शोषण का हब बनता देश, शिक्षा, सुरक्षा की समीक्षा अहम

व्ही.एस.भुल्ले। आज जिस तरह से अघोषित तौर पर हम तीन वर्गो में बट, देश वासी अपने ही लोगों के हाथों शिक्षा, व्यापार के नाम शिकार हो रहे हैं,...

व्ही.एस.भुल्ले। आज जिस तरह से अघोषित तौर पर हम तीन वर्गो में बट, देश वासी अपने ही लोगों के हाथों शिक्षा, व्यापार के नाम शिकार हो रहे हैं, उसने शेष बचे हमारे खुशहाल जीवन और हमारी आने वाली पीढ़ी को एक ऐसे अंधकारमय जीवन में झौंक दिया है, जहां से निकलने के बजाये भविष्य रसातल में जाता दिखाई देता है। 

कारण अघोषित तौर पर पैर जमा चुकी हमारी राष्ट्र विरोधी शिक्षा नीति, और आन्तरिक ही नहीं, वाह सुरक्षा नीति ये अलग बात है कि इन्दिरा जी के बाद, बाह सुरक्षा नीति पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने युद्ध स्तर पर प्रधानमंत्री बनते ही जो कार्य किया है वह काबिले गौर है। मगर इससे भी एक कदम जाकर विदेश नीति के माध्ययम से बाह सुरक्षा नीति बनाये जाने की जरुरत अवश्य महसूस होनी चाहिए। अगर हम विश्व विरादरी के कुछ मित्र, शत्रु, स्वार्थी देशों की समीक्षा करें, तो हमारे सामने तीन प्रमुख चुनौतियां है। एक वो देश जो अपनी पूंजीवादी, साम्राज्यवादी पर परा के चलते हमारे मित्र, शत्रु घोषित अघोषित तौर पर है, तो दूसरी ओर देश में खुलेयाम मगर गुप्त तौर पर हमसे दुराभाव या दुश्मनी रखते है। ऐसे में इन्हें चिन्हित कर इनके साथ स बन्ध और नीति निर्धारित होनी चाहिए जहां तक धन लोलुप स्वार्थियों से हमारी शिक्षा और व्यापारिक व्यवस्था को बचाये रखने के साथ स्वदेशी उघोग और व्यापार को संरक्षण की जरुरत है, तो जो देश 70 वर्ष बाद भी हमें दुश्मन न बर एक समझते है, उनके लिये साम, नाम, दण्ड, भेद के साथ ऐसी कूटनीति प्रयासों की जरुरत है कि वह सदियों तक भारत की तरफ आंख उठाकर न देख सके, फिर ऐसे देश घोषित हो या अघोषित तौर पर दुश्मन हो या दोस्त।  

रहा सवाल आन्तरिक सुरक्षा का तो अब हमें हमारी नई पुलिसिंग नये संसाधन तथा नई नीति की जरुत होगी जिसमें नये कानूनों से लेकर  नये सिस्टम तक सुधार स भव है, जिससे आन्तरिक सुरक्षा भी चाक चौबन्द की जा सके। क्योंकि स्लीपर सेलो से लेकर इन्हें आर्थिक, बौद्धिक संरक्षण देने वालो तक जब तक पुलिस की पहुंच नहीं होगी तब तक देश में असुरक्षा का भाव बना रहेगा। 

जहां तकहमारी मौजूद शिक्षा नीति का सवाल है, तो वह फिलहाल चारों खाने चित पढ़ी है, क पनियों के नाम गरीबों की संगठित लूट के जितने उदाहरण भारत वर्ष में शिक्षण, संस्थानों के हो सकते है उतने शायद कहीं और हो। 

यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि जब हम अंग्रेजों के गुलाम थे तब भी हमारा देश व्यापार और बेरोजगार के नाम पर शोषण का बड़ा केन्द्र था। क्योंकि तब की शिक्षा नीति अंग्रेजों ने अपनी सुविधा अनुसार बनाई थी और आज जब हम आजाद है, तब भी भारत की शिक्षा नीति लगभग उन्हीं पूंजीवादी, साम्राज्यवादियों के अनुसार बन बिगड़ रही है। कारण देश से युद्ध स्तर पर राष्ट्रीय भाव, इन्सानियत, नैतिकता, संस्कार, संस्कृति का जो सत्यानाश हुआ है, उसके चलते आज हम अघोषित तौर पर तीन वर्ग में बट, अप्रत्याशित जाहिल संस्कृति से ओत-प्रोत हो रहे है, जिसका खुशहाल जीवन से अब कोई बास्ता नहीं रहा। 

