स्थापित सत्यता से सत्ता के लिये खिलवाड़ खतरनाक

व्ही.एस.भुल्ले। सभ्य पढ़े लिखे ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के बीच जिस तरह के शब्दों का इस्तमाल माहौल गर्माने के लिये किया जा रहा है जिस तरह नई...

व्ही.एस.भुल्ले। सभ्य पढ़े लिखे ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के बीच जिस तरह के शब्दों का इस्तमाल माहौल गर्माने के लिये किया जा रहा है जिस तरह नई तकनीक के जरिये घटिया शब्दों को सभ्य, संस्कृति के बीच परोसा जा रहा है हो सकता है, सत्ता तक पहुंचने या सत्ता में बने रहने की यह मजबूरी हो। मगर यह मानव सभ्यता के लिये खतरनाक है, इससे किसी का भला होने वाला नहीं। 

विभिन्न समाजों में बोलचाल की भाषा में स्वीकार्य ऐसे शब्द जिसे स य भाषा में अभद्र माना जाता है। उनका जि मेदार लोगों द्वारा खुलकर उपयोग हो रहा है। इसमें ऐसा नहीं कि एक दो दल ही शामिल हो, मगर अपनी-अपनी चिन्ताओं के चलते इसके इस्तेमाल से कोई चूकना नहीं चाहता जिसका गहरा असर उस पीढ़ी पर तो पढ़ ही रहा है जिसने भारतीय स यता, संस्कृति, संस्कारों के बीच अपनी बाल्य अवस्था जबानी और बुढ़ापे को जिया है इससे युवा ही नहीं हमारे बच्चे भी प्रभावित हो रहे है।

यह सत्य है कि अनादिकाल से हिंसा और अहिंसा का चोली दामन का साथ रहा है मगर एक सन्तुलन भी अवश्य रहा। मानवता सेवा और इन्सानियत को जिन्दा रखने न्याय की स्थापना तक आज जिस तरह से जरा-जरा सी बातों पर जनता कानून की परवाह किये बगैर हुजूम के रुप में सडक़ शासकीय संस्थानों में उग्र फैसले ले रही है और समाज को दिशा देने वाले राजनेता समाज के नेताओं की टोली एक दूसरे के खिलाफ मानवता इन्सानियत न्याय को तिलांजली दे, घटिया शब्दों का इस्तेमाल कर वाक युद्ध ही नहीं समय वेसमय हिंसा भी कर रही है, आखिर इससे सभ्य समाज और देश को क्या हासिल होने वाला है। 

हालिया ही नहीं अपनी स्थापना से लेकर आज तक अपने सहयोगी संगठनों नेताओं के सहारे जिस तरह भाजपा सभ्य समाज में अस्वीकार्य शब्दों का इस्तेमाल करती रही है। अब तो कॉगे्रस सहित अन्य दल भी पीछे नहीं रहे, फिर चाहे वह सपा, बसपा, राजग, आम आदमी पार्टी ही क्यों न हो। 

अहिंसा के पुजारी, इस देश में अब शान्ति ढूढना मुश्किल हो रहा है देश के आम गरीब स य नागरिक दहशत में है। मगर मजबूर भी क्योंकि अब उनके हाथ एक वोट के अलावा ज्यादा कुछ बचा नहीं, वह भी राजी नहीं तो गैर राजी मन मारके 5 वर्ष में डालना अब उसका कत्र्तव्य बचा है। सबसे अधिक हालत तो उन स य, बुद्धिजीवियों की है जिनकी अब कोई सुनता नहीं। सत्ता के लिये गैंगो में तब्दील कुछ दल और दल और केज्युअल मे बर के नाम उनकी समर्थक मीडिया इस देश में कुछ भी करना चाहते है। जो लोकतंत्र का लाभ उठा अपनी मनमानी कर अपने अहंकार को जिन्दा रखना चाहते है फिर भले ही उन्हें इन्सानियत, मानवता को ही क्यों न रौंधना पढ़े, यह हम सब भारत वासियों के लिये शर्मनाक है। 

क्योंकि आज हम लोकतंत्र के नाम ऐसे घोषित अघोषित लोगों के समूहों से घिर चुके है जहां सिर्फ  और सिर्फ स्वार्थ सत्ता के लिये सब कुछ कुर्बान हो रहा है। फिलहाल लक्ष्य इनके जो भी हो, मगर यह भी तय है कि अगर उत्तम साध्य की प्राप्ति के लिये अच्छे साधनों का उपयोग नहीं हुआ तो साध्य प्राप्त होने के बावजूद भी उनके यह प्रयास कभी सार्थक नहीं हो सकते, बेहतर हो कि हम अपने स्वार्थो से इतर अभी भी कुछ शुरुआत कर ले, बरना इतनी देर न हो जाये कि भविष्य भी हमें कभी माफ न कर सके। 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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स्थापित सत्यता से सत्ता के लिये खिलवाड़ खतरनाक
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