लिये निस्तानाबूत करने की है। वह भी लोकतांत्रिक तरीके से इन्सानियत के खातिर फिर चाहे वह दुश्मन शरहद पर हो, या शरहद के बाहर या फिर देश के अन्दर, उनसे हमारा महान देश व देश का जांबाज नागरिक बखूबी निवट सकता है।
वशर्ते देश की सत्ता, नेता, नौकरशाह तथा कथितमीडिया स्वयं के स्वार्थ छोड़, राष्ट्र के लिये भी कुछ करे, क्योंकि जो व्यवस्था अघोषित तौर पर स्वार्थो के चलते तैयार हो रही है, इसी में सभी को जीना मरना है। कहीं ऐसा न हो कि स्वार्थो की छिड़ी जंग में हम देश और समाज दोनों हार जाये, तब हम उस पीढ़ी को जबाव देगें, क्या कहेगें, तब हमारे पास कुछ भी कहने, बताने नहीं होगा, जिनके बेहतर भविष्य के लिये हम दिन रात एक कर, अपने कत्र्तव्य भूल, स्वार्थो की अन्धी दौड़ में लगे है। बेहतर हो कि हम देश ही नहीं इन्सानियत की खातिर आतंकवाद व अतिवादियों से लोहा लेने पूरी निष्ठा ईमानदारी से अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन करें।  
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