एक वर्ग वह है, जो धनाडय हो, क पनियों के माध्ययम से सारी नैतिकता, संस्कार दरकिनार कर, जनधन लूट के केन्द्र बन चुके है। जो देश में पनपी अघोषित संस्कृति सहारे, भावनाओं के देश में भावनाओं के सहारे अपना मोटा कमाने की होड़ में लगे है। जिन्हें बहुराष्ट्रीय क पनियां व्यापार के नाम मोटा मुनाफा कमाने नई शिक्षा पद्धति के सहारे स्लीपर सैल के रुप में इस्तमाल करती है, जो अब हमारे समुचे व्यापार सिस्टम ही नहीं, हमारे रुट लेवल तक के लोगों तक अपना जाल विछा चुकी है। 

दूसरा वर्ग वह है जो अपने जीवन की मोटी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च कर, अपनी आने वाली पीढ़ी को उन संस्थानोंमें शिक्षा दिला जो एक नौकर और बेहद स्वार्थी संस्कार विहीनो की फौज तैयार करते है। वह भी सुनियोजित सिस्टम से जहां देश की प्रतिभाओं को परसेन्टेज के माध्ययम से हताश किया जाता है और उन्हें रट्टू तोता बना ऐसे लोगों का वर्ग तैयार किया जाता है जो एक कलपुर्जे की संस्कृति में ढल, उन्हीं मल्टी नेशनल क पनियों के करोड़ों के पैकेज देख लालज में खुशहाल जीवन का नाश कर लेते है। अर्थात यह शिक्षा, संस्थान मल्टी नेशनल क पनियों को उनकी मंशा अनुसार ऐसा रो मटेरियल देते है जो देश, समाज, घर, परिवार को भूल उनकी मंशा अनुसार उनके कार्यो को सरअन्जाम देने अपने ही देश या अन्य देशों में जाकर कड़ी मेहनत करते है। जिन क पनियों का न तो कोई नैतिक, सांस्कृतिक स्तर है, और न ही कोई स यता। चन्द बड़े पैकेजदारियों को छोड़ दें, तो लाखों इसी देश में धक्के खाते है अपने बेहतर भविष्य को बर्बाद कर लेते है, जिनकी स्थिति पैकेज न मिलने के आभाव मेंं एक शिक्षक से भी गई गुजरी हो जाती है। 

आज जो युवा ऐसे संस्थान, शिक्षा, मनोरंजनात्मक संस्कृति के सहारे, अपनी अज्ञानताबस या ऊंचे आवों के चलते इनके जाल में फस जाते है, उनका समुचा जीवन व्यापार के नाम अपनो की ही लूट मार या शोषण का शिकार बना रहता है। सच बोले तो यह वर्ग वह दुधारु गाय है, उन मल्टी नेशनल क पनियों को जो बगैर चारा दिये भरपूर दूध देती है, जिसमें पूंजीवादी, राजनेता, नौकरशाहों का एक बड़ा वर्ग भी अघोषित तौर पर नैतिक, अनैतिक तौर पर भागीदार है। 

बरना क्या कारण है जो हम एक आजाद स प्रभु राष्ट्र होने के बावजूद अपनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति आज तक नहीं बना पा रहे है। जिसका परिणाम कि बढ़ती जागरुकता के चलते समाज में अविश्चास बढ़ रहा है और फैसले अब सडक़ों पर होने लगे है। 

मजबूर मूकदर्शक व्यवस्था या तो तमाशा देख स्वच्छता में जुट जाती है या फिर समझाइस में लग जाती है, जिससे न तो राष्ट्र का भला होने वाला है, न ही इस देश के नागरिकों का। जरुरत है, आज देश को एक राष्ट्र भक्त व्यक्ति के नेतृत्व में देश को सही दिशा देने की। क्योंकि शास्त्री, इन्दिरा, राजीव गांधी के बाद देश को वो नेतृत्व देखने मिला है जिससे देश व देश वासियों को बड़ी उ मीद है। 

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तीरंदाज,321,व्ही.एस.भुल्ले,515,
